कौशलेन्द्र के नवगीत
माँ
चूल्हे की जलती रोटी सी,
तेज ऑंच में जलती मॉं ।।
भीतर-भीतर बलके फिर भी
बाहर नहीं उबलती मॉं।।
धागे धागे यादें बुनती
खुद को नई रुई सा धुनती
दिन भर तनी तॉंत सी बजती
घर ऑंगन में चलती मॉं।।
सिर पर रखे हुए पूरा घर,
अपनी भूख प्यास से ऊपर।
घर को नया जन्म देने में,
धीरे-धीरे गलती मॉं।।
फटी पुरानी मैली धोती,
सॉंस सॉंस में खुशबू बोती।
धूप छॉंह में बनी एक सी
चेहरा नहीं बदलती मॉं।।
चूल्हे की जलती रोटी सी
तेज आँच में जलती माँ।
भीतर-भीतर बलके फिर भी
बाहर नहीं उबलती माँ,
रेशे-रेशे धागे बुनती,
नई रुई सी खुद को धुनती
नववीणा की तनी ताँत-सी
घर-आँगन में चलती माँ।
सावन के मेघ जल भरे
सावन के मेघ जल भरे
भीगी पलकों पर उतरे
धान पान तिथियाँ त्योहार की
बेटी ससुराल से पुकारती
फसलों पर ऋण की हरियाली
हँसी झरे होठों से उधार की
ऊपर से आँगन के नखरे
बिजुरी सी चमकें चिन्ताएँ
अँधियारे चलते दायें-बाँये
ऐसे में राह नहीं सूझे
बिजुरी की कौंध आजमायें
पाँवों के चिह्न कहाँ उभरे,
उफनाये ताल नदी नाले
आँगन में ओरी पर नाले
फुफकारें हर कोने से
विपदाओं के विषधर काले
मुरझाये जूड़े के मोंगरे
सावन के मेघ जल भरे।
जनसन्देश में प्रकाशित
2012


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