मुक्ताभ
मनुष्य सदा अपने भाव-संवेगों की अभिव्यक्ति के लिए बेचैन रहा है, ऐसा इतिहास से विदित होता है। इसी अभिव्यक्ति की बेचैनी के क्रम में कभी ध्वनियाँ सार्थक हो गयी होंगी। कभी हर्ष के अतिरेक ने, तो कभी शोक के अतिरेक ने ध्वनियों को सार्थक बना दिया होगा। इस तरह भाषा बनी होगी और संगीत भी। मनुष्य की भाव-संकुलता की अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य को एक मनुष्य की जरूरत है और यह जरूरत कभी समाप्त नहीं होगी। यदि यहाँ लिखे शब्द आपके मन में किसी विचार, संवेदना या प्रश्न को जन्म दें, तो यही इस ब्लॉग की सार्थकता होगी।
शनिवार, 23 मई 2026
अभाव का मौन
बुधवार, 20 मई 2026
अपना–पराया
चेहरे तो सब हँसते मिलते,
दिल कौन पढ़ पाता है,
इस मतलब की दुनिया में
हर रिश्ता आज़माया जाता है।
कुछ लोग दुआओं जैसे थे,
फिर क्यों सपनों से बिछड़ गए,
जिन हाथों को थामा था हमने,
वो हाथ ही आखिर छोड़ गए।
दिल चुपके-चुपके रोता है,
आँखों से कुछ ना कहता है,
जो अपना लगता था कल तक,
आज वही बेगाना है।
अपना कौन… पराया कौन…
ये दिल समझ ना पाया है,
जिसे चाहा टूट के हमने,
उसी ने दिल दुखाया है।
माँ की ममता, पिता का साया,
रब की सबसे बड़ी दुआ,
बाकी जग का सारा रिश्ता
वक्त के संग में बदला हुआ।
दौलत वाले यार बहुत थे,
ग़म में कोई आया ना,
तन्हा रातों ने ये सिखलाया,
अपना कोई साया ना।
फिर भी दिल उम्मीद लिए है,
कोई तो सच्चा होगा,
इस पत्थर जैसी दुनिया में
कोई दिल से अपना होगा।
@गौरव मिश्र
भारतीय साहित्य में आज क्या चल रहा है?
सोमवार, 20 अप्रैल 2026
'अंतिम उच्चारण' : संवेदना, प्रतीक और मनोवैज्ञानिक विस्थापन का आलोचनात्मक विश्लेषण -
रविवार, 19 अप्रैल 2026
‘पखावज वृत्तान्त’ : श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान
‘पखावज वृत्तान्त’ : श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान -
आदरणीय डॉ0 शिवशंकर मिश्र जी की कहानी ‘पखावज वृत्तान्त’ भारतीय समाज की जातिगत विडम्बनाओं, श्रम की उपेक्षा और सांस्कृतिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य करती है। आकार में छोटी होने के बावजूद यह कहानी अपने भीतर अत्यन्त व्यापक सामाजिक अर्थ समेटे हुए है। लेखक ने प्रतीकात्मक शैली के माध्यम से यह दिखाया है कि समाज जिन वस्तुओं, व्यक्तियों अथवा श्रम को ‘जूठा’ कहकर तिरस्कृत करता है, वही वास्तव में जीवन और सृजन के सबसे आवश्यक तत्व होते हैं।
कथ्य
कहानी का मूल कथ्य भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत ऊँच-नीच, श्रम की उपेक्षा और सामाजिक पाखंड को उजागर करना है। लेखक यह स्थापित करना चाहता है कि जिन श्रमिकों और निम्नवर्गीय लोगों के श्रम से समाज और संस्कृति जीवित रहती है, उसी समाज में उन्हें तिरस्कार और अपमान का सामना करना पड़ता है। ‘भात’ और ‘पखावज’ के माध्यम से कहानी यह बताती है कि जीवन, कला और सृजन का वास्तविक आधार श्रम है, किन्तु सामंती मानसिकता उसे स्वीकार करने के बावजूद सम्मान नहीं देती। अंततः कहानी श्रमशील जनता की जीवटता और लोक-संस्कृति की अमर शक्ति को रेखांकित करती है।
