शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

हाइकू

  सुमन पांखुरी

काँटे ही काँटे

उगे हैं जमी पर,
सम्हल कर ही चलना
चुभें ना कहीं पर।

अजब लीला तेरी

ऐ कुदरत है देखी

कि काँटे चुभे हैं

सुमन-पाँखुरी पर।

साँसों का कोई
ठिकाना नही है,

बातों के चर्चे
चले हैं सदी भर।
जिधर देखिये

बस तुमुल ही तुमुल है

कि बजती नहीं

रागिनी बाँसुरी पर।
                               -गौरव मिश्र
जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित

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