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मनुष्य सदा अपने भाव-संवेगों की अभिव्यक्ति के लिