शनिवार, 23 मई 2026

अभाव का मौन

अभाव जब अस्तित्व की नसों में
धीरे-धीरे उतरता है,
तब मनुष्य केवल जीवित नहीं रहता—
वह संवेदनाओं का
एक मौन ग्रंथ बन जाता है।

रात्रि की निस्तब्ध देह पर
भूख जब शोक लिखती है,
तब किसी माँ की आँखों में
करुणा का शाश्वत व्याकरण जन्म लेता है।

वंचनाओं के धूसर प्रदेश में
मनुष्य का अंतर्मन
अपने ही टूटे हुए प्रतिबिंबों से
संवाद करता रहता है।
और उन्हीं संवादों की राख से
भावनाओं की दिव्य अग्नि प्रकट होती है।

जिस आत्मा ने
तिरस्कार की हिमशीत लहरों को सहा हो,
वही स्पर्श की ऊष्मा को
धर्म की तरह ग्रहण करती है।

अभाव केवल अनुपस्थिति नहीं—
वह चेतना की वह गहन दरार है
जहाँ से होकर
मानवता का प्रथम प्रकाश भीतर उतरता है।

पीड़ा जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचती है,
तब वह विलाप नहीं रहती;
वह करुणा की दार्शनिक चेतना बन जाती है।

और शायद इसी कारण
सभ्यता के सबसे कोमल श्लोक,
सबसे गहरे दर्शन,
और सबसे निर्मल प्रेम
उन्हीं हृदयों से जन्म लेते हैं
जिन्होंने जीवन को
पूर्णता में नहीं,
अभाव में जिया होता है।

@गौरव मिश्र 

बुधवार, 20 मई 2026

अपना–पराया

अपना कौन… पराया कौन…
ये वक्त बताता है,
जो दर्द में साथ निभाए,
वही अपना कहलाता है।

चेहरे तो सब हँसते मिलते,
दिल कौन पढ़ पाता है,
इस मतलब की दुनिया में
हर रिश्ता आज़माया जाता है।

कुछ लोग दुआओं जैसे थे,
फिर क्यों सपनों से बिछड़ गए,
जिन हाथों को थामा था हमने,
वो हाथ ही आखिर छोड़ गए।

दिल चुपके-चुपके रोता है,
आँखों से कुछ ना कहता है,
जो अपना लगता था कल तक,
आज वही बेगाना है।

अपना कौन… पराया कौन…
ये दिल समझ ना पाया है,
जिसे चाहा टूट के हमने,
उसी ने दिल दुखाया है।

माँ की ममता, पिता  का साया,
रब की सबसे बड़ी दुआ,
बाकी जग का सारा रिश्ता 
वक्त के संग में बदला  हुआ।

दौलत वाले यार बहुत थे,
ग़म में कोई आया ना,
तन्हा रातों ने ये सिखलाया,
अपना कोई साया ना।

फिर भी दिल उम्मीद लिए है,
कोई तो सच्चा होगा,
इस पत्थर जैसी दुनिया में
कोई दिल से अपना होगा।

@गौरव मिश्र 

भारतीय साहित्य में आज क्या चल रहा है?

भारतीय साहित्य आज एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। यह केवल किताबों, पुस्तकालयों और साहित्यिक गोष्ठियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, यूट्यूब, पॉडकास्ट, वेब सीरीज़ और बोलचाल की कविताओं तक फैल चुका है। आज का साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण, प्रतिरोध की आवाज़ और बदलते समय का दस्तावेज़ बन गया है।

एक समय था जब भारतीय साहित्य मुख्यतः पौराणिक कथाओं, आध्यात्मिकता, राष्ट्रवाद और सामाजिक आदर्शों के इर्द-गिर्द घूमता था। मुंशी प्रेमचंद, रवीन्द्रनाथ टैगोर और महादेवी वर्मा जैसे साहित्यकारों ने समाज की संवेदनाओं को शब्द दिए। लेकिन आज का साहित्य बदलते भारत की बेचैनी, संघर्ष और टूटन को नए ढंग से प्रस्तुत कर रहा है।

आज के भारतीय साहित्य में बेरोज़गारी, ऑनलाइन ठगी, मानसिक तनाव, जातिगत भेदभाव, स्त्री-असमानता, धार्मिक ध्रुवीकरण, अकेलापन और डिजिटल जीवन की कृत्रिमता जैसे विषय प्रमुख हो चुके हैं। अब साहित्य आदर्श नायकों की कहानियाँ नहीं, बल्कि आम इंसान के संघर्ष की सच्चाई लिख रहा है।

क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य भी तेजी से उभर रहा है। हिंदी, उर्दू, तमिल, बंगाली, मराठी, पंजाबी, भोजपुरी और मलयालम जैसी भाषाओं के लेखक नई पहचान बना रहे हैं। पहले अंग्रेज़ी साहित्य को अधिक महत्व मिलता था, लेकिन अब क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियाँ अनुवादों और इंटरनेट के माध्यम से दुनिया तक पहुँच रही हैं।

सोशल मीडिया ने साहित्य को पूरी तरह बदल दिया है। इंस्टाग्राम कविता, माइक्रो-फिक्शन, रील आधारित कहानी और स्पोकन वर्ड पोएट्री ने युवाओं को लेखन की ओर आकर्षित किया है। अब किसी लेखक को अपनी रचना प्रकाशित कराने के लिए बड़े प्रकाशकों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। मोबाइल फोन ही उसका मंच बन गया है।

