मुक्ताभ
मनुष्य सदा अपने भाव-संवेगों की अभिव्यक्ति के लिए बेचैन रहा है, ऐसा इतिहास से विदित होता है। इसी अभिव्यक्ति की बेचैनी के क्रम में कभी ध्वनियाँ सार्थक हो गयी होंगी। कभी हर्ष के अतिरेक ने, तो कभी शोक के अतिरेक ने ध्वनियों को सार्थक बना दिया होगा। इस तरह भाषा बनी होगी और संगीत भी। मनुष्य की भाव-संकुलता की अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य को एक मनुष्य की जरूरत है और यह जरूरत कभी समाप्त नहीं होगी।
सोमवार, 20 अप्रैल 2026
'अंतिम उच्चारण' : संवेदना, प्रतीक और मनोवैज्ञानिक विस्थापन का आलोचनात्मक विश्लेषण -
रविवार, 19 अप्रैल 2026
पखावज वृत्तान्त- शिवशंकर मिश्र
महाराज इन्द्र के दरबार में संगीत की सभा बैठी। दरबारियों ने महाराज से निवेदन किया कि वे स्वयं पखावज बजायें........और एक ताजा मिढ़ा हुआ पखावज महाराज के सामने हाजिर किया गया। तमाम दरबारी उत्सुक होकर बैठे.....लेकिन पखावज से कोई कर्णप्रिय बोल नहीं निकला। बदले में वह भाँय−भाँय करके रह गया। महाराज ने पखावज को इधर−उधर से देखा। दरबारियों ने भी पखावज का ही निरीक्षण किया। महाराज के बजाने में तो कोर−कसर थी नहीं। बाकी दिनों तो वे बहुत मीठा बजाते थे। लोग हैरान हुए......काफी देर में एक दरबारी ने, जो खुद भी कभी पखावज बजता था, खड़े होकर निवेदन किया, ''महाराज, यह जो भाँय−भाँय कर रहा है, शायद भात मॉँग रहा है!'' भात मँगवाया गया। पखावज के चमड़े में मसाला और सियाही थी। दूसरी तरफ भात लगाया गया। फिर क्या था! पखावज के मधुर बोलों में दरबारी,अप्सराएं और नंदनवन सब झूम उठे। राजमहल की दीवारें हिलने लगीं.....लेकिन यह क्या! लोग अवाक् रह गये। महाराज ने पखावज को अपने से दूर झिटक दिया और कहा, ''इसे महल के पिछवाड़े नाले में फेंक दिया जाय।''
दूसरे दिन जब महाराज का दरबार लगा था, मेहनत−मजूरी करने वाले शूद्रों का एक दल महल के पिछवाड़े की राह से गुजरा। उन्होंने नाले के गन्दे पानी में पखावज को तैरते हुए देखा। एक नौजवान जो गाने−बजाने में निपुण था, नाले में कूद पड़ा और पखावज को उठा लाया। दल के मुखिया को पखावज दिखाया गया। दोनों तरफ का चाम पानी से फूल उठा था.....ठोंकने से भद्द−भद्द की आवाज हो रही थी। एक कारीगर ने बताया कि थोड़ा धूप दिखाने से ही यह सुन्दर हो जायेगा.....लेकिन दल के मुखिया और तमाम बुजुर्गों ने जोर डालकर यह बात कही कि पखावज राजमहल के पिछवाड़े नाले में मिला है, इसलिए साथ ले चलने के पहले यहां के राजा से पूछना जरूरी है।
महाराज ने कहा, ''तुम इसे ले जा सकते हो।'' महाराज से मिलाने गए बुजुर्गों के साथ थोड़े से नौजवान भी थे। उनमें से एक, जो गाने−बजाने में निपुण था, पूछ बैठा, ''लेकिन यह नाले में क्यों फेंका गया था, जब कि यह काफी सुन्दर है और इसकी काठी ऐसी है कि बड़े मधुर बोल फूटते होंगे।'' यह सुनकर तमाम दरबारी खिल उठे, लेकिन तुरन्त ही महाराज की ओर देख गम्भीर हो गये। महाराज बोले, ''भात लगाने से यह जूठा हो चुका है और हम जूठी चीजों का इस्तेमाल नहीं करते।'' ....