मेरे आत्मस्वरूपा हैं शिवशंकर मिश्र (Shivshankar Mishra)। कोई छल-छद्म नहीं, एकदम सच्चे, भोले शंकर, निष्कपट। कंठ में सरस्वती, कर में काम भर की लक्ष्मी। बुजुर्ग की परवाह, बच्चों की सरलता। हम सभी उनको अस्सी के दशक से ही पंडित कहते आए हैं। मेरी बीमारी की बात सुनी तो विह्वल हो गए। बेटे से फोन करवाया। हाल-चाल जाना। बोले – अनिल, हम लोग तो न जाने कब से भूत बन गए चुके हैं, बस शरीर यहां पड़ा है। फिर बातचीत के दौरान भावुक हो गए। बोले – हम न मरब, मरे संसारा।
यह विचार तभी से छज्जे पर बैठे पंछी के टूटे कोमल पंख की तरह मेरे मन में भटक रहा है। कबीर ने जब यह कहा होगा तो उनका मतलब क्या था? कबीर हमारे अपने जिस इलाके में जन्मे, पल-बढ़े, घूमे-फिरे और संतई की, वहां हम का सीधा मतलब ‘मैं’ होता है। उनका कहना था – मैं नहीं मरूंगा, मरेगा यह संसार। क्या कबीर का ‘मैं’ शंकराचार्य का ब्रह्म है या गीता की आत्मा? दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना, रामनाम का मरम है आना – कहनेवाले कबीर का ‘मैं’ ब्रह्म या आत्मा कतई नहीं हो सकता। फिर क्या है?
बुद्ध कहते हैं सब मर जाता है हमारे कर्म नहीं मरते। उनका नैरन्तर्य है। उन्होंने भव-संसार की कड़ी-दर-कड़ी निकाली थी। बुद्ध का कहना था: अनित्य को नित्य, अशुद्ध को शुद्ध, दुख को सुख और अनात्म को आत्म जानना ही अविद्या है और इस अविद्या से ही तमाम संस्कार या मनोगत धारणाएं पैदा होती हैं। मृत्यु के समय जो च्युति संस्कार या सबसे गहरी गांठ होती है, वह नए जन्म का सबब बन जाती है।
बुद्धवाणी में कहा गया है - अविज्जा पच्चया संखारा, संखारा पच्चया विञ्ञाणं, विञ्ञाण पच्चया नामरूपं, नामरूप पच्चया सलायतनं, सलायतन पच्चया फस्सो, फस्स पच्चया वेदना, वेदना पच्चया तण्हा, तण्हा पच्चया उपादानं, उपादान पच्चया भवो, भव पच्चया जाति। अविद्या से संस्कार, उनसे चेतना या प्रकृति के नियमों का बंधन, शरीर व चित्त, मन समेत छह इंद्रियां, स्पर्श, संवेदना, तृष्णा व आसक्ति। आसक्ति से भव-पुनर्भव, भव-संसार और फिर जन्म से मृत्यु तक का चक्र दोबारा चल निकलता है।
हमारे कर्मों से निकले संस्कार ही नए जन्म का आधार बनते हैं। लोक में तो यहां तक मान्यता है कि नया जन्म मनुष्य या किसी जीव के रूप में ही नहीं, पेड़-पौधों तक के रूप में हो सकता है। सीत-बसंत की कथा में दोनों भाइयों को उनकी सौतेली मां मरवा डालती है तो वे अपने घर के पीछे फूलों का पौधा बनकर जन्म लेते हैं।
बुद्ध की बात से लेकर लोक की मान्यता ही कबीर के इस कथन का सार है कि हम न मरब, मरे संसारा। भव की कड़ी टूट जाएगी तो यह भव-संसार मिट जाएगा। लेकिन मैं तो चेतना का नैरन्तर्य हूं। मैं कहां मरनेवाला। उस दिन पंडित ने भी कहा था – चेतना का नैरन्तर्य है। आखिर कौन-सी चेतना का नैरन्तर्य? वही चेतना जो कोई तरल या ठोस नहीं, जिसे हम अपने कर्मों से बराबर जन्म-दर-जन्म गढ़ते व बदलते रहते हैं, परिष्कृत करते रहते हैं, जिसने अरबों साल में मछली, सरीसृप व पक्षी से इंसान बनने तक सफर तय किया है।
शायद इंसान के दो स्वरूप साथ-साथ चलते रहते हैं। एक तो शरीर है जो लीवर से लेकर किडनी, फेफड़े, हृदय व तमाम अंगों-प्रत्यंगों का समन्वय है और दूसरा है उसका मनोमय रूप जो वह पिछले जन्म के च्युति संस्कार से लेकर रेशा-दर-रेशा हमारी क्रिया-प्रतिक्रिया व अनुभवों से बनता जाता है। मरने पर शरीर के रसायन रीसाइकल हो जाते हैं, जबकि मन का भी सब कुछ हवा हो जाता है केवल च्युति सस्कार को छोड़कर जो आगे की यात्रा का आधार बन जाता है। यही चेतना का नैरन्तर्य है। यही जीवन का सातत्य है।
अंत में पंडित की बात से ही अपनी बात समाप्त करता हूं, “यों भी कभी सिर्फ अपने लिए नहीं जिए, अब क्या! मौत की तलाश में इतने जीवन की कल्पना भी कभी नहीं थी!
जय जीवन! जय सातत्य की प्रतीति!
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