रविवार, 24 मई 2020

'कथादेश’ मासिक फरवरी 2020 अंक, में प्रकाशित शिवशंकर मिश्र की कहानी ‘जश्न’ की समीक्षा

कथादेशमासिक फरवरी 2020 अंक, में प्रकाशित शिवशंकर मिश्र की कहानी जश्नभारत की बहुसंख्य आबादी का प्रतिनिधित्व करती है। इसमें जहाँ एक ओर मानव में मानव सुलभ आनंद प्राप्ति की लालसा है, तो दूसरी ओर उचित शिक्षा/ज्ञान के अभाव में दिन-रात दुःखों को सहन करते हुए उसे सहज सहचर स्वीकार कर लेने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। इसमें एक ओर यदि ग्रामीण परिवेश में पलकर अनपढ़ होते हुए भी परिवार के सदस्यों का आपसी सद्भाव और प्रेम दिखाई देता है तो दूसरी ओर शहरी परिवेश के पढ़े लिखे लोगों की उस प्रवृत्ति को दिखाता है, जो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से हाथ मिलाने में अपनी ज्ञान-गरिमा की उच्चता प्रभावित होने का खतरा महसूस करता है। एक ओर अभाव ग्रस्त लोग उत्सव और आनंद हेतु अवसर निकालकर अपनी दबी इच्छापूर्ति का संतोष करते हैं और दूसरी तरफ साधन संपन्न तनाव में जीने के अभ्यासी हो रहे हैं। कहानी धर्म, जाति के आवरण में जीने वालों के दिखावे को भी सहज भाव से अनावृत करती है। प्रस्तुत कहानी गंदगी और अज्ञान के साहचर्य से उपजी ग्रामीण समस्याओं को उकेरती है, तो साथ ही शासन की सड़ांध से उपजी चिकित्सा क्षेत्र की समस्या से भी पर्दा उठाती है। कहानी यह भी उद्घाटित करती है कि देश की बहुसंख्य आबादी की समस्या का कारण केवल शिक्षा का अभाव, अज्ञान ही नहीं है, बल्कि तथाकथित ज्ञानसम्पन्न लोगों की तांत्रिक भ्रष्टाचार का साहचर्य भी है। इस कहानी के प्रमुख पात्र के सभी भाई विकलांग या अभाव ग्रस्त होकर भी आनंद और प्रेम से रहा जा सकता है, इस रहस्य को उद्घाटित करते दिखाई देते हैं। यह एक जीवन दर्शन है। यह मानव प्रवृत्ति है कि अत्यंत कष्टमय दशाओं में भी वह जीवन से उदासीन नहीं होती- अतिकष्टासु दशास्वपि जीवितनिरपेक्षा न भवन्ति खलु जगति प्राणिनां वृत्तयः’- बाणभट्ट। कहानी यह भी दिखाती है कि अज्ञान और जागरूकता के अभाव में जीवन संकट से कितना घिर सकता है, यहाँ तक कि मृत्यु का वरण भी कर लेता है और यह कहानी इस रूप में भारतीय ग्रामीण समाज के एक बहुत बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है। फिर भी, मनुष्य सहज भाव से जश्न मनाने का कोई न कोई कारण भी खोज लेता है। आज देश को जिस ज्ञान एवं जागरूकता की आवश्यकता है, उस कान्तासम्मित संदेश को समेटे प्रस्तुत कहानी समाज और तंत्र से अपेक्षा रखती हुई और अधिक प्रासंगिक एवं सफल हुई है। प्रकारांतर से यह कहानी कोरोनाका भविष्य वाचन है। 
  - डॉ. निशाकान्त द्विवेदी
        केन्द्रीय विद्यालय, मुजफ्फरपुर, बिहार

सोमवार, 14 अक्तूबर 2019

कथा-गाथा : शिवशंकर मिश्र

कथा- गाथा : शिवशंकर मिश्र Posted by अरुण देव on 4.4.11

समालोचन: कथा-गाथा : शिवशंकर मिश्र 

samalochan.blogspot.com..