और तब से महाराज के दरबार में और भी पखावज मिढ़वाये गये। लेकिन कोई भी पखावज बिना भात के नहीं बजा....और इस तरह जूठा हो जाने की वजह से उन सब को नाले में उपेक्षित कर दिया गया। बहुत से पखावज नाले के गंदे, ठंडे और स्थिर पानी में सड़ गये.... लेकिन जो मेहनतकशों के हाथ लगे, उन्हें धूप दिखायी गयी, उनमें सुन्दर जोशीले बोल फूटे और चिरंजीवी हो गये।
''गाँव की नई आवाज़'' इलाहाबाद 2019 में प्रकाशित
('अभिप्राय' अप्रैल, 1983, इलाहाबाद, से साभार)
गुरुवार, 19 मार्च 2026
निराला और महादेवी
12 सितंबर 2024
मुंशी सतई सिंह
6 सितंबर 2024 ·
लेखपाल नुमा बुजुर्ग
·वह कौन सा वर्ष था, याद नहीं, जब देवेन्द्र जी एक लेखपाल नुमा बुजुर्ग के साथ बिरला छात्रावास (बी.एच.यू.) के मेरे कमरे में आये और बोले- 'ये त्रिलोचन जी हैं और आज ही इन्हें दिल्ली जाना है।' उस दिन शहर में कर्फ़्यू था। रिक्शे बंद थे। आखिरकार एक साइकिल का इंतजाम किया गया। त्रिलोचन जी ख़ुशी से आगे बैठ गये। मैं ने महसूस किया कि भारी वजन है इस ठोस काया का। देवेन्द्र जी तो मुक्त हो गये थे। अब मैं और त्रिलोचन और साइकिल। हाँ, शहर के बाहर का रास्ता मुझे मालूम नहीं था, मगर शहर से बाहर आकर त्रिलोचन जी मुखर हो गये- 'मुझे सब पता है। चलिए। हाँ आप को परेशानी हो रही हो, तो साइकिल मैं चलाऊँ।' मैं चौंक गया। यह उम्र और यह कद काठी, ये साइकिल चलायेंगे, वह भी मुझे बैठा कर?'
'नहीं नहीं। आप बैठे रहें। बस मुझे रास्ता बताते रहें।'
फिर तो वे रास्ता ही नहीं, रास्ते में मिलने वाली एक एक घास का सविस्तार परिचय देने लगे।कभी कभी तो साइकिल से उतर कर भी। जंक्शन से पहले तक वे चुप नहीं हुए। कैसे उन्होंने लाहौर में रिक्शा चलाया और और भी बहुत कुछ। अब मैं अभिभूत हो रहा था। संस्कृत की उनकी बहुज्ञता से लाहौर वाले प्रसंग में ही परिचित हुआ। बकौल त्रिलोचन, उनके रिक्शे पर संस्कृत के दो विद्वान बैठे थे और एक शब्द की व्युत्पत्ति पर जिरह कर रहे थे। जिरह खत्म नहीं हुई। मंजिल तक पहुँचाकर त्रिलोचन जी ने रिक्शा रोका और उनकी जिरह सही उत्तर देकर खत्म करवायी। ट्रेन आ गयी। त्रिलोचन चले गये और अपनी सहजता और सरलता के साथ मेरे भीतर उतर गये..!
कुछ महीनों पहले प्रोफ़ेसर राजेन्द्र कुमार
19 अगस्त 2024 ·
कुछ महीनों पहले Rajendra Kumar (प्रोफ़ेसर राजेन्द्र कुमार) से फोन पर बात हो रही थी। बीच में कुछ ऐसा हुआ कि बात अधूरी रही और फोन कट गया। मैं ने लिख भेजा कि तकनीक की समस्या से बात अधूरी रही। तत्त्काल प्रोफ़ेसर कुमार का आशुकवि रूप देखने को मिला -'तन नीक रहै,मन नीक रहै,तकनीक रहै कि रहै न रहै। यों यह वाग्विनोद ही था, मगर यह भी प्रमाणित हुआ कि मुक्त छन्द में लिखने वाले कवियों की सहज अभिव्यक्ति में भी छंद साधना निहित होती है। किसी मजबूरी में उन्हें छंद का अतिक्रमण करना पड़ता है, लेकिन आंतरिक लय का नहीं।

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