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  क्या यह आज़ादी की मौत नहीं? 15 अगस्त आते ही देशभक्ति के कपड़े अलमारी से निकल आते हैं। तिरंगा छत पर चढ़ जाता है, देशभक्ति मोबाइल की स्क्रीन पर उतर आती है, और आदमी— जो पूरे साल आदमी को आदमी नहीं समझता— एक दिन राष्ट्र को अपना परिवार घोषित कर देता है। अजीब तमाशा है। जिसके सामने निर्धन की आवाज़ सुनाई नहीं देती, वह राष्ट्रगान में राष्ट्र की आत्मा सुन लेता है। जिसे अपने सामने खड़े आदमी का दुख दिखाई नहीं देता, उसे सीमा पर खड़े सैनिक का बलिदान दिखाई देता है। जिसे अपने अधिकार के लिए चक्कर काटते आदमी से कोई सरोकार नहीं, वही स्वतंत्रता पर सबसे लंबा भाषण देता है। हमने अंग्रेज़ों को तो निकाल दिया। लेकिन शायद अंग्रेज़ियत नहीं निकली। सत्ता आज भी ऊपर बैठी है, आदमी आज भी नीचे खड़ा है। फर्क़ केवल इतना है कि पहले हुक्म देने वाले का चेहरा विदेशी था, अब अपना है। पहले सलाम मजबूरी था, अब आदत है। पहले डराया जाता था, अब आदमी स्वयं डरता है। पहले बेड़ियाँ दिखाई देती थीं, अब वे दिखाई नहीं देतीं। यही शायद अधिक ख़तरनाक है। एक आदमी भूखा है— हम कहते हैं, व्यवस्था की समस्या है। एक आदमी बेरोज़गार है— हम कहते हैं, ...

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