बुधवार, 20 मई 2026

अपना–पराया

अपना कौन… पराया कौन…
ये वक्त बताता है,
जो दर्द में साथ निभाए,
वही अपना कहलाता है।

चेहरे तो सब हँसते मिलते,
दिल कौन पढ़ पाता है,
इस मतलब की दुनिया में
हर रिश्ता आज़माया जाता है।

कुछ लोग दुआओं जैसे थे,
फिर क्यों सपनों से बिछड़ गए,
जिन हाथों को थामा था हमने,
वो हाथ ही आखिर छोड़ गए।

दिल चुपके-चुपके रोता है,
आँखों से कुछ ना कहता है,
जो अपना लगता था कल तक,
आज वही बेगाना है।

अपना कौन… पराया कौन…
ये दिल समझ ना पाया है,
जिसे चाहा टूट के हमने,
उसी ने दिल दुखाया है।

माँ की ममता, पिता  का साया,
रब की सबसे बड़ी दुआ,
बाकी जग का सारा रिश्ता 
वक्त के संग में बदला  हुआ।

दौलत वाले यार बहुत थे,
ग़म में कोई आया ना,
तन्हा रातों ने ये सिखलाया,
अपना कोई साया ना।

फिर भी दिल उम्मीद लिए है,
कोई तो सच्चा होगा,
इस पत्थर जैसी दुनिया में
कोई दिल से अपना होगा।

भारतीय साहित्य में आज क्या चल रहा है?

भारतीय साहित्य आज एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। यह केवल किताबों, पुस्तकालयों और साहित्यिक गोष्ठियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, यूट्यूब, पॉडकास्ट, वेब सीरीज़ और बोलचाल की कविताओं तक फैल चुका है। आज का साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण, प्रतिरोध की आवाज़ और बदलते समय का दस्तावेज़ बन गया है।

एक समय था जब भारतीय साहित्य मुख्यतः पौराणिक कथाओं, आध्यात्मिकता, राष्ट्रवाद और सामाजिक आदर्शों के इर्द-गिर्द घूमता था। मुंशी प्रेमचंद, रवीन्द्रनाथ टैगोर और महादेवी वर्मा जैसे साहित्यकारों ने समाज की संवेदनाओं को शब्द दिए। लेकिन आज का साहित्य बदलते भारत की बेचैनी, संघर्ष और टूटन को नए ढंग से प्रस्तुत कर रहा है।

आज के भारतीय साहित्य में बेरोज़गारी, ऑनलाइन ठगी, मानसिक तनाव, जातिगत भेदभाव, स्त्री-असमानता, धार्मिक ध्रुवीकरण, अकेलापन और डिजिटल जीवन की कृत्रिमता जैसे विषय प्रमुख हो चुके हैं। अब साहित्य आदर्श नायकों की कहानियाँ नहीं, बल्कि आम इंसान के संघर्ष की सच्चाई लिख रहा है।

क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य भी तेजी से उभर रहा है। हिंदी, उर्दू, तमिल, बंगाली, मराठी, पंजाबी, भोजपुरी और मलयालम जैसी भाषाओं के लेखक नई पहचान बना रहे हैं। पहले अंग्रेज़ी साहित्य को अधिक महत्व मिलता था, लेकिन अब क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियाँ अनुवादों और इंटरनेट के माध्यम से दुनिया तक पहुँच रही हैं।

सोशल मीडिया ने साहित्य को पूरी तरह बदल दिया है। इंस्टाग्राम कविता, माइक्रो-फिक्शन, रील आधारित कहानी और स्पोकन वर्ड पोएट्री ने युवाओं को लेखन की ओर आकर्षित किया है। अब किसी लेखक को अपनी रचना प्रकाशित कराने के लिए बड़े प्रकाशकों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। मोबाइल फोन ही उसका मंच बन गया है।

महिला लेखिकाएँ और दलित साहित्यकार आज साहित्य की दिशा बदल रहे हैं। वे केवल कहानियाँ नहीं लिख रहे, बल्कि समाज की छिपी हुई सच्चाइयों को सामने ला रहे हैं। आत्मकथात्मक लेखन और प्रतिरोध साहित्य ने भारतीय साहित्य को अधिक साहसी और वास्तविक बनाया है।

इसके साथ-साथ साहित्य और सिनेमा का संबंध भी गहरा हो गया है। कई उपन्यास और कहानियाँ अब वेब सीरीज़ और फिल्मों के रूप में सामने आ रही हैं। लेखन में दृश्यात्मकता बढ़ी है और कहानी कहने का तरीका अधिक सिनेमाई होता जा रहा है।

