माँ
चूल्हे की जलती रोटी सी
तेज आँच में जलती माँ।
भीतर-भीतर बलके फिर भी
बाहर नहीं उबलती माँ ,
रेशे-रेशे धागे बुनती,
नई रुई सी खुद को धुनती
नववीणा की तनी ताँत-सी
घर-आँगन में चलती माँ।
सावन के मेघ जल भरे
सावन के मेघ जल भरे
भीगी पलकों पर उतरे
धान पान तिथियाँ त्योहार की
बेटी ससुराल से पुकारती
फसलों पर ऋण की हरियाली
हँसी झरे होठों से उधार की
ऊपर से आँगन के नखरे
बिजुरी सी चमकें चिन्ताएँ
अँधियारे चलते दायें-बाँये
ऐसे में राह नहीं सूझे
बिजुरी की कौंध आजमायें
पाँवों के चिह्न कहाँ उभरे,
उफनाये ताल नदी नाले
आँगन में ओरी पर नाले
फुफकारें हर कोने से
विपदाओं के विषधर काले
मुरझाये जूड़े के मोंगरे
सावन के मेघ जल भरे।
जनसन्देश में प्रकाशित
2012
No comments:
Post a Comment