संदेश

कफ़न के पैसों की नई गाड़ी और विदेश यात्रा! सोचिए, आज के दृश्य-मंच के ज़माने में प्रेमचंद के 'घीसू-माधव' क्या गदर मचाते?

चित्र
मुंशी प्रेमचंद ने जब वर्ष 1936 में अपनी कालजयी कहानी 'कफ़न' लिखी थी, तब उन्होंने घीसू और माधव के रूप में संवेदनहीनता की उस इंतहा   को छुआ था, जो रूह कँपा देती है। वह एक ऐसा दौर था, जहाँ सामंती व्यवस्था के अंतहीन शोषण और पेट की भयानक भूख ने इंसान को भीतर से इस कदर खोखला कर दिया था कि एक पति अपनी पत्नी के कफ़न के पैसों से मदिरालय में बैठकर पूड़ियाँ, कलेजी और ताड़ी उड़ा लेता है। लेकिन आज का दौर तकनीक का है। देश पूरी तरह डिजिटल हो चुका है, हर हाथ में तीव्र इंटरनेट की ताकत है और संवेदनाएं अब दिल से फिसलकर स्मार्टफोन की स्क्रीन पर आ चुकी हैं। ऐसे में एक बड़ा, तीखा और बेहद दिलचस्प सवाल मन में कौंधता है— अगर प्रेमचंद के 'घीसू और माधव' आज के इस आभासी दुनिया और सामाजिक पटल के ज़माने में होते, तो क्या करते? यकीन मानिए, आज वे दोनों किसी के खेत में आलू चुराकर नहीं भून रहे होते, बल्कि वे इंटरनेट की दुनिया के "प्रमाणित जन-प्रभावक" (वेरिफाइड इन्फ्लुएंसर्स) होते। आइए देखते हैं उनकी इस अजीबो-गरीब और डरावनी यात्रा को : 1. 'ग्रामीण बालकों' का सामाजिक पटल पर भौकाल आज के ...

जहाँ सीसीटीवी हार गए और अंतःकरण जीत गया : ‘हराम की नहीं’

🎙️ जब विश्वविद्यालय की नैतिकता डगमगाने लगती है, तब एक साधारण रिक्शाचालक ईमानदारी का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाता है। शिवशंकर मिश्र की कहानी ‘हराम की नहीं’ का यह श्रव्य रूप कहानी के भावलोक में प्रवेश करने का एक सशक्त माध्यम है - समकालीन हिंदी कहानी का एक महत्त्वपूर्ण दायित्व अपने समय की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक जटिलताओं को इस प्रकार अभिव्यक्त करना है कि वे केवल घटनाओं का विवरण न रह जाएँ, बल्कि समाज और मनुष्य की गहरी परतों को उद्घाटित करने वाली रचनात्मक संरचनाओं में रूपांतरित हो सकें।   शिवशंकर मिश्र की कहानी ‘हराम की नहीं’ इसी अर्थ में एक उल्लेखनीय रचना है।  यह कहानी पहली दृष्टि में विश्वविद्यालय के एक मूल्यांकन केंद्र में घटित एक साधारण-सी घटना पर आधारित प्रतीत होती है, किंतु इसके भीतर प्रवेश करते ही स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल भ्रष्टाचार, रिश्वत या शिक्षा-व्यवस्था की कहानी नहीं है; यह उस नैतिक संकट की कथा है, जिसमें आधुनिक संस्थाएँ, शिक्षित मध्यवर्ग और सामाजिक प्रतिष्ठा के स्थापित मानदंड धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता खोते जाते हैं, जबकि जीवन के हाशिए पर खड़ा एक साधारण मनुष्य नैति...

अभाव की छाया में संवेदना का प्रकाश

प्रस्तावना मानव जीवन अनुभवों का विस्तृत संसार है। इन अनुभवों में सुख और दुःख, समृद्धि और अभाव, उपलब्धि और संघर्ष सभी सम्मिलित हैं। मनुष्य समृद्धि को जीवन का आदर्श मानता है और अभाव को एक ऐसी स्थिति के रूप में देखता है, जिससे यथासंभव बचा जाना चाहिए। किंतु यदि जीवन को गहराई से समझा जाए, तो ज्ञात होता है कि अभाव केवल कमी का नाम नहीं है। अनेक बार यही अभाव मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है और उसके भीतर संवेदना, करुणा तथा मानवता के श्रेष्ठ गुणों का विकास करता है। संवेदना मनुष्य को मनुष्य बनाती है। यह वह शक्ति है, जिसके कारण हम दूसरों के सुख-दुःख को समझ पाते हैं। प्रश्न यह है कि यह संवेदना जन्म कहाँ लेती है? क्या यह केवल शिक्षा से आती है, या फिर जीवन के संघर्ष और अभाव इसके निर्माण में अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं? इस प्रश्न का उत्तर हमें मानव इतिहास, साहित्य और समाज के अनुभवों में मिलता है। वास्तव में अभाव और संवेदना का संबंध अत्यंत गहरा और अविभाज्य है। अभाव का व्यापक अर्थ 'अभाव' शब्द सुनते ही प्रायः आर्थिक कठिनाइयों का विचार मन में आता है, किंतु अभाव का अर्थ केव...

