मेरी रिक्तता का बोध और
शून्य का एहसास कह रहा
ओ मेरी प्रतिभा मर जाओ
जिन्दगी जुआ जब बन जाये
तब हार जीत के क्या माने।
मैंने सोचा है
मेरी मौत वहाँ हो
जहाँ-न कोई गीध हो
न चील,न कुत्ता,न स्यार
न घड़ियाल
और न कोई-
घड़ियाली आँसू हो।
मनुष्य सदा अपने भाव-संवेगों की अभिव्यक्ति के लिए बेचैन रहा है, ऐसा इतिहास से विदित होता है। इसी अभिव्यक्ति की बेचैनी के क्रम में कभी ध्वनियाँ सार्थक हो गयी होंगी। कभी हर्ष के अतिरेक ने, तो कभी शोक के अतिरेक ने ध्वनियों को सार्थक बना दिया होगा। इस तरह भाषा बनी होगी और संगीत भी। मनुष्य की भाव-संकुलता की अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य को एक मनुष्य की जरूरत है और यह जरूरत कभी समाप्त नहीं होगी। गौरव मिश्र 'मुक्ताभ'
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