महिला लेखिकाएँ और दलित साहित्यकार आज साहित्य की दिशा बदल रहे हैं। वे केवल कहानियाँ नहीं लिख रहे, बल्कि समाज की छिपी हुई सच्चाइयों को सामने ला रहे हैं। आत्मकथात्मक लेखन और प्रतिरोध साहित्य ने भारतीय साहित्य को अधिक साहसी और वास्तविक बनाया है।

इसके साथ-साथ साहित्य और सिनेमा का संबंध भी गहरा हो गया है। कई उपन्यास और कहानियाँ अब वेब सीरीज़ और फिल्मों के रूप में सामने आ रही हैं। लेखन में दृश्यात्मकता बढ़ी है और कहानी कहने का तरीका अधिक सिनेमाई होता जा रहा है।

हालाँकि साहित्य के सामने चुनौतियाँ भी हैं। लोगों की पढ़ने की आदत कम हो रही है। तेज़ रफ्तार डिजिटल दुनिया में गहरे साहित्य को समय देना कठिन होता जा रहा है। बाज़ारवाद भी साहित्य को प्रभावित कर रहा है, जहाँ कई बार गुणवत्ता से अधिक लोकप्रियता को महत्व मिलता है।

फिर भी भारतीय साहित्य समाप्त नहीं हो रहा, बल्कि एक नए रूप में जन्म ले रहा है। यह पहले से अधिक बहुभाषी, लोकतांत्रिक, विद्रोही और जीवंत हो चुका है। आज का भारतीय लेखक केवल कहानीकार नहीं, बल्कि बदलते समाज का साक्षी है।

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

'अंतिम उच्चारण' : संवेदना, प्रतीक और मनोवैज्ञानिक विस्थापन का आलोचनात्मक विश्लेषण -

कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें -
https://aakhyaan.blogspot.com/2010/05/blog-post_24.html

कथा का वैचारिक धरातल और सामरिक महत्व-
आदरणीय डॉ० शिवशंकर मिश्र की कहानी 'अंतिम उच्चारण' हिंदी कथा-साहित्य के यथार्थवादी परिप्रेक्ष्य में एक अत्यंत गंभीर और रणनीतिक हस्तक्षेप है। इसे केवल एक मूक बालक की त्रासदी नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना की उस सूक्ष्म क्रूरता का अनावरण है, जहाँ 'वाणी' पर वर्चस्व रखने वाला वर्ग मूक संवेदनाओं का व्यवस्थित विस्थापन करता है। कहानी का केंद्रबिंदु (बई) है, जिसके माध्यम से लेखक ने यह सिद्ध किया है कि कैसे एक व्यक्ति की विशिष्टता को सामाजिक साँचों में ढालने की प्रक्रिया वास्तव में उसकी 'मनोवैज्ञानिक हत्या' है।
कहानी के शीर्षक 'अंतिम उच्चारण' की सार्थकता इसके द्वंद्वात्मक विकास में निहित है। बालक द्वारा पहली बार 'बेर' कहने की विफल चेष्टा से उपजा शब्द 'बईऽऽ' उल्लास और सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक था, जिसने उसे एक नाम और पहचान दी। परंतु, कहानी के अंत में अपनी माँ के लिए निकला आर्त्तनाद 'बाँईऽऽ' उसकी स्वतंत्र चेतना का अंतिम संवेग सिद्ध होता है। उल्लास से करुणा तक की यह भाषाई यात्रा वास्तव में मानवीय संवेदनाओं के दमन का इतिहास है। यह कथा-तंतु हमें उस भाषाई अपवर्जन (Linguistic Exclusion) की ओर ले जाता है जहाँ मूक अभिव्यक्ति के अपने स्वर होते हैं।


कथा-शैली और शिल्प : मूक अभिव्यक्ति का स्वर-
लेखक की कथा-शैली शब्दों के अभाव को शारीरिक संवेदनाओं और ध्वन्यात्मक प्रतिस्थापनों से भरने की एक अनूठी कला है। यहाँ 'मौन' केवल संवाद की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि एक सघन उपस्थिति है। जब शब्द मर जाते हैं, तो 'सूंघने-चाटने', 'गुदगुदी' और 'स्पर्श' जैसी इंद्रियां संचार का प्राथमिक माध्यम बन जाती हैं। 'बाई' का मंदिर के पत्थरों को सूंघना या नए कुर्ते की चिकनाई से गुदगुदी महसूस करना उसके 'इंद्रियगत विमर्श' को पुख्ता करता है।
लेखक ने 'कुटम्मस' और 'भच्छाभच्छ' जैसे आंचलिक शब्दों का प्रयोग केवल वातावरण रचने के लिए नहीं, बल्कि सवर्ण दंभ और सामाजिक घृणा को चित्रित करने के लिए किया है। 'निर्मल हँसी' यहाँ एक शिल्पगत उपकरण है जो 'बई' के आंतरिक सौंदर्य और बाहरी समाज की वैचारिक कुरुपता के बीच के अंतराल को रेखांकित करती है।

भाषा-शैली के प्रमुख घटक-स्थानीय भाषाई पुट : 
ग्रामीण शब्दावली का प्रयोग सवर्ण सत्ता और हाशिए के समाज के बीच के शक्ति-संबंधों को विसंकेतित (Decode) करने के लिए किया गया है।

इंद्रियपरक मनोवैज्ञानिक गहराई : 
जब शब्द विफल होते हैं, तो लेखक पात्र के 'प्राथमिक संवेगों' (जैसे तेल पीना, मिट्टी सूंघना) के माध्यम से उसकी मानसिक अवस्था का विश्लेषण करता है।