Arun Dev says:--  शिवशंकर मिश्र पिछले कई दशकों से कहानियाँ लिख रहे हैं. जिस तरह कि वह कहानियाँ लिखते हैं उसके लिए उन्हें लम्बे अंतराल की दरकार होती है. 52 की उम्र में उनका पहला कहानी संग्रह प्रकाशित हो रहा है जिसमें कुल जमा 6 कहानियाँ हैं. इसके अलावा बमुश्किल उनके पास प्रकाशित –अप्रकाशित दो – चार और कहानियाँ होंगी. ज़ाहिर है शिवशंकर तात्कालिकता के मोह से बच कर सृजनात्मक विवशता से कहानियाँ लिख रहे हैं.                                                              
4/05/2011


 इस कहानी पर रिजवानुल हक की टिप्पणी ई -मेल से मिली:  "शिव शंकर मिश्र की कहानी अंतिम उच्चारण पढ़ी, बहुत दिलचस्प है, इसमें एक गूंगे बच्चे बई के ज़रिए गांव की जि़न्दगी के तमाम उतार चढ़ाव, तमाम मासूमियत और क्रूरता एक ही कहानी में सिमट आए हैं। ज...ाति व्यवस्था को तो इस कहानी में उघेड़ कर रख दिया गया है, ब्रहमनों के ज़रिए अपने ही वर्ग के एक व्यक्ति को कर्मकांडों के जंजाल में पीस देना कमाल की बात है। लेकिन इस कहानी का सबसे अच्छा हिस्सा मुझे बई का सपना वाला हिस्सा लगा कमाल है।"                                                         
 5/05/2011



Akhtar Khan Akela says:-
    jnaab hm to itne bhtrin lekhn se yun hi itne dinon se vnchit the ab roz laabh liya krenge . akhtar khan akela kota rajsthan                                                                                               5/05/2011 


अपर्णा मनोज Says:- निर्मल हँसी अब नहीं हँसता. उच्चारण की विफल चेष्टा और सफल संकेत नहीं करता. किसी आदमी को देख कर झट से भाग जाता है और कोठरी में छिप जाता है. ...शरीर में सूजन बढ़ गयी है. लोगों का विचार है कि अब वह सुधर गया है.और न जाने कितने बई.. सुधार है पर उद्धार नहीं.. marmik kahani post ki hai aapne ..Mishr ji aur aapko badhai! 
6/05/2011 


रिजवानुल हक Says:-  शिव शंकर मिश्र की कहानी अंतिम उच्चारण पढ़ी, बहुत दिलचस्प है, इसमें एक गूंगे बच्चे बई के ज़रिए गांव की जि़न्दगी के तमाम उतार चढ़ाव, तमाम मासूमियत और क्रूरता एक ही कहानी में सिमट आए हैं। जाति व्यवस्था को तो इस कहानी में उघेड़ कर रख दिया गया है, ब्रहमनों के ज़रिए अपने ही वर्ग के एक व्यक्ति को कर्मकांडों के जंजाल में पीस देना कमाल की बात है। लेकिन इस कहानी का सबसे अच्छा हिस्सा मुझे बई का सपना वाला हिस्सा लगा कमाल है। 

                   7/05/2011



Aparna Manoj Bhatnagar says:- अरुण, मिश्रा जी को कहानी के लिए ख़ास बधाई प्रेषित कीजियेगा. बई तो एकदम छा गया.. इस पात्र से गंगानगर की एक पगली याद आ गई. उम्र १६ से अधिक नहीं थी.. उसे देखकर ममता भी आती और दुःख भी होता. न जाने किसकी बच्ची थी.. अकेली छोड़ डी गई. वह .. यूँ ही मारी-मारी फिरती. लड़के उसे छेड़ जाते. बच्चे मुंह बनाते. बूढ़े गौरवर्णा को राह रुक तक लेते. औरतें जुगुप्सा से थूकतीं. हमारा युवा मन उसके दुःख से आहत रहता. फिर एक दिन हम उसे अपने घर ले आये. छोटी उम्र थी(शायद सोलह या सत्रह )तो मन भी वैसा ही था. माँ ने खासकर बहुत डांटा पर हमारे पापा .. बहुत प्यारे इंसान हैं.. उन्होंने हमें support किया. दो दिन बाद वह न जाने कहाँ चली गई चुपके से. फिर डी.ए.वी. स्कूल के पास जहां उसे पहली बार देखा देखा था.. वहाँ भी न मिली. करीब साल गुज़र गया.. एक दिन अचानक गुरूद्वारे के पास उसे देखा.. वही जीर्ण क्षीर्ण अवस्था और गोद में बच्चा..उस समय हमने कैसा महसूस किया नहीं बता सकते....पर वह गौरवर्णा अभी भी मन से गई नहीं... उसके साथ की और कई अनुभूतियाँ हैं.. बच्चे के साथ की.. उस पगली की ममता की, और लोगों की उपेक्षा की..लेकिन उसमें स्थिरता आने लगी थी. उतनी पागल वह नहीं रही थी... हम उसके पास बराबर जाते. गुरुद्वारा ही उसका ठिकाना हो गया था.
                                                                                             8/05/2011

