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परजीवी पुत्र

कुछ पुत्र जन्म नहीं लेते, धीरे-धीरे माता-पिता के त्याग पर उग आते हैं। वे घर में रहते हैं, पर घर का भार नहीं उठाते। उनकी पत्नियाँ सुविधाओं को जीवन समझती रहती हैं, और बूढ़े माँ-बाप धीरे-धीरे घर की वस्तु बनते जाते हैं। पिता की देह एक पुराने वृक्ष की तरह हर मौसम सहती रहती है। उसकी थकी हुई नसों में अब भी घर की रोटियाँ चलती रहती हैं। माँ अपनी भूख, अपनी दवाइयाँ, अपनी इच्छाएँ धीरे-धीरे छोड़ती रहती है। और उसी त्याग के बीच बेटों के घर बसते रहते हैं। बहुएँ अपनी दुनिया में व्यस्त, बेटे अपनी असफलताओं में डूबे, और दो बूढ़े लोग अपने ही घर में धीरे-धीरे अनावश्यक होते हुए। यह केवल आर्थिक निर्भरता नहीं होती, यह आत्मा की परजीविता होती है। जहाँ मनुष्य दूसरों के श्रम पर जीते-जीते अपना आत्मबल खो देता है। पिता अब कम बोलता है। उसे पता चल जाता है कि उसके जीवित रहने से अधिक उसकी पेंशन जरूरी हो चुकी है। माँ रात में खाँसते हुए भी दरवाज़े की आहट सुनती रहती है, मानो कोई बेटा फिर से छोटा होकर लौट आएगा। लेकिन समय एक बार बड़ा हो जाने के बाद वापस बच्चा नहीं बनता। फिर एक दिन पिता चला जाता है। घर में कुछ देर शोक ठहरता है...

आख़िरी सौदा

वक़्त रात का था। लगातार बारिश जारी थी। शहर के सबसे बड़े अस्पताल के बाहर एक बूढ़ा आदमी भीगता हुआ किसी का नाम पुकार रहा था— “सलीम… बस एक बार मिल ले बेटा… मेरी बच्ची मर जाएगी…” लेकिन अस्पताल की पाँचवीं मंज़िल पर बैठे सलीम ने खिड़की का पर्दा खींच दिया। उसने बूढ़े आदमी को देखा… और नज़र फेर ली। उसके चेहरे पर ज़रा भी अफ़सोस नहीं था। क्योंकि सलीम उन लोगों में से था, जो हर रिश्ते, हर दर्द और हर इंसान को सिर्फ़ अपने फ़ायदे से तौलते हैं। कुछ साल पहले तक वह बहुत ग़रीब था। फटे कपड़े, टूटा घर और जेब में हमेशा खालीपन। मगर उसके पास एक चीज़ थी—चालाक दिमाग़। उसने जल्दी समझ लिया था कि इस दुनिया में मेहनत से ज़्यादा फायदा “अच्छा इंसान दिखने” में है। बस फिर क्या था— वह लोगों के दुखों में शामिल होने लगा। किसी के घर मौत हो जाए, तो सबसे पहले पहुँचता। किसी की बेटी की शादी हो, तो मदद का दिखावा करता। मस्जिद में नमाज़, मंदिर में सम्मान, गरीबों के बीच हमदर्दी…हर जगह उसका एक नया चेहरा होता। और लोग? लोग उसे फ़रिश्ता समझने लगे। धीरे-धीरे उसने लोगों का भरोसा बेचकर पैसा कमाना शुरू कर दिया। किसी से कारोबार के नाम पर पैस...

बाबा की उघन्नी': एक ढहते सामंती ढांचे का विश्लेषण

यह कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक का प्रयोग करें - https://aakhyaan.blogspot.com/2010/06/blog-post.html आदरणीय डॉ० शिवशंकर मिश्र की कहानी 'बाबा की उघन्नी' ग्रामीण भारत की ढहती हुई सामंती सत्ता और संयुक्त परिवार की आंतरिक संवेदनहीनता का एक बेबाक दस्तावेज़ है। हुकूमत का भ्रम : उघन्नी और लाठी कहानी के केंद्र में बाबा की 'उघन्नी' (चाबियों का गुच्छा) है, जो महज़ लोहे का टुकड़ा नहीं. बल्कि उनकी महारत और हुकूमत का एक मुगालता है। विडंबना यह है कि ये चाबियाँ अब 'बेकार' और 'नकली' हो चुकी हैं, फिर भी 110 साल के बाबा इन्हें अपनी मुट्ठी में भींचे हुए हैं, ताकि परिवार पर उनकी संप्रभुता क़ायम रहे। यह गुच्छा उस मरणासन्न सामंती व्यवस्था का प्रतीक है. जो वक़्त के साथ अपनी रूह खो चुकी है। आर्थिक खोखलापन : फ़र्ज़ी हिसाब-किताब कहानी में अतीत और वर्तमान का एक अजीबोग़रीब टकराव है। बाबा आज भी तीस साल पुरानी क़ीमतों की कल्पना में जी रहे हैं, जहाँ ट्रैक्टर तीन हज़ार का है। दूसरी तरफ़, हक़ीक़त यह है कि परिवार क़र्ज़ के दलदल और किसान क्रेडिट कार्ड के बोझ तले दबा है। संतोख द्वारा बाबा को...