दृश्य बिम्बों का सामरिक उपयोग :
'झरबेरी की पोटली' से लेकर 'खून के फौव्वारे' तक के दृश्य बिम्ब कहानी को एक ठोस भौतिक धरातल प्रदान करते हैं। यह कथा-शिल्प उन प्रतीकों की ओर ले जाता है, जो पात्र की आकांक्षाओं और सामाजिक विस्थापन के मूक गवाह हैं।

प्रतीकों का विश्लेषण : 'झरबेरी' से 'दर्पण' तक का सफर-
इस कहानी में वस्तुओं का चयन रणनीतिक है; वे पात्र की चेतना का विस्तार हैं।झरबेरी और ककड़ी (साझा करने का आदिम सुख): झरबेरी तोड़ना और उसे 'बईऽऽ' के घोष के साथ बांटना 'बई' के लिए सामाजिक स्वीकृति और आत्मीयता का आदिम संचार है। ककड़ी का प्रतीक इस साझापन को उसके चरमोत्कर्ष तक ले जाता है, जहाँ वह अपने 'परम स्वाद' को सार्वजनिक करने की आकांक्षा रखता है, जो अंततः एक वर्ग-संघर्ष का ट्रिगर बन जाता है।

दर्पण/ऐना (आत्म-बोध और सामाजिक हीनता) : 
चम्पा की टिप्पणी "ऐना में सूरत निहार ले" दर्पण को एक क्रूर उपकरण बना देती है। दर्पण यहाँ आत्म-पहचान की चाहत और सामाजिक अस्वीकृति का संधि-स्थल है। 'बई' के लिए दर्पण की तलाश वास्तव में खुद को समाज की 'सामान्य' परिभाषा में खोजने की एक विफल छटपटाहट है।

रेंड़ के पत्ते और पम्पिंग सेट (पशुकरण और यांत्रिक निर्वासन) : 
थाली के बजाय 'रेंड़ के पत्ते' पर खाना दिया जाना केवल सामाजिक बहिष्कार नहीं, बल्कि 'पात्र का पशुकरण' (Animalization) है। यह मानवीय गरिमा के लोप का 'अस्पृश्यतावादी व्याकरण' है। 'पम्पिंग सेट' खेत के किनारे एक निर्जन स्थान है, जो 'बई' के लिए 'यांत्रिक निर्वासन' (Mechanical Exile) का प्रतीक है, जहाँ उसे मुख्यधारा के समाज से दूर धकेल दिया गया है।

ये प्रतीक स्पष्ट करते हैं कि निर्जीव वस्तुएं भी मानवीय क्रूरता और सामाजिक बहिष्कार के औजार बन सकती हैं।

पात्रों का मनोवैज्ञानिक विकास और सामाजिक व्यवहार :
'बई' का मनोवैज्ञानिक विकास उल्लासपूर्ण अन्वेषण से 'मैसोचिस्टिक' (Masochistic) विस्थापन की ओर एक त्रासद यात्रा है। हरखू मिसिर की महत्वाकांक्षा कि उसका गूंगा बेटा 'गूंगा पहलवान' बनकर लठैत बने, पितृसत्तात्मक संरचना की उस क्रूरता को दर्शाता है, जो दिव्यांगता में भी उपयोगिता (Utility) खोजती है।

जब 'बई' अपनी माँ के घूंसों को 'ममता की गुदगुदी' समझने लगता है, तो यह उसके मनोवैज्ञानिक पतन का चरम है। अत्यधिक सामाजिक प्रताड़ना ने उसकी दर्द की संवेदना को विकृत कर दिया है। यह 'आघात का आंतरीकरण' (Internalization of Trauma) है, जहाँ उत्पीड़न ही उसे सुरक्षा का आभास देने लगता है।

तुलनात्मक अध्ययन : 'बाई' के जीवन के मनोवैज्ञानिक चरण-
आधार- 
चरण 1: उल्लास और अन्वेषण। 
चरण 2: प्रायश्चित और मनोवैज्ञानिक मृत्यु-

अभिव्यक्ति- 'निर्मल हँसी', 'बईऽऽ' और 'ककई' का उल्लासपूर्ण घोष। पूर्ण मौन, शब्दों का लोप, कोठरी में आत्म-गोपन।

संवेदना-   दूसरों को 'सुख' (झरबेरी) बांटने की तीव्र इच्छा। अपनी 'पीड़ा' को भी न पहचानना (मार को गुदगुदी समझना)।

सामाजिक स्थिति- बच्चों के बीच 'सखा' के रूप में एक अस्थायी स्वीकृति। 'कुजात' और 'कारनी' के रूप में पूर्ण बहिष्कृत।

मानसिक अवस्था- निर्भयता, जिज्ञासा और प्रकृति से जुड़ाव। आतंक, स्मृति-लोप और चेतना का विस्थापन। यह विस्थापन पिता की मृत्यु और उसके बाद थोपे गए 'प्रायश्चित' के माध्यम से पूर्णता को प्राप्त करता है।

वर्ग-भेद, जातिगत चेतना और विस्थापन की त्रासदी-
कहानी में व्याप्त सामाजिक स्तरीकरण 'बई' की नियति का मुख्य सूत्रधार है। सवर्ण टोले की 'शास्त्रीय क्रूरता' और हरिजन बस्ती की 'सहज आत्मीयता' के बीच का द्वंद्व जातिगत पाखंड को बेनकाब करता है।