हालाँकि साहित्य के सामने चुनौतियाँ भी हैं। लोगों की पढ़ने की आदत कम हो रही है। तेज़ रफ्तार डिजिटल दुनिया में गहरे साहित्य को समय देना कठिन होता जा रहा है। बाज़ारवाद भी साहित्य को प्रभावित कर रहा है, जहाँ कई बार गुणवत्ता से अधिक लोकप्रियता को महत्व मिलता है।

फिर भी भारतीय साहित्य समाप्त नहीं हो रहा, बल्कि एक नए रूप में जन्म ले रहा है। यह पहले से अधिक बहुभाषी, लोकतांत्रिक, विद्रोही और जीवंत हो चुका है। आज का भारतीय लेखक केवल कहानीकार नहीं, बल्कि बदलते समाज का साक्षी है।

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

'अंतिम उच्चारण' : संवेदना, प्रतीक और मनोवैज्ञानिक विस्थापन का आलोचनात्मक विश्लेषण -

प्रस्तावना : कथा का वैचारिक धरातल और सामरिक महत्व-
शिवशंकर मिश्र की कहानी 'अंतिम उच्चारण' हिंदी कथा-साहित्य के यथार्थवादी परिप्रेक्ष्य में एक अत्यंत गंभीर और रणनीतिक हस्तक्षेप है। इसे केवल एक मूक बालक की त्रासदी नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना की उस सूक्ष्म क्रूरता का अनावरण है, जहाँ 'वाणी' पर वर्चस्व रखने वाला वर्ग मूक संवेदनाओं का व्यवस्थित विस्थापन करता है। कहानी का केंद्रबिंदु (बई) है, जिसके माध्यम से लेखक ने यह सिद्ध किया है कि कैसे एक व्यक्ति की विशिष्टता को सामाजिक साँचों में ढालने की प्रक्रिया वास्तव में उसकी 'मनोवैज्ञानिक हत्या' है।
कहानी के शीर्षक 'अंतिम उच्चारण' की सार्थकता इसके द्वंद्वात्मक विकास में निहित है। बालक द्वारा पहली बार 'बेर' कहने की विफल चेष्टा से उपजा शब्द 'बईऽऽ' उल्लास और सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक था, जिसने उसे एक नाम और पहचान दी। परंतु, कहानी के अंत में अपनी माँ के लिए निकला आर्त्तनाद 'बाँईऽऽ' उसकी स्वतंत्र चेतना का अंतिम संवेग सिद्ध होता है। उल्लास से करुणा तक की यह भाषाई यात्रा वास्तव में मानवीय संवेदनाओं के दमन का इतिहास है। यह कथा-तंतु हमें उस भाषाई अपवर्जन (Linguistic Exclusion) की ओर ले जाता है जहाँ मूक अभिव्यक्ति के अपने स्वर होते हैं।
कथा-शैली और शिल्प: मूक अभिव्यक्ति का स्वर-
लेखक की कथा-शैली शब्दों के अभाव को शारीरिक संवेदनाओं और ध्वन्यात्मक प्रतिस्थापनों से भरने की एक अनूठी कला है। यहाँ 'मौन' केवल संवाद की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि एक सघन उपस्थिति है। जब शब्द मर जाते हैं, तो 'सूंघने-चाटने', 'गुदगुदी' और 'स्पर्श' जैसी इंद्रियां संचार का प्राथमिक माध्यम बन जाती हैं। 'बाई' का मंदिर के पत्थरों को सूंघना या नए कुर्ते की चिकनाई से गुदगुदी महसूस करना उसके 'इंद्रियगत विमर्श' को पुख्ता करता है।
लेखक ने 'कुटम्मस' और 'भच्छाभच्छ' जैसे आंचलिक शब्दों का प्रयोग केवल वातावरण रचने के लिए नहीं, बल्कि सवर्ण दंभ और सामाजिक घृणा को चित्रित करने के लिए किया है। 'निर्मल हँसी' यहाँ एक शिल्पगत उपकरण है जो 'बई' के आंतरिक सौंदर्य और बाहरी समाज की वैचारिक कुरुपता के बीच के अंतराल को रेखांकित करती है।
भाषा-शैली के प्रमुख घटक-स्थानीय भाषाई पुट: ग्रामीण शब्दावली का प्रयोग सवर्ण सत्ता और हाशिए के समाज के बीच के शक्ति-संबंधों को विसंकेतित (Decode) करने के लिए किया गया है।

