संस्मरण के बदले कहानी
लेखक नहीं है। लेकिन उसकी मेज पर रखे शब्द अभी भी हैं। कुछ प्रकाशित हो चुके हैं, कुछ अलमारियों में चुप हैं, और एक कहानी— अभी प्रकाशक की मेज पर पड़ी है। कहानी तैयार है। कागज तैयार है। लेखक नहीं है। शायद साहित्य में यही सबसे कठिन अनुपस्थिति होती है— जब रचना मौजूद हो और रचनाकार अपनी रचना के पक्ष में एक शब्द कहने के लिए भी इस दुनिया में न हो। कभी उसके साथी उसके लेखन का लोहा मानते थे। उसकी कहानियों पर चर्चा होती थी। उसकी भाषा की प्रशंसा होती थी। उसकी दृष्टि को अलग कहा जाता था। उसके शब्दों को याद रखा जाता था। तब लेखक था। अब लेखक नहीं है। और अब— उसकी कहानी को कहानी से अधिक एक प्रमाण चाहिए। प्रकाशक कहता है— “उसके मित्रों से कहिए, वे उस पर संस्मरण लिखें।” अर्थात्— कहानी अभी पर्याप्त नहीं। पहले लेखक की स्मृति प्रमाणित होगी। फिर शायद कहानी पढ़ी जाएगी। या शायद कहानी पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। संस्मरण आएगा। नाम आएगा। प्रशंसा आएगी। और उसके बाद कहानी साहित्य बन जाएगी। क्या यही साहित्य का नया विधान है? रचना पहले नहीं आती— रचनाकार की प्रतिष्ठा पहले आती है। कभी वे साथी थे। एक ही साहित्यिक संसार में।...