      शास्त्री जी का पात्र धार्मिक पाखंड की अधिरचना (Superstructure) का प्रतिनिधित्व करता है। 'मनुस्मृति' का हवाला देना, उसे 'अशुभ' और 'पितरघाती' घोषित करना, और 'पंचगव्य' व 'शंखपुष्पी' के माध्यम से 'प्रायश्चित' का स्वांग रचना—यह सब उस 'शास्त्रीय हिंसा' का हिस्सा है, जो मनुष्य को सुधारने के नाम पर उसकी आत्मा को कुचल देती है। 'सुअर का मांस' खाने का आरोप वास्तव में उसे मानवीय श्रेणी से बाहर करने का एक बहाना मात्र है।

हरखू मिसिर की हत्या का विश्लेषण यह है कि यह केवल एक हिंसक घटना नहीं थी, बल्कि दो सवर्ण परिवारों (मिसिर और पांडे) के बीच का 'अहंकार युद्ध' था। 'ककड़ी' केवल एक ट्रिगर बनी। 'बई' इस सवर्ण वर्चस्व की लड़ाई में अनचाहे ही पिस गया। हाशिए का यह पात्र मुख्यधारा के संघर्षों में केवल एक साधन (Tool) बनकर रह गया, जिसका अंत उसके अस्तित्व के आधार के ढहने के रूप में हुआ।

निष्कर्ष: 'अंतिम उच्चारण' - एक शब्दहीन विदाई-
कहानी का समापन सामाजिक पाखंड पर एक घातक प्रहार है। अंतिम वाक्य—"अब वह सुधर गया है"—हिंदी साहित्य के सबसे क्रूर व्यंग्यों में से एक है। समाज जिसे 'सुधार' कह रहा है, वह वास्तव में एक मनुष्य की जीवंत संवेदना, उसकी मौलिकता और उसकी संवाद करने की विफल, किंतु पवित्र चेष्टा की व्यवस्थित हत्या है।

साहित्यिक शोधकर्ताओं के लिए मुख्य निष्कर्ष:-
भाषाई अपवर्जन और संरचनात्मक हिंसा: भाषा के अधिकार से वंचित करना समाज द्वारा की जाने वाली सबसे बड़ी हिंसा है, जो पात्र को आत्म-विस्मृति की ओर धकेलती है।

धार्मिक पाखंड और 'शुचिता' का विमर्श-
'प्रायश्चित' जैसे कर्मकांड मानवीय गरिमा को नष्ट करने और सामाजिक नियंत्रण बनाए रखने के उपकरण हैं।

मनोवैज्ञानिक विस्थापन-
सामाजिक बहिष्कार अंततः व्यक्ति को एक ऐसी अचेतन स्थिति में ले जाता है जहाँ शरीर जीवित रहता है, परंतु सामाजिक मनुष्य की मृत्यु हो जाती है।

अंतिम संदेश-
'अंतिम उच्चारण' केवल एक कहानी नहीं, बल्कि पाठक की अंतरात्मा का परीक्षण है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जिस समाज में 'मौन' और 'अदृश्यता' को 'सुधार' मान लिया जाए, क्या वहां हम सब उस मूक हत्या के साझीदार नहीं हैं? 'बई' की खामोशी उस सभ्य समाज के चेहरे पर एक रक्तरंजित तमाचा है, जो केवल अपनी सत्ता की भाषा सुनना चाहता है।


रविवार, 19 अप्रैल 2026

‘पखावज वृत्तान्त’ : श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान


कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें -
https://aakhyaan.blogspot.com/2019/10/blog-post.html


‘पखावज वृत्तान्त’ : श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान -

आदरणीय डॉ0 शिवशंकर मिश्र जी की कहानी ‘पखावज वृत्तान्त’ भारतीय समाज की जातिगत विडम्बनाओं, श्रम की उपेक्षा और सांस्कृतिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य करती है। आकार में छोटी होने के बावजूद यह कहानी अपने भीतर अत्यन्त व्यापक सामाजिक अर्थ समेटे हुए है। लेखक ने प्रतीकात्मक शैली के माध्यम से यह दिखाया है कि समाज जिन वस्तुओं, व्यक्तियों अथवा श्रम को ‘जूठा’ कहकर तिरस्कृत करता है, वही वास्तव में जीवन और सृजन के सबसे आवश्यक तत्व होते हैं।

कथ्य

कहानी का मूल कथ्य भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत ऊँच-नीच, श्रम की उपेक्षा और सामाजिक पाखंड को उजागर करना है। लेखक यह स्थापित करना चाहता है कि जिन श्रमिकों और निम्नवर्गीय लोगों के श्रम से समाज और संस्कृति जीवित रहती है, उसी समाज में उन्हें तिरस्कार और अपमान का सामना करना पड़ता है। ‘भात’ और ‘पखावज’ के माध्यम से कहानी यह बताती है कि जीवन, कला और सृजन का वास्तविक आधार श्रम है, किन्तु सामंती मानसिकता उसे स्वीकार करने के बावजूद सम्मान नहीं देती। अंततः कहानी श्रमशील जनता की जीवटता और लोक-संस्कृति की अमर शक्ति को रेखांकित करती है।

कथानक

कहानी का कथानक अत्यन्त सरल किन्तु अर्थगर्भित है। इन्द्र के दरबार में पखावज बजाने की तैयारी होती है, किन्तु बिना ‘भात’ लगाए उससे मधुर ध्वनि नहीं निकलती। जब भात लगाया जाता है, तब पखावज जीवंत हो उठता है, किन्तु उसी क्षण उसे ‘जूठा’ मानकर नाले में फेंक देने का आदेश दे दिया जाता है। आगे चलकर वही पखावज मेहनतकश शूद्रों के हाथों में जाकर पुनर्जीवित होता है। यह कथानक केवल एक वाद्ययंत्र की कथा नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक संरचना का रूपक है।