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

गौरव मिश्र के हाइकू

सुमन पांखुरी

काँटे ही काँटे
उगे हैं जमी पर,
सम्हल कर ही चलना
चुभें ना कहीं पर।

अजब लीला तेरी
ऐ कुदरत है देखी
कि काँटे चुभे हैं
सुमन-पाँखुरी पर।

साँसों का कोई
ठिकाना नही है,
बातों के चर्चे
चले हैं सदी भर।

जिधर देखिये
बस तुमुल ही तुमुल है
कि बजती नहीं
रागिनी बाँसुरी पर।

काँटे ही काँटे
उगे हैं जमी पर,
सम्हल कर ही चलना
चुभें ना कहीं पर।





 दंड-ए-ठंड

भीगी छत पर ओस की 
जो नमी दिख रही थी,   
उन्हें अब कबूतर चुग रहे हैं। 
कुछ देर पहले 
जो धूप कोहरे ने ढकी थी,
अचानक वो  धीरे-धीरे 
 खिल उठी है
 फिर भी ओस कणों की
 सफेदी झर रही है।
आकाश की नीली दरी भी 
नहीं दिख रही है।
 वनस्पतियों पर चमकते 
ओसकण के मोती
बता रहे हैं कि 
हम रात में 
कितना बरसे हैं।
ठंड से हो रही हैं
जाने कितनी मौतें रोज          
खबर मिलती है तब 
जब मर जाते हैं ठंड से लोग...।

                               -गौरव मिश्र
जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित

त्रिपाठी भास्कराचार्य के संस्कृत गीत



सितवसन मितहसन मधुमितरसनवति
विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति
निगम -तिलकितवपुरुषशि तव दिवि लसति
यदुपनतदृशी विनतजगदधिचिति वसति
वटुवरटकुलमपि च वलदपचिति भवति
विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति ॥२॥

करकलित जपवलित मणिगुण उरु चलति
स हि सततमपि जगति शुभगतिमनुफलति
नवल मतिझरमिह तरलयति यतिमवति
विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति ॥३॥

तव ललितरव-तत कुकुभ परिमिलदुरसि
तरति सुतरतिनुलहरिरिव हिमसरसि
विबुधजनकृतसुकृतिरिहजनमभिभवति
विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति ॥४॥
त्रिपाठी भास्कराचार्य

कौशलेन्द्र के नवगीत

 माँ
चूल्हे की जलती रोटी सी
तेज आँच में जलती माँ।
भीतर-भीतर बलके फिर भी
बाहर नहीं उबलती माँ ,
रेशे-रेशे धागे बुनती,
नई रुई सी खुद को धुनती
नववीणा की तनी ताँत-सी
घर-आँगन में चलती माँ।


सावन के मेघ जल भरे
सावन के मेघ जल भरे
भीगी पलकों पर उतरे
धान पान तिथियाँ त्योहार की
बेटी ससुराल से पुकारती
फसलों पर ऋण की हरियाली
हँसी झरे होठों से उधार की
ऊपर से आँगन के नखरे
बिजुरी सी चमकें चिन्ताएँ
अँधियारे चलते दायें-बाँये
ऐसे में राह नहीं सूझे
बिजुरी की कौंध आजमायें
पाँवों के चिह्न कहाँ उभरे,
उफनाये ताल नदी नाले
आँगन में ओरी पर नाले
फुफकारें हर कोने से
विपदाओं के विषधर काले
मुरझाये जूड़े के मोंगरे
सावन के मेघ जल भरे।
जनसन्देश में प्रकाशित 
2012

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