जब उँगलियाँ स्क्रीन पर दौड़ने लगीं, तब किताबें पीछे क्यों छूट गईं

चित्र
“किताबें केवल ज्ञान नहीं देतीं, वे जीवन को सोचने, समझने और बेहतर बनाने की दिशा भी देती हैं।” प्रस्तावना किताबें मानव सभ्यता की सबसे मूल्यवान धरोहरों में से एक हैं। उन्होंने न केवल ज्ञान का प्रसार किया है, बल्कि मनुष्य के विचारों, भावनाओं और संस्कारों को भी समृद्ध बनाया है। एक समय था, जब पुस्तकें जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करती थीं। लोग अपने खाली समय में किताबें पढ़ते, पुस्तकालयों में जाते और साहित्य से अपने व्यक्तित्व को निखारते थे। लेकिन आज का समय पहले जैसा नहीं रहा। तकनीक के तेज़ विकास और डिजिटल माध्यमों के विस्तार ने लोगों की जीवनशैली को पूरी तरह बदल दिया है। आज की युवा पीढ़ी पहले की तुलना में पुस्तकों से दूर होती दिखाई देती है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, वीडियो प्लेटफॉर्म और त्वरित मनोरंजन के साधनों ने किताबों के लिए उपलब्ध समय को कम कर दिया है। यह केवल पढ़ने की आदत में बदलाव नहीं है, बल्कि हमारी बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवनशैली में आए बदलावों का संकेत भी है। प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और इस स्थिति को कैसे सुधारा जा सकता है? किताबों से दूरी के प्रमुख कारण 1. डिजिटल दुनिया ...

🚨 मोबाइल फोन हैक हो गया है? ये 7 संकेत और समाधान (2026 Guide)

चित्र
आज के डिजिटल समय में मोबाइल और इंटरनेट हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन जैसे-जैसे तकनीक बढ़ रही है, वैसे-वैसे साइबर फ्रॉड, हैकिंग और ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। थोड़ी सी लापरवाही आपके निजी डेटा, बैंक जानकारी और सोशल मीडिया अकाउंट को खतरे में डाल सकती है। इस लेख में हम जानेंगे कि साइबर खतरे क्या हैं और उनसे कैसे बचा जाए । ⚠️ साइबर फ्रॉड और हैकिंग क्या होती है? साइबर फ्रॉड का मतलब है इंटरनेट के जरिए किसी व्यक्ति की निजी जानकारी, पैसे या अकाउंट को धोखे से चुराना। हैकिंग में किसी के मोबाइल, ईमेल या सोशल मीडिया अकाउंट को बिना अनुमति के एक्सेस किया जाता है। 🚨 मोबाइल हैक होने के प्रमुख संकेत अगर आपका मोबाइल हैक हो रहा है, तो ये संकेत दिख सकते हैं: फोन अचानक स्लो हो जाना बैटरी जल्दी खत्म होना अनजान ऐप्स अपने आप इंस्टॉल होना डेटा का ज्यादा इस्तेमाल होना ओटीपी या मैसेज बिना आपकी जानकारी के आना सोशल मीडिया अकाउंट से खुद पोस्ट या लॉगिन होना 🛡️ मोबाइल और अकाउंट को सुरक्षित रखने के आसान तरीके 1. मजबूत पासवर्ड का उपयोग करें हमेशा ऐसा पासव...

सोशल मीडिया का युवाओं पर प्रभाव : अवसर, चुनौतियाँ और समाधान

चित्र
"जिस युग में संवाद अंगुलियों की गति से और विचार स्क्रीन की रोशनी में प्रवाहित होते हों, वहाँ सोशल मीडिया केवल एक माध्यम नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी के जीवन का नया परिवेश बन जाता है।" "ज्ञान और संवाद का माध्यम, लेकिन विवेकहीन उपयोग पर चुनौती भी —  यही है सोशल मीडिया की दोहरी तस्वीर।" प्रस्तावना वर्तमान समय में सोशल मीडिया युवाओं के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर), यूट्यूब और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म न केवल संवाद का माध्यम हैं, बल्कि जानकारी प्राप्त करने, विचार साझा करने और नई चीजें सीखने के भी साधन हैं। सोशल मीडिया ने युवाओं के सोचने, सीखने और समाज से जुड़ने के तरीके को काफी प्रभावित किया है। इसलिए इसके प्रभावों को समझना आवश्यक है। सोशल मीडिया का महत्व सोशल मीडिया ने संचार को सरल और तेज बना दिया है। इसके माध्यम से युवा देश-दुनिया की घटनाओं से तुरंत जुड़ सकते हैं और विभिन्न विषयों पर अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं। यह मंच उन्हें नए लोगों से जुड़ने, ज्ञान प्राप्त करने और अपने कौशल को प्रदर्शित करने का अवसर भी देता है। इसके अलावा, सो...

शिक्षा का उद्देश्य: नौकरी या व्यक्तित्व निर्माण?

चित्र
"शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि मनुष्य को सोचने,  समझने और बेहतर बनने की क्षमता प्रदान करना है।" शिक्षा का उद्देश्य नौकरी या व्यक्तित्व निर्माण पर आधारित चिंतनात्मक लेख प्रस्तावना मनुष्य अन्य प्राणियों की तुलना में सीखने और स्वयं को विकसित करने की क्षमता में अद्वितीय है। शिक्षा इसी क्षमता को उपयुक्त दिशा देने का माध्यम है। यह केवल अक्षरों का ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन को समझने और उसे सार्थक बनाने की प्रक्रिया है। किंतु आज के समय में शिक्षा को लेकर एक बड़ा प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना है या फिर एक बेहतर मनुष्य का निर्माण करना भी है? आज के समय में शिक्षा का मूल्य प्रायः इस आधार पर आँका जाता है कि वह कितनी जल्दी और कितनी अच्छी नौकरी दिला सकती है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की सफलता का मापदंड अक्सर उनके वेतन, पद और आर्थिक स्थिति से जोड़ा जाता है। दूसरी ओर, शिक्षा का एक व्यापक पक्ष यह भी है, जो व्यक्ति के चरित्र, संवेदनशीलता, नैतिकता और सामाजिक चेतना को विकसित करता है। यही द्वंद्व शिक्ष...