कहानी में ‘पखावज’ केवल वाद्य नहीं, बल्कि श्रमशील मनुष्य और लोक-संस्कृति का प्रतीक है। ‘भात’ यहाँ उस श्रम, स्पर्श और जीवन-रस का प्रतीक बन जाता है जिसके बिना कोई कला जीवित नहीं रह सकती। विडम्बना यह है कि जिस भात से पखावज में मधुरता आती है, उसी के कारण उसे अपवित्र घोषित कर दिया जाता है। लेखक ने इसी विरोधाभास के माध्यम से ऊँच-नीच की मानसिकता पर गहरी चोट की है।

कहानी का सबसे प्रभावशाली पक्ष उसका व्यंग्य है। महाराज और दरबारियों का व्यवहार उस सामंती मानसिकता को उजागर करता है, जो श्रम के उपयोग को तो स्वीकार करती है, किन्तु श्रमिक के सम्मान को नहीं। दरबार में बार-बार नए पखावज मिढ़वाए जाते हैं, परन्तु हर बार वे ‘जूठे’ घोषित कर दिए जाते हैं। यह स्थिति उस सामाजिक ढाँचे का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ श्रम का शोषण तो होता है, किन्तु श्रमिक को सम्मान और अधिकार नहीं मिलते।

लेखक की भाषा अत्यन्त सरल, प्रवाहपूर्ण और व्यंजना-समृद्ध है। कहीं भी अनावश्यक अलंकरण नहीं है, फिर भी कथा अपनी प्रतीकात्मकता और व्यंग्य के कारण गहरी प्रभावशीलता अर्जित करती है। ‘भाँय-भाँय’, ‘भद्द-भद्द’ और ‘मधुर बोल’ जैसे ध्वन्यात्मक शब्द कहानी को जीवंत बना देते हैं। संवाद छोटे हैं, किन्तु अपने भीतर तीखा सामाजिक अर्थ रखते हैं।

कहानी का अन्त विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जो पखावज राजमहल में उपेक्षित होकर नाले में सड़ जाते हैं, वही मेहनतकशों के हाथों में जाकर ‘चिरंजीवी’ हो उठते हैं। यह अन्त केवल आशा का संकेत नहीं, बल्कि यह घोषणा भी है कि सृजन, संस्कृति और जीवन की वास्तविक शक्ति राजमहलों में नहीं, बल्कि श्रमशील जनता के हाथों में निहित है।

समग्रतः ‘पखावज वृत्तान्त’ एक अत्यन्त सारगर्भित, प्रतीकात्मक और वैचारिक कहानी है। यह कहानी जाति-व्यवस्था, छुआछूत और श्रम-विरोधी मानसिकता की आलोचना करते हुए श्रम और लोक-संस्कृति की गरिमा को स्थापित करती है। अपनी तीक्ष्ण सामाजिक दृष्टि, सशक्त प्रतीकों और प्रभावशाली व्यंग्य के कारण यह कहानी हिंदी साहित्य में विशेष महत्व रखती है।       

दो दुनियाओं की कहानी



click the link for story 
https://aakhyaan.blogspot.com/

यह वीडियो केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की उन सच्चाइयों का आईना है, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।

वीडियो का हर दृश्य और हर बात भीतर तक असर छोड़ती है। इस वीडियो को ज़रूर देखिए —

संभव है, अंत तक पहुँचते-पहुँचते आपकी सोच पहले जैसी न रहे।

यहाँ आपको संघर्ष भी मिलेगा, संवेदना भी, और वह कड़वा सच भी जो दो अलग-अलग दुनियाओं के बीच की दूरी को उजागर करता है।

जो लोग मेहनत करते हैं, वही सबसे अधिक उपेक्षित क्यों रहते हैं?
सम्मान का असली हकदार कौन है?

और आखिर क्यों समाज चमक-दमक के पीछे इंसानियत को भूल जाता है?

इन सभी सवालों को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

गुरुवार, 19 मार्च 2026

निराला और महादेवी

12 सितंबर 2024   
हम लोग तब बी.ए.के छात्र थे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में, जब पता चला कि निराला पर बोलने महादेवी आयेंगी और मेरी पूरी मित्र मंडली ने नाक भौं सिकोड़ी। 'ये क्या बोलेंगी? समीक्षक हैं क्या?' आदि आदि। सीनेट हाल के एक हिस्से में कार्यक्रम शुरू होने से थोड़ा पहले ही हम लोग पहुँच गये इस लोभ के साथ कि कुछ न कुछ चाय बिस्किट तो मिलेगा ही। चाय तो नहीं मिली। काफी आयी। पहला घूँट लेते ही मुझे लगा कि चाय तो बहुत जल गयी, लेकिन दिमाग की तनी हुई नसों को अपूर्व आराम मिला। महादेवी जी ने बोलना शुरू किया। पहले ही उन्होंने निवेदन कर दिया कि वे न तो समीक्षक हैं और न ही समीक्षा करने आयी हैं। 'कुछ सुधियां हैं, जिन्हें मैं साझा करने आयी हूं।' फिर तो अपनी खरखराती आवाज में उन्होंने निराला से अपने संबंध के एक से एक दिलचस्प और विलक्षण प्रसंगों की विस्तार से चर्चा की। अब हम लोग मंत्रमुग्ध। 'ये क्या बोलेंगी निराला पर'? यह प्रश्न हम लोगों के मस्तिष्क में कहीं दफ्न हो गया। कैसे निराला उन्हें बहन मानते थे, कैसे राखी के दिन पंत जी निर्धारित समय पर और निराला किसी भी समय पहुँचते थे और दरवाजा खुलने से पहले ही आवाज लगाते थे, 'महादेवी, महादेवी दो रुपए भी लेती आना।'