कथानक
कहानी का कथानक अत्यन्त सरल किन्तु अर्थगर्भित है। इन्द्र के दरबार में पखावज बजाने की तैयारी होती है, किन्तु बिना ‘भात’ लगाए उससे मधुर ध्वनि नहीं निकलती। जब भात लगाया जाता है, तब पखावज जीवंत हो उठता है, किन्तु उसी क्षण उसे ‘जूठा’ मानकर नाले में फेंक देने का आदेश दे दिया जाता है। आगे चलकर वही पखावज मेहनतकश शूद्रों के हाथों में जाकर पुनर्जीवित होता है। यह कथानक केवल एक वाद्ययंत्र की कथा नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक संरचना का रूपक है।
कहानी में ‘पखावज’ केवल वाद्य नहीं, बल्कि श्रमशील मनुष्य और लोक-संस्कृति का प्रतीक है। ‘भात’ यहाँ उस श्रम, स्पर्श और जीवन-रस का प्रतीक बन जाता है जिसके बिना कोई कला जीवित नहीं रह सकती। विडम्बना यह है कि जिस भात से पखावज में मधुरता आती है, उसी के कारण उसे अपवित्र घोषित कर दिया जाता है। लेखक ने इसी विरोधाभास के माध्यम से ऊँच-नीच की मानसिकता पर गहरी चोट की है।
कहानी का सबसे प्रभावशाली पक्ष उसका व्यंग्य है। महाराज और दरबारियों का व्यवहार उस सामंती मानसिकता को उजागर करता है, जो श्रम के उपयोग को तो स्वीकार करती है, किन्तु श्रमिक के सम्मान को नहीं। दरबार में बार-बार नए पखावज मिढ़वाए जाते हैं, परन्तु हर बार वे ‘जूठे’ घोषित कर दिए जाते हैं। यह स्थिति उस सामाजिक ढाँचे का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ श्रम का शोषण तो होता है, किन्तु श्रमिक को सम्मान और अधिकार नहीं मिलते।
लेखक की भाषा अत्यन्त सरल, प्रवाहपूर्ण और व्यंजना-समृद्ध है। कहीं भी अनावश्यक अलंकरण नहीं है, फिर भी कथा अपनी प्रतीकात्मकता और व्यंग्य के कारण गहरी प्रभावशीलता अर्जित करती है। ‘भाँय-भाँय’, ‘भद्द-भद्द’ और ‘मधुर बोल’ जैसे ध्वन्यात्मक शब्द कहानी को जीवंत बना देते हैं। संवाद छोटे हैं, किन्तु अपने भीतर तीखा सामाजिक अर्थ रखते हैं।
कहानी का अन्त विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जो पखावज राजमहल में उपेक्षित होकर नाले में सड़ जाते हैं, वही मेहनतकशों के हाथों में जाकर ‘चिरंजीवी’ हो उठते हैं। यह अन्त केवल आशा का संकेत नहीं, बल्कि यह घोषणा भी है कि सृजन, संस्कृति और जीवन की वास्तविक शक्ति राजमहलों में नहीं, बल्कि श्रमशील जनता के हाथों में निहित है।
समग्रतः ‘पखावज वृत्तान्त’ एक अत्यन्त सारगर्भित, प्रतीकात्मक और वैचारिक कहानी है। यह कहानी जाति-व्यवस्था, छुआछूत और श्रम-विरोधी मानसिकता की आलोचना करते हुए श्रम और लोक-संस्कृति की गरिमा को स्थापित करती है। अपनी तीक्ष्ण सामाजिक दृष्टि, सशक्त प्रतीकों और प्रभावशाली व्यंग्य के कारण यह कहानी हिंदी साहित्य में विशेष महत्व रखती है।
दो दुनियाओं की कहानी
वीडियो का हर दृश्य और हर बात भीतर तक असर छोड़ती है। इस वीडियो को ज़रूर देखिए —
संभव है, अंत तक पहुँचते-पहुँचते आपकी सोच पहले जैसी न रहे।
यहाँ आपको संघर्ष भी मिलेगा, संवेदना भी, और वह कड़वा सच भी जो दो अलग-अलग दुनियाओं के बीच की दूरी को उजागर करता है।
जो लोग मेहनत करते हैं, वही सबसे अधिक उपेक्षित क्यों रहते हैं?
