आख़िरी सौदा

वक़्त रात का था। लगातार बारिश जारी थी। शहर के सबसे बड़े अस्पताल के बाहर एक बूढ़ा आदमी भीगता हुआ किसी का नाम पुकार रहा था—

“सलीम… बस एक बार मिल ले बेटा… मेरी बच्ची मर जाएगी…”

लेकिन अस्पताल की पाँचवीं मंज़िल पर बैठे सलीम ने खिड़की का पर्दा खींच दिया। उसने बूढ़े आदमी को देखा… और नज़र फेर ली। उसके चेहरे पर ज़रा भी अफ़सोस नहीं था। क्योंकि सलीम उन लोगों में से था, जो हर रिश्ते, हर दर्द और हर इंसान को सिर्फ़ अपने फ़ायदे से तौलते हैं।

कुछ साल पहले तक वह बहुत ग़रीब था। फटे कपड़े, टूटा घर और जेब में हमेशा खालीपन। मगर उसके पास एक चीज़ थी—चालाक दिमाग़। उसने जल्दी समझ लिया था कि इस दुनिया में मेहनत से ज़्यादा फायदा “अच्छा इंसान दिखने” में है। बस फिर क्या था— वह लोगों के दुखों में शामिल होने लगा। किसी के घर मौत हो जाए, तो सबसे पहले पहुँचता। किसी की बेटी की शादी हो, तो मदद का दिखावा करता। मस्जिद में नमाज़, मंदिर में सम्मान, गरीबों के बीच हमदर्दी…हर जगह उसका एक नया चेहरा होता। और लोग? लोग उसे फ़रिश्ता समझने लगे।

धीरे-धीरे उसने लोगों का भरोसा बेचकर पैसा कमाना शुरू कर दिया। किसी से कारोबार के नाम पर पैसे लिए। किसी को नौकरी दिलाने का सपना दिखाया। किसी गरीब की ज़मीन सस्ते में खरीद ली। हर बार उसका एक ही उसूल था—“काम निकल जाए… फिर इंसान जाए भाड़ में।”

फिर एक दिन शहर में आग लग गई। पुरानी बस्ती जल रही थी। लोग अपनी जान बचाने में लगे थे।
बच्चे चीख रहे थे। औरतें रो रही थीं। लेकिन सलीम की आँखों में डर नहीं, लालच चमक रहा था। वह अपने आदमियों से बोला— “अभी खरीद लो इनकी ज़मीन… कल ये लोग भूखे होंगे, खुद बेच देंगे।”

उस रात उसने कई मजबूर लोगों से औने-पौने दाम में उनके घर लिखवा लिए। कुछ महीनों में वह शहर का बड़ा आदमी बन गया। महँगी गाड़ियाँ… बड़ा बंगला… ऊँची पहचान…लेकिन कहते हैं ना—
हर चीख कहीं न कहीं जमा होती रहती है। एक रात सलीम की इकलौती बेटी आयत अचानक बीमार पड़ गई। उसे तुरंत खून की ज़रूरत थी। सलीम पागलों की तरह लोगों के दरवाज़े खटखटाने लगा।

“मेरी बच्ची को बचा लो… जो चाहो ले लो…”

लेकिन शहर ख़ामोश था। किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला। क्योंकि जिन लोगों के घर उसने जलते वक़्त खरीदे थे…आज उनके दिल उसके लिए जल चुके थे। भागते-भागते वह उसी बूढ़े आदमी के घर पहुँचा, जिसकी ज़मीन उसने धोखे से छीनी थी। बूढ़े ने दरवाज़ा खोला। सलीम उसके पैरों में गिर पड़ा— “ख़ुदा के लिए… मेरी बेटी मर जाएगी…!”

बूढ़े की आँखें भर आईं। उसने धीमे से कहा—“जब मेरी बेटी दवा के बिना मर रही थी… तब मैंने भी तुमसे यही कहा था।”

सलीम का शरीर काँप उठा। उसे पहली बार अपने सारे गुनाह एक साथ याद आने लगे। हर धोखा… हर झूठ… हर मजबूर चेहरा…अस्पताल पहुँचते-पहुँचते बहुत देर हो चुकी थी। सफेद चादर के नीचे उसकी बेटी ख़ामोश पड़ी थी।

सलीम वहीं फर्श पर बैठ गया। उसकी चीख पूरे अस्पताल में गूँज रही थी…मगर अब कोई उसे दिलासा देने वाला नहीं था। उस रात पहली बार उसे समझ आया—इंसान जब दूसरों के आँसूओं पर अपनी खुशी बनाता है, तो ज़िंदगी एक दिन उससे उसकी सबसे प्यारी चीज़ छीन लेती है और उस सज़ा से बड़ी कोई सज़ा नहीं होती। 

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