इंद्रियपरक मनोवैज्ञानिक गहराई: जब शब्द विफल होते हैं, तो लेखक पात्र के 'प्राथमिक संवेगों' (जैसे तेल पीना, मिट्टी सूंघना) के माध्यम से उसकी मानसिक अवस्था का विश्लेषण करता है।

दृश्य बिम्बों का सामरिक उपयोग: 'झरबेरी की पोटली' से लेकर 'खून के फौव्वारे' तक के दृश्य बिम्ब कहानी को एक ठोस भौतिक धरातल प्रदान करते हैं। यह कथा-शिल्प उन प्रतीकों की ओर ले जाता है, जो पात्र की आकांक्षाओं और सामाजिक विस्थापन के मूक गवाह हैं।

प्रतीकों का विश्लेषण: 'झरबेरी' से 'दर्पण' तक का सफर-
  इस कहानी में वस्तुओं का चयन रणनीतिक है; वे पात्र की चेतना का विस्तार हैं।झरबेरी और ककड़ी (साझा करने का आदिम सुख): झरबेरी तोड़ना और उसे 'बईऽऽ' के घोष के साथ बांटना 'बई' के लिए सामाजिक स्वीकृति और आत्मीयता का आदिम संचार है। ककड़ी का प्रतीक इस साझापन को उसके चरमोत्कर्ष तक ले जाता है, जहाँ वह अपने 'परम स्वाद' को सार्वजनिक करने की आकांक्षा रखता है, जो अंततः एक वर्ग-संघर्ष का ट्रिगर बन जाता है।

दर्पण/ऐना (आत्म-बोध और सामाजिक हीनता): चम्पा की टिप्पणी "ऐना में सूरत निहार ले" दर्पण को एक क्रूर उपकरण बना देती है। दर्पण यहाँ आत्म-पहचान की चाहत और सामाजिक अस्वीकृति का संधि-स्थल है। 'बई' के लिए दर्पण की तलाश वास्तव में खुद को समाज की 'सामान्य' परिभाषा में खोजने की एक विफल छटपटाहट है।

रेंड़ के पत्ते और पम्पिंग सेट (पशुकरण और यांत्रिक निर्वासन): थाली के बजाय 'रेंड़ के पत्ते' पर खाना दिया जाना केवल सामाजिक बहिष्कार नहीं, बल्कि 'पात्र का पशुकरण' (Animalization) है। यह मानवीय गरिमा के लोप का 'अस्पृश्यतावादी व्याकरण' है। 'पम्पिंग सेट' खेत के किनारे एक निर्जन स्थान है, जो 'बाई' के लिए 'यांत्रिक निर्वासन' (Mechanical Exile) का प्रतीक है, जहाँ उसे मुख्यधारा के समाज से दूर धकेल दिया गया है।

ये प्रतीक स्पष्ट करते हैं कि निर्जीव वस्तुएं भी मानवीय क्रूरता और सामाजिक बहिष्कार के औजार बन सकती हैं।
पात्रों का मनोवैज्ञानिक विकास और सामाजिक व्यवहार-

'बई' का मनोवैज्ञानिक विकास उल्लासपूर्ण अन्वेषण से 'मैसोचिस्टिक' (Masochistic) विस्थापन की ओर एक त्रासद यात्रा है। हरखू मिसिर की महत्वाकांक्षा कि उसका गूंगा बेटा 'गूंगा पहलवान' बनकर लठैत बने, पितृसत्तात्मक संरचना की उस क्रूरता को दर्शाता है, जो दिव्यांगता में भी उपयोगिता (Utility) खोजती है।

जब 'बई' अपनी माँ के घूंसों को 'ममता की गुदगुदी' समझने लगता है, तो यह उसके मनोवैज्ञानिक पतन का चरम है। अत्यधिक सामाजिक प्रताड़ना ने उसकी दर्द की संवेदना को विकृत कर दिया है। यह 'आघात का आंतरीकरण' (Internalization of Trauma) है, जहाँ उत्पीड़न ही उसे सुरक्षा का आभास देने लगता है।

तुलनात्मक अध्ययन : 'बाई' के जीवन के मनोवैज्ञानिक चरण-
आधार- चरण 1: उल्लास और अन्वेषण। चरण 2: प्रायश्चित और मनोवैज्ञानिक मृत्यु-

अभिव्यक्ति- 'निर्मल हँसी', 'बईऽऽ' और 'ककई' का उल्लासपूर्ण घोष। पूर्ण मौन, शब्दों का लोप, कोठरी में आत्म-गोपन।