सम्मान का असली हकदार कौन है?
और आखिर क्यों समाज चमक-दमक के पीछे इंसानियत को भूल जाता है?
इन सभी सवालों को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
गुरुवार, 19 मार्च 2026
निराला और महादेवी
12 सितंबर 2024
मुंशी सतई सिंह
6 सितंबर 2024 ·
लेखपाल नुमा बुजुर्ग
·वह कौन सा वर्ष था, याद नहीं, जब देवेन्द्र जी एक लेखपाल नुमा बुजुर्ग के साथ बिरला छात्रावास (बी.एच.यू.) के मेरे कमरे में आये और बोले- 'ये त्रिलोचन जी हैं और आज ही इन्हें दिल्ली जाना है।' उस दिन शहर में कर्फ़्यू था। रिक्शे बंद थे। आखिरकार एक साइकिल का इंतजाम किया गया। त्रिलोचन जी ख़ुशी से आगे बैठ गये। मैं ने महसूस किया कि भारी वजन है इस ठोस काया का। देवेन्द्र जी तो मुक्त हो गये थे। अब मैं और त्रिलोचन और साइकिल। हाँ, शहर के बाहर का रास्ता मुझे मालूम नहीं था, मगर शहर से बाहर आकर त्रिलोचन जी मुखर हो गये- 'मुझे सब पता है। चलिए। हाँ आप को परेशानी हो रही हो, तो साइकिल मैं चलाऊँ।' मैं चौंक गया। यह उम्र और यह कद काठी, ये साइकिल चलायेंगे, वह भी मुझे बैठा कर?'
'नहीं नहीं। आप बैठे रहें। बस मुझे रास्ता बताते रहें।'
फिर तो वे रास्ता ही नहीं, रास्ते में मिलने वाली एक एक घास का सविस्तार परिचय देने लगे।कभी कभी तो साइकिल से उतर कर भी। जंक्शन से पहले तक वे चुप नहीं हुए। कैसे उन्होंने लाहौर में रिक्शा चलाया और और भी बहुत कुछ। अब मैं अभिभूत हो रहा था। संस्कृत की उनकी बहुज्ञता से लाहौर वाले प्रसंग में ही परिचित हुआ। बकौल त्रिलोचन, उनके रिक्शे पर संस्कृत के दो विद्वान बैठे थे और एक शब्द की व्युत्पत्ति पर जिरह कर रहे थे। जिरह खत्म नहीं हुई। मंजिल तक पहुँचाकर त्रिलोचन जी ने रिक्शा रोका और उनकी जिरह सही उत्तर देकर खत्म करवायी। ट्रेन आ गयी। त्रिलोचन चले गये और अपनी सहजता और सरलता के साथ मेरे भीतर उतर गये..!
कुछ महीनों पहले प्रोफ़ेसर राजेन्द्र कुमार
19 अगस्त 2024 ·
कुछ महीनों पहले Rajendra Kumar (प्रोफ़ेसर राजेन्द्र कुमार) से फोन पर बात हो रही थी। बीच में कुछ ऐसा हुआ कि बात अधूरी रही और फोन कट गया। मैं ने लिख भेजा कि तकनीक की समस्या से बात अधूरी रही। तत्त्काल प्रोफ़ेसर कुमार का आशुकवि रूप देखने को मिला -'तन नीक रहै,मन नीक रहै,तकनीक रहै कि रहै न रहै। यों यह वाग्विनोद ही था, मगर यह भी प्रमाणित हुआ कि मुक्त छन्द में लिखने वाले कवियों की सहज अभिव्यक्ति में भी छंद साधना निहित होती है। किसी मजबूरी में उन्हें छंद का अतिक्रमण करना पड़ता है, लेकिन आंतरिक लय का नहीं।

हम ऐसे युग में जीने को विवश हैं, जिस में चोर खुद को आसानी और बेहयाई से महान घोषित कर देते हैं...
SHIV SHANKAR MISHRA
साहित्य में चौर्य और प्रेरण-
·16 मार्च 2023 ·