'दो रूपये का क्या करेंगे?'
'एक रुपया रिक्शे वाले को देंगे और एक तुम्हे।'
महादेवी जी बोल रही थीं हम लोग उनकी सुधियों के सरित प्रवाह में ऊभ-चूभ हो रहे थे। काफी से मेरा दिमाग हल्का हुआ था, महादेवी जी के सुधियों के संचय की उस सहज सरल अभिव्यक्ति में निराला का महामानव रूप भास्वर हो रहा था। मेरे मन में एक महाप्राण का चिरस्थायी तैल चित्र बन रहा था। अब मेरा सिर जो हल्का हुआ था, वह उदात्त दशा को पहुँच रहा था।हाँ, उसी क्रम में उन्होंने पंत जी के बारे में बताया कि कैसे एक बार पंत जी बाल कटा कर पहुँचे राखी बँधवाने और महादेवी जी के पूछने पर बोले,'आज कल दास कैपिटल पढ़ रहा हूँ।' महीयसी को स्मृति नमन..!

 

मुंशी सतई सिंह

Shivshankar Mishra

6 सितंबर 2024 ·

अक्षर और अंक बोध तो माँ ने कराया और बड़े बाबा ने। कक्षा तीन से प्राथमिक विद्यालय में जाना हुआ। वहाँ मुंशी सतई सिंह थे, जिनका दृढ़ विश्वास था कि जो पहाड़ा नहीं याद कर सकता, वह पढ़ाई नहीं कर सकता। पहाड़ा कभी याद न हुआ, नतीजतन रोज़ दोनों हथेलियों के गुरु पर्वत मुंशी जी के डंडे की चोट से घायल रहते। जिस दिन मुंशी जी छुट्टी पर रहते हम लोग बेहद खुश होते। सहायक अध्यापक पिटाई नहीं करते थे।कभी कर भी देते,तो प्रतीकात्मक। विद्यालय पहुँच कर हम लोग दूर महुए के पेड़ों तले तक उनकी साइकिल की आतंक पैदा करने वाली चमक देखते।..आ तो नहीं रहे हैं मुंशी जी!
हाँ, एक बात और। जब वे पिटाई करते,तो एक गाली ज़रूर देते,'चमार'। चूँकि मुंशी जी खुद उसी जाति के थे, इस लिए इसे निरामिष ही समझा जाता। होता भी था। कक्षा पाँच की परीक्षा में 'सेंटर' शब्द से परिचय हुआ। मुंशी जी कभी कहते 'सेंटर अमुक जगह जायेगा', कभी कहते- 'नहीं दूसरी जगह जायेगा। हम लोगों में कौतूहल था और भय भी। ..कितना बड़ा होगा सेंटर! ..कहाँ से आयेगा !..पहिये तो बड़े बड़े होंगे! आदि आदि। सेंटर तो आया नहीं। हाँ, हम लोगों को जाना पड़ा। पूरे परीक्षा काल में भय। लिखित परीक्षा होने के बाद पहली बार मुंशी जी मुस्कराते हुए कहा, 'काहे रे चमार, तू ने नंबर तो अच्छे पाये हैं। चल, एक गाना सुना दे।' मुंशी जी की उपस्थिति में गाना? बमुश्किल एक पंक्ति सुनायी। आगे भूल गया। 'चल,चल! ठीक सुनाया।' यह उनके वत्सल रूप का पहला दीदार था। इस तरह मुंशी जी के दृढ़ विश्वास के विपरीत बिना पहाड़ा याद किये प्राथमिक कक्षाओं से निजात मिली।

लेखपाल नुमा बुजुर्ग

·
वह कौन सा वर्ष था, याद नहीं, जब देवेन्द्र जी एक लेखपाल नुमा बुजुर्ग के साथ बिरला छात्रावास (बी.एच.यू.) के मेरे कमरे में आये और बोले- 'ये त्रिलोचन जी हैं और आज ही इन्हें दिल्ली जाना है।' उस दिन शहर में कर्फ़्यू था। रिक्शे बंद थे। आखिरकार एक साइकिल का इंतजाम किया गया। त्रिलोचन जी ख़ुशी से आगे बैठ गये। मैं ने महसूस किया कि भारी वजन है इस ठोस काया का। देवेन्द्र जी तो मुक्त हो गये थे। अब मैं और त्रिलोचन और साइकिल। हाँ, शहर के बाहर का रास्ता मुझे मालूम नहीं था, मगर शहर से बाहर आकर त्रिलोचन जी मुखर हो गये- 'मुझे सब पता है। चलिए। हाँ आप को परेशानी हो रही हो, तो साइकिल मैं चलाऊँ।' मैं चौंक गया। यह उम्र और यह कद काठी, ये साइकिल चलायेंगे, वह भी मुझे बैठा कर?'
'नहीं नहीं। आप बैठे रहें। बस मुझे रास्ता बताते रहें।'

