सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

प्रदर्शित

  अंगूठा उसका अंगूठा बचपन से ही उसकी पहचान था। अब वही अंगूठा उसे पहचानने से इनकार कर रहा था। सुबह का समय था। धूप अभी गाँव के ऊपर पूरी तरह नहीं उतरी थी। रात की ठंड मिट्टी में बची हुई थी और सरकारी राशन की दुकान के सामने लोग अपने-अपने कार्ड लिए खड़े थे। जगेसर सबसे पीछे था। उसके हाथ में राशन कार्ड था और दूसरी हथेली में पुरानी ऊनी टोपी। टोपी इतनी पुरानी थी कि उसकी ऊन जगह-जगह से खुल गई थी। वह उसे सिर पर कम, हाथ में ज्यादा रखता था। उसकी बारी आई तो उसने कार्ड आगे कर दिया। दुकानदार ने मशीन में कुछ दबाया। “अंगूठा लगाओ।” जगेसर ने दाहिना अंगूठा मशीन पर रखा। लाल बत्ती जली।   “प्रमाणीकरण असफल।”  दुकानदार ने उसकी ओर देखा। “फिर से।” जगेसर ने अंगूठा पोंछा। फिर रखा। वही लाल रोशनी। वही आवाज।  “प्रमाणीकरण असफल।”  पीछे खड़े लोगों में से किसी ने हँसकर कहा— “जगेसर, अब तो मशीन भी तुम्हें नहीं मानती।” जगेसर ने उसकी ओर देखा। कुछ कहा नहीं। तीसरी बार उसने अंगूठा रखा। मशीन ने फिर मना कर दिया।दुकानदार झुँझला गया। “बाबा, हाथ में तेल लगा है क्या?” “नहीं।” “तो फिर?” जगेसर ने अपनी हथेली देख...

हाल ही की पोस्ट

अन्तिम उच्चारण (कहानी-संग्रह) : डॉ. शिवशंकर मिश्र

संस्मरण के बदले कहानी

क्या यह आज़ादी की मौत नहीं?

ऑनलाइन दुनिया का ऑफलाइन आदमी

साहित्य का आदमी

काल के आईने में आदमी

सावन 2026