गुरुवार, 19 मार्च 2026

हम ऐसे युग में जीने को विवश हैं, जिस में चोर खुद को आसानी और बेहयाई से महान घोषित कर देते हैं...

 सुन रहा हूँ, कवि नरेश सक्सेना के साथ हुआ अपराध और यह भी कि वे व्यथित हो कर एकान्त वास में चले आते वे। सक्सेना जी,चोर अब 'महान' समझने लगे हैं खुद को। सन् 2014के 'आलोचना' के अंक में श्री राजेश जोशी की कविता 'पखावज वृत्तान्त' देख कर मैं ही नहीं, अनेक मित्र चौंक गये, क्यों कि यह 'अभिप्राय', अप्रैल 1983 में प्रकाशित मेरी लोक शैली में लिखी कहानी का अविकल रूप था। शीर्षक तक नहीं बदला गया। मेरा लीगल नोटिस मिलने पर फोन से उनकी क्षमा याचना आती, मगर अखबार में उनके वक्तव्य का शीर्षक था'एक रचना चुरा कर मैं महान न बन जाता। 'साहित्यिक थानेदारों को मेरे पंजीकृत और खुले पत्र भी नहीं मिले। क्या मतलब इस भाषा में कुछ लिखने का? कोई कभी चुरा लेगा और फिर खुद के महान होने की घोषणा कर देगा। सक्सेना जी का एकान्तवासी होना स्वाभाविक है। मैं तो हो गया। मैं मशहूर नहीं हूँ,पर नरेश जी आप न हों। 'महान' भले ही न हों, पर मशहूर तो हैं। हम ऐसे युग में जीने को विवश हैं, जिस में चोर खुद को आसानी और बेहयाई से महान घोषित कर देते हैं और भेड़ियाधसान जैकारे लगने लगते हैं।

SHIV SHANKAR MISHRA


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