फिर तो वे रास्ता ही नहीं, रास्ते में मिलने वाली एक एक घास का सविस्तार परिचय देने लगे।कभी कभी तो साइकिल से उतर कर भी। जंक्शन से पहले तक वे चुप नहीं हुए। कैसे उन्होंने लाहौर में रिक्शा चलाया और और भी बहुत कुछ। अब मैं अभिभूत हो रहा था। संस्कृत की उनकी बहुज्ञता से लाहौर वाले प्रसंग में ही परिचित हुआ। बकौल त्रिलोचन, उनके रिक्शे पर संस्कृत के दो विद्वान बैठे थे और एक शब्द की व्युत्पत्ति पर जिरह कर रहे थे। जिरह खत्म नहीं हुई। मंजिल तक पहुँचाकर त्रिलोचन जी ने रिक्शा रोका और उनकी जिरह सही उत्तर देकर खत्म करवायी। ट्रेन आ गयी। त्रिलोचन चले गये और अपनी सहजता और सरलता के साथ मेरे भीतर उतर गये..!

कुछ महीनों पहले प्रोफ़ेसर राजेन्द्र कुमार

Shivshankar Mishra

19 अगस्त 2024 ·

कुछ महीनों पहले Rajendra Kumar (प्रोफ़ेसर राजेन्द्र कुमार) से फोन पर बात हो रही थी। बीच में कुछ ऐसा हुआ कि बात अधूरी रही और फोन कट गया। मैं ने लिख भेजा कि तकनीक की समस्या से बात अधूरी रही। तत्त्काल प्रोफ़ेसर कुमार का आशुकवि रूप देखने को मिला -'तन नीक रहै,मन नीक रहै,तकनीक रहै कि रहै न रहै। यों यह वाग्विनोद ही था, मगर यह भी प्रमाणित हुआ कि मुक्त छन्द में लिखने वाले कवियों की सहज अभिव्यक्ति में भी छंद साधना निहित होती है। किसी मजबूरी में उन्हें छंद का अतिक्रमण करना पड़ता है, लेकिन आंतरिक लय का नहीं।



हम ऐसे युग में जीने को विवश हैं, जिस में चोर खुद को आसानी और बेहयाई से महान घोषित कर देते हैं...

सुन रहा हूँ, कवि नरेश सक्सेना के साथ हुआ अपराध और यह भी कि वे व्यथित हो कर एकान्त वास में चले आते वे। सक्सेना जी,चोर अब 'महान' समझने लगे हैं खुद को। सन् 2014के 'आलोचना' के अंक में श्री राजेश जोशी की कविता 'पखावज वृत्तान्त' देख कर मैं ही नहीं, अनेक मित्र चौंक गये, क्यों कि यह 'अभिप्राय', अप्रैल 1983 में प्रकाशित मेरी लोक शैली में लिखी कहानी का अविकल रूप था। शीर्षक तक नहीं बदला गया। मेरा लीगल नोटिस मिलने पर फोन से उनकी क्षमा याचना आती, मगर अखबार में उनके वक्तव्य का शीर्षक था'एक रचना चुरा कर मैं महान न बन जाता। 'साहित्यिक थानेदारों को मेरे पंजीकृत और खुले पत्र भी नहीं मिले। क्या मतलब इस भाषा में कुछ लिखने का? कोई कभी चुरा लेगा और फिर खुद के महान होने की घोषणा कर देगा। सक्सेना जी का एकान्तवासी होना स्वाभाविक है। मैं तो हो गया। मैं मशहूर नहीं हूँ,पर नरेश जी आप न हों। 'महान' भले ही न हों, पर मशहूर तो हैं। हम ऐसे युग में जीने को विवश हैं, जिस में चोर खुद को आसानी और बेहयाई से महान घोषित कर देते हैं और भेड़ियाधसान जैकारे लगने लगते हैं।

SHIV SHANKAR MISHRA

साहित्य में चौर्य और प्रेरण-

Shivshankar Mishra
·16 मार्च 2023 ·

अभी कुछ घंटे पहले Shiv Murti जी का फोन आया। मुझे लगा कि मामला कुछ कुशल क्षेम जैसा होगा। हुआ भी; पर असल मामला कुछ यूँ था कि वे मेरी पत्नी से और मुझसे तकरीबन तीस साल पहले (या शायद उससे भी ज्यादा) सुने गये लोकगीतों में से एक 'डोरी डाल दे' का अपनी एक कथाकृति में उपयोग करने हेतु अनुमति माँग रहे थे। यह उनकी विनम्रता भी है और साहित्यिक तरीका भी। इससे पहले 'तर्पण' की रचना प्रक्रिया के दौरान उन्होंने बड़ी साफगोई से मुझसे सुने गये किसी कथा प्रसंग को कथा विषय बनाया था, ऐसी सूचना भी दी थी। पर मेरी किसी रचना का निषेध उनकी कोई भी रचना नहीं करती। एक ही घटना या परिवेश अलग अलग रचनात्मक मानस को अलग अलग प्रतीतियाँ देता है।इसी क्रम में राजेश जोशी याद आते हैं। फोन उन्होंने भी किया था, पर अनुमति के लिए नहीं, माफी माँगने के लिए। वह भी तब, जब उनकी तथाकथित कविता 'पखावज वृत्तांत' आलोचना में प्रकाशित करवा ली और मेरा लीगल नोटिस उन्हें प्राप्त हुआ। माफी का औचित्य आज तक मेरी समझ में नहीं आया। यदि उन्होंने मेरी रचना का अर्थोपकर्ष किया होता, तो मैं उनका अभिनंदन करता, पर उन्होंने तो अर्थापकर्ष किया है।

