गुरुवार, 19 मार्च 2026

मुंशी सतई सिंह

 Shivshankar Mishra

फ़ेवरेट 6 सितंबर 2024 
अक्षर और अंक बोध तो माँ ने कराया और बड़े बाबा ने। कक्षा तीन से प्राथमिक विद्यालय में जाना हुआ। वहाँ मुंशी सतई सिंह थे, जिनका दृढ़ विश्वास था कि जो पहाड़ा नहीं याद कर सकता, वह पढ़ाई नहीं कर सकता। पहाड़ा कभी याद न हुआ, नतीजतन रोज़ दोनों हथेलियों के गुरु पर्वत मुंशी जी के डंडे की चोट से घायल रहते। जिस दिन मुंशी जी छुट्टी पर रहते हम लोग बेहद खुश होते। सहायक अध्यापक पिटाई नहीं करते थे।कभी कर भी देते,तो प्रतीकात्मक। विद्यालय पहुँच कर हम लोग दूर महुए के पेड़ों तले तक उनकी साइकिल की आतंक पैदा करने वाली चमक देखते।..आ तो नहीं रहे हैं मुंशी जी!
हाँ, एक बात और। जब वे पिटाई करते,तो एक गाली ज़रूर देते,'चमार'। चूँकि मुंशी जी खुद उसी जाति के थे, इस लिए इसे निरामिष ही समझा जाता। होता भी था। कक्षा पाँच की परीक्षा में 'सेंटर' शब्द से परिचय हुआ। मुंशी जी कभी कहते 'सेंटर अमुक जगह जायेगा',कभी कहते- 'नहीं दूसरी जगह जायेगा। हम लोगों में कौतूहल था और भय भी। ..कितना बड़ा होगा सेंटर! ..कहाँ से आयेगा !..पहिये तो बड़े बड़े होंगे! आदि आदि। सेंटर तो आया नहीं। हाँ,हम लोगों को जाना पड़ा। पूरे परीक्षा काल में भय। लिखित परीक्षा होने के बाद पहली बार मुंशी जी मुस्कराते हुए कहा, 'काहे रे चमार, तू ने नंबर तो अच्छे पाये हैं। चल, एक गाना सुना दे।' मुंशी जी की उपस्थिति में गाना? बमुश्किल एक पंक्ति सुनायी। आगे भूल गया। 'चल,चल! ठीक सुनाया।' यह उनके वत्सल रूप का पहला दीदार था। इस तरह मुंशी जी के दृढ़ विश्वास के विपरीत बिना पहाड़ा याद किये प्राथमिक कक्षाओं से निजात मिली।
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