भास्कराचार्य त्रिपाठी : सरस्वती-वंदना

आधुनिक संस्कृत साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित विद्वान भास्कराचार्य त्रिपाठी की यह रचना देवी सरस्वती को समर्पित है। इस गीत में ज्ञान, वाणी और विद्या की अधिष्ठात्री देवी के दिव्य स्वरूप का अत्यंत मधुर एवं काव्यमय चित्रण किया गया है। संस्कृत में रचित यह गीत भक्ति, सौंदर्य और साहित्यिक कौशल का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है-

सितवसन मितहसन मधुमितरसनवति-
विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति॥१॥
निगम -तिलकितवपुरुषशि तव दिवि लसति
यदुपनतदृशी विनतजगदधिचिति वसति
वटुवरटकुलमपि च वलदपचिति भवति
विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति ॥२॥

करकलित जपवलित मणिगुण उरु चलति
स हि सततमपि जगति शुभगतिमनुफलति
नवल मतिझरमिह तरलयति यतिमवति
विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति ॥३॥

तव ललितरव-तत कुकुभ परिमिलदुरसि
तरति सुतरतिनुलहरिरिव हिमसरसि
विबुधजनकृतसुकृतिरिहजनमभिभवति
विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति ॥४॥


गीत का भावार्थ

"विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति"
अर्थात् – हे ब्रह्मा की प्रिय देवी सरस्वती! इस संसार में कोई भी आपकी उपमा नहीं पा सकता। आपका सौंदर्य, ज्ञान और महिमा अनुपम है।

प्रथम श्लोक

देवी श्वेत वस्त्र धारण किए हुए हैं, मधुर मुस्कान से सुशोभित हैं। उनका रूप इतना अद्वितीय है कि स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भी उसकी तुलना किसी से नहीं कर सकते।

द्वितीय श्लोक

वेदों से विभूषित उनका दिव्य स्वरूप स्वर्ग में प्रकाशित होता है। जो भक्त विनम्रता से उनकी शरण में आते हैं, वे ज्ञान और सम्मान प्राप्त करते हैं। साधारण विद्यार्थी भी उनकी कृपा से महान विद्वान बन जाते हैं।

तृतीय श्लोक

देवी के हाथ में जपमाला और रत्नों की माला शोभायमान है। उनकी कृपा संसार को शुभ मार्ग प्रदान करती है। वे नई बुद्धि और ज्ञान की धारा प्रवाहित करती हैं तथा साधकों की रक्षा करती हैं।

चतुर्थ श्लोक

उनकी मधुर वाणी कोयल के स्वर जैसी मनोहर है। वह हृदय को वैसे ही शीतलता प्रदान करती है जैसे हिमाच्छादित सरोवर की लहरें। विद्वानों के सत्कर्म उनकी कृपा से और भी गौरव प्राप्त करते हैं।

भास्कराचार्य त्रिपाठी की यह सरस्वती-वंदना केवल देवी-स्तुति नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और साहित्य के प्रति भारतीय श्रद्धा की सुंदर अभिव्यक्ति है। संस्कृत की मधुर शैली में रचित यह गीत पाठक के मन में श्रद्धा, शांति और सौंदर्यबोध का संचार करता है। आज भी ऐसी रचनाएँ हमें भारतीय ज्ञान-परंपरा और संस्कृत साहित्य की समृद्ध विरासत से परिचित कराती हैं।

— मुक्ताभ

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