संवेदना-   दूसरों को 'सुख' (झरबेरी) बांटने की तीव्र इच्छा। अपनी 'पीड़ा' को भी न पहचानना (मार को गुदगुदी समझना)।

सामाजिक स्थिति- बच्चों के बीच 'सखा' के रूप में एक अस्थायी स्वीकृति। 'कुजात' और 'कारनी' के रूप में पूर्ण बहिष्कृत।

मानसिक अवस्था- निर्भयता, जिज्ञासा और प्रकृति से जुड़ाव। आतंक, स्मृति-लोप और चेतना का विस्थापन। यह विस्थापन पिता की मृत्यु और उसके बाद थोपे गए 'प्रायश्चित' के माध्यम से पूर्णता को प्राप्त करता है।

वर्ग-भेद, जातिगत चेतना और विस्थापन की त्रासदी-
    कहानी में व्याप्त सामाजिक स्तरीकरण 'बई' की नियति का मुख्य सूत्रधार है। सवर्ण टोले की 'शास्त्रीय क्रूरता' और हरिजन बस्ती की 'सहज आत्मीयता' के बीच का द्वंद्व जातिगत पाखंड को बेनकाब करता है।

      शास्त्री जी का पात्र धार्मिक पाखंड की अधिरचना (Superstructure) का प्रतिनिधित्व करता है। 'मनुस्मृति' का हवाला देना, उसे 'अशुभ' और 'पितरघाती' घोषित करना, और 'पंचगव्य' व 'शंखपुष्पी' के माध्यम से 'प्रायश्चित' का स्वांग रचना—यह सब उस 'शास्त्रीय हिंसा' का हिस्सा है, जो मनुष्य को सुधारने के नाम पर उसकी आत्मा को कुचल देती है। 'सुअर का मांस' खाने का आरोप वास्तव में उसे मानवीय श्रेणी से बाहर करने का एक बहाना मात्र है।

हरखू मिसिर की हत्या का 'सो वॉट' विश्लेषण यह है कि यह केवल एक हिंसक घटना नहीं थी, बल्कि दो सवर्ण परिवारों (मिसिर और पांडे) के बीच का 'अहंकार युद्ध' था। 'ककड़ी' केवल एक ट्रिगर बनी। 'बई' इस सवर्ण वर्चस्व की लड़ाई में अनचाहे ही पिस गया। हाशिए का यह पात्र मुख्यधारा के संघर्षों में केवल एक साधन (Tool) बनकर रह गया, जिसका अंत उसके अस्तित्व के आधार के ढहने के रूप में हुआ।

निष्कर्ष: 'अंतिम उच्चारण' - एक शब्दहीन विदाई-
कहानी का समापन सामाजिक पाखंड पर एक घातक प्रहार है। अंतिम वाक्य—"अब वह सुधर गया है"—हिंदी साहित्य के सबसे क्रूर व्यंग्यों में से एक है। समाज जिसे 'सुधार' कह रहा है, वह वास्तव में एक मनुष्य की जीवंत संवेदना, उसकी मौलिकता और उसकी संवाद करने की विफल, किंतु पवित्र चेष्टा की व्यवस्थित हत्या है।

साहित्यिक शोधकर्ताओं के लिए मुख्य निष्कर्ष:-
भाषाई अपवर्जन और संरचनात्मक हिंसा: भाषा के अधिकार से वंचित करना समाज द्वारा की जाने वाली सबसे बड़ी हिंसा है, जो पात्र को आत्म-विस्मृति की ओर धकेलती है।

धार्मिक पाखंड और 'शुचिता' का विमर्श- 'प्रायश्चित' जैसे कर्मकांड मानवीय गरिमा को नष्ट करने और सामाजिक नियंत्रण बनाए रखने के उपकरण हैं।

मनोवैज्ञानिक विस्थापन- सामाजिक बहिष्कार अंततः व्यक्ति को एक ऐसी अचेतन स्थिति में ले जाता है जहाँ शरीर जीवित रहता है, परंतु सामाजिक मनुष्य की मृत्यु हो जाती है।

अंतिम संदेश- 'अंतिम उच्चारण' केवल एक कहानी नहीं, बल्कि पाठक की अंतरात्मा का परीक्षण है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जिस समाज में 'मौन' और 'अदृश्यता' को 'सुधार' मान लिया जाए, क्या वहां हम सब उस मूक हत्या के साझीदार नहीं हैं? 'बई' की खामोशी उस सभ्य समाज के चेहरे पर एक रक्तरंजित तमाचा है, जो केवल अपनी सत्ता की भाषा सुनना चाहता है।