मैं तो चेतना का नैरन्तर्य हूं।


मेरे आत्मस्वरूपा हैं शिवशंकर मिश्र (Shivshankar Mishra)। कोई छल-छद्म नहीं, एकदम सच्चे, भोले शंकर, निष्कपट। कंठ में सरस्वती, कर में काम भर की लक्ष्मी। बुजुर्ग की परवाह, बच्चों की सरलता। हम सभी उनको अस्सी के दशक से ही पंडित कहते आए हैं। मेरी बीमारी की बात सुनी तो विह्वल हो गए। बेटे से फोन करवाया। हाल-चाल जाना। बोले – अनिल, हम लोग तो न जाने कब से भूत बन गए चुके हैं, बस शरीर यहां पड़ा है। फिर बातचीत के दौरान भावुक हो गए। बोले – हम न मरब, मरे संसारा।
यह विचार तभी से छज्जे पर बैठे पंछी के टूटे कोमल पंख की तरह मेरे मन में भटक रहा है। कबीर ने जब यह कहा होगा तो उनका मतलब क्या था? कबीर हमारे अपने जिस इलाके में जन्मे, पल-बढ़े, घूमे-फिरे और संतई की, वहां हम का सीधा मतलब ‘मैं’ होता है। उनका कहना था – मैं नहीं मरूंगा, मरेगा यह संसार। क्या कबीर का ‘मैं’ शंकराचार्य का ब्रह्म है या गीता की आत्मा? दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना, रामनाम का मरम है आना – कहनेवाले कबीर का ‘मैं’ ब्रह्म या आत्मा कतई नहीं हो सकता। फिर क्या है?
बुद्ध कहते हैं सब मर जाता है हमारे कर्म नहीं मरते। उनका नैरन्तर्य है। उन्होंने भव-संसार की कड़ी-दर-कड़ी निकाली थी। बुद्ध का कहना था: अनित्य को नित्य, अशुद्ध को शुद्ध, दुख को सुख और अनात्म को आत्म जानना ही अविद्या है और इस अविद्या से ही तमाम संस्कार या मनोगत धारणाएं पैदा होती हैं। मृत्यु के समय जो च्युति संस्कार या सबसे गहरी गांठ होती है, वह नए जन्म का सबब बन जाती है।
बुद्धवाणी में कहा गया है - अविज्जा पच्चया संखारा, संखारा पच्चया विञ्ञाणं, विञ्ञाण पच्चया नामरूपं, नामरूप पच्चया सलायतनं, सलायतन पच्चया फस्सो, फस्स पच्चया वेदना, वेदना पच्चया तण्हा, तण्हा पच्चया उपादानं, उपादान पच्चया भवो, भव पच्चया जाति। अविद्या से संस्कार, उनसे चेतना या प्रकृति के नियमों का बंधन, शरीर व चित्त, मन समेत छह इंद्रियां, स्पर्श, संवेदना, तृष्णा व आसक्ति। आसक्ति से भव-पुनर्भव, भव-संसार और फिर जन्म से मृत्यु तक का चक्र दोबारा चल निकलता है।
हमारे कर्मों से निकले संस्कार ही नए जन्म का आधार बनते हैं। लोक में तो यहां तक मान्यता है कि नया जन्म मनुष्य या किसी जीव के रूप में ही नहीं, पेड़-पौधों तक के रूप में हो सकता है। सीत-बसंत की कथा में दोनों भाइयों को उनकी सौतेली मां मरवा डालती है तो वे अपने घर के पीछे फूलों का पौधा बनकर जन्म लेते हैं।

बुद्ध की बात से लेकर लोक की मान्यता ही कबीर के इस कथन का सार है कि हम न मरब, मरे संसारा। भव की कड़ी टूट जाएगी तो यह भव-संसार मिट जाएगा। लेकिन मैं तो चेतना का नैरन्तर्य हूं। मैं कहां मरनेवाला। उस दिन पंडित ने भी कहा था – चेतना का नैरन्तर्य है। आखिर कौन-सी चेतना का नैरन्तर्य? वही चेतना जो कोई तरल या ठोस नहीं, जिसे हम अपने कर्मों से बराबर जन्म-दर-जन्म गढ़ते व बदलते रहते हैं, परिष्कृत करते रहते हैं, जिसने अरबों साल में मछली, सरीसृप व पक्षी से इंसान बनने तक सफर तय किया है।
शायद इंसान के दो स्वरूप साथ-साथ चलते रहते हैं। एक तो शरीर है जो लीवर से लेकर किडनी, फेफड़े, हृदय व तमाम अंगों-प्रत्यंगों का समन्वय है और दूसरा है उसका मनोमय रूप जो वह पिछले जन्म के च्युति संस्कार से लेकर रेशा-दर-रेशा हमारी क्रिया-प्रतिक्रिया व अनुभवों से बनता जाता है। मरने पर शरीर के रसायन रीसाइकल हो जाते हैं, जबकि मन का भी सब कुछ हवा हो जाता है केवल च्युति सस्कार को छोड़कर जो आगे की यात्रा का आधार बन जाता है। यही चेतना का नैरन्तर्य है। यही जीवन का सातत्य है।
अंत में पंडित की बात से ही अपनी बात समाप्त करता हूं, “यों भी कभी सिर्फ अपने लिए नहीं जिए, अब क्या! मौत की तलाश में इतने जीवन की कल्पना भी कभी नहीं थी!
जय जीवन! जय सातत्य की प्रतीति!