परजीवी पुत्र
कुछ पुत्र जन्म नहीं लेते, धीरे-धीरे माता-पिता के त्याग पर उग आते हैं। वे घर में रहते हैं, पर घर का भार नहीं उठाते। उनकी पत्नियाँ सुविधाओं को जीवन समझती रहती हैं, और बूढ़े माँ-बाप धीरे-धीरे घर की वस्तु बनते जाते हैं। पिता की देह एक पुराने वृक्ष की तरह हर मौसम सहती रहती है। उसकी थकी हुई नसों में अब भी घर की रोटियाँ चलती रहती हैं। माँ अपनी भूख, अपनी दवाइयाँ, अपनी इच्छाएँ धीरे-धीरे छोड़ती रहती है। और उसी त्याग के बीच बेटों के घर बसते रहते हैं। बहुएँ अपनी दुनिया में व्यस्त, बेटे अपनी असफलताओं में डूबे, और दो बूढ़े लोग अपने ही घर में धीरे-धीरे अनावश्यक होते हुए। यह केवल आर्थिक निर्भरता नहीं होती, यह आत्मा की परजीविता होती है। जहाँ मनुष्य दूसरों के श्रम पर जीते-जीते अपना आत्मबल खो देता है। पिता अब कम बोलता है। उसे पता चल जाता है कि उसके जीवित रहने से अधिक उसकी पेंशन जरूरी हो चुकी है। माँ रात में खाँसते हुए भी दरवाज़े की आहट सुनती रहती है, मानो कोई बेटा फिर से छोटा होकर लौट आएगा। लेकिन समय एक बार बड़ा हो जाने के बाद वापस बच्चा नहीं बनता। फिर एक दिन पिता चला जाता है। घर में कुछ देर शोक ठहरता है...