बाबा की उघन्नी': एक ढहते सामंती ढांचे का विश्लेषण
यह कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक का प्रयोग करें - https://aakhyaan.blogspot.com/2010/06/blog-post.html आदरणीय डॉ० शिवशंकर मिश्र की कहानी 'बाबा की उघन्नी' ग्रामीण भारत की ढहती हुई सामंती सत्ता और संयुक्त परिवार की आंतरिक संवेदनहीनता का एक बेबाक दस्तावेज़ है। हुकूमत का भ्रम : उघन्नी और लाठी कहानी के केंद्र में बाबा की 'उघन्नी' (चाबियों का गुच्छा) है, जो महज़ लोहे का टुकड़ा नहीं. बल्कि उनकी महारत और हुकूमत का एक मुगालता है। विडंबना यह है कि ये चाबियाँ अब 'बेकार' और 'नकली' हो चुकी हैं, फिर भी 110 साल के बाबा इन्हें अपनी मुट्ठी में भींचे हुए हैं, ताकि परिवार पर उनकी संप्रभुता क़ायम रहे। यह गुच्छा उस मरणासन्न सामंती व्यवस्था का प्रतीक है. जो वक़्त के साथ अपनी रूह खो चुकी है। आर्थिक खोखलापन : फ़र्ज़ी हिसाब-किताब कहानी में अतीत और वर्तमान का एक अजीबोग़रीब टकराव है। बाबा आज भी तीस साल पुरानी क़ीमतों की कल्पना में जी रहे हैं, जहाँ ट्रैक्टर तीन हज़ार का है। दूसरी तरफ़, हक़ीक़त यह है कि परिवार क़र्ज़ के दलदल और किसान क्रेडिट कार्ड के बोझ तले दबा है। संतोख द्वारा बाबा को...