रविवार, 19 अप्रैल 2026

पखावज वृत्तान्त- शिवशंकर मिश्र


              महाराज इन्द्र के दरबार में संगीत की सभा बैठी। दरबारियों ने महाराज से निवेदन किया कि वे स्वयं पखावज बजायें........और एक ताजा मिढ़ा हुआ पखावज महाराज के सामने हाजिर किया गया। तमाम दरबारी उत्सुक होकर बैठे.....लेकिन पखावज से कोई कर्णप्रिय बोल नहीं निकला। बदले में वह भाँय−भाँय करके रह गया। महाराज ने पखावज को इधर−उधर से देखा। दरबारियों ने भी पखावज का ही निरीक्षण किया। महाराज के बजाने में तो कोर−कसर थी नहीं। बाकी दिनों तो वे बहुत मीठा बजाते थे। लोग हैरान हुए......काफी देर में एक दरबारी ने, जो खुद भी कभी पखावज बजता था, खड़े होकर निवेदन किया, ''महाराज, यह जो भाँय−भाँय कर रहा है, शायद भात मॉँग रहा है!'' भात मँगवाया गया। पखावज के चमड़े में मसाला और सियाही थी। दूसरी तरफ भात  लगाया गया। फिर क्या था! पखावज के मधुर बोलों में दरबारी,अप्सराएं और नंदनवन सब झूम उठे। राजमहल की दीवारें हिलने लगीं.....लेकिन यह क्या! लोग अवाक् रह गये। महाराज ने पखावज को अपने से दूर झिटक दिया और कहा, ''इसे महल के पिछवाड़े नाले में फेंक दिया जाय।''

              दूसरे दिन जब महाराज का दरबार लगा था, मेहनत−मजूरी करने वाले शूद्रों का एक दल महल के पिछवाड़े की राह से गुजरा। उन्होंने नाले के गन्दे पानी में पखावज को तैरते हुए देखा। एक नौजवान जो गाने−बजाने में निपुण था, नाले में कूद पड़ा और पखावज को उठा लाया। दल के मुखिया को पखावज दिखाया गया। दोनों तरफ का चाम पानी से फूल उठा था.....ठोंकने से भद्द−भद्द की आवाज हो रही थी। एक कारीगर ने बताया कि थोड़ा धूप दिखाने से ही यह सुन्दर हो  जायेगा.....लेकिन दल के मुखिया और तमाम बुजुर्गों ने जोर डालकर यह बात कही कि पखावज राजमहल के पिछवाड़े नाले में मिला है, इसलिए साथ ले चलने के पहले यहां के राजा से पूछना जरूरी है। 

                 महाराज ने कहा, ''तुम इसे ले जा सकते हो।'' महाराज से मिलाने गए बुजुर्गों के साथ थोड़े से नौजवान भी थे। उनमें से एक, जो गाने−बजाने में निपुण था, पूछ बैठा, ''लेकिन यह नाले में क्यों फेंका गया था, जब कि यह काफी सुन्दर है और इसकी काठी ऐसी है कि बड़े मधुर बोल फूटते होंगे।'' यह सुनकर तमाम दरबारी खिल उठे, लेकिन तुरन्त ही महाराज की ओर देख गम्भीर हो गये। महाराज बोले, ''भात लगाने से यह जूठा हो चुका है और हम जूठी चीजों का इस्तेमाल नहीं करते।'' ....और तब से महाराज के दरबार में और भी पखावज मिढ़वाये गये। लेकिन कोई भी पखावज बिना भात के नहीं बजा....और इस तरह जूठा हो जाने की वजह से उन सब को नाले में उपेक्षित कर दिया गया। बहुत से पखावज नाले के गंदे, ठंडे और स्थिर पानी में सड़ गये.... लेकिन जो मेहनतकशों के हाथ लगे, उन्हें धूप दिखायी गयी, उनमें सुन्दर जोशीले बोल फूटे और चिरंजीवी हो गये।

''गाँव की नई आवाज़'' इलाहाबाद 2019 में प्रकाशित

('अभिप्राय' अप्रैल, 1983, इलाहाबाद, से साभार)

दो दुनियाओं की कहानी


अपना–पराया

अपना कौन… पराया कौन… ये वक्त बताता है, जो दर्द में साथ निभाए, वही अपना कहलाता है। चेहरे तो सब हँसते मिलते, दिल कौन पढ़ पाता है, इस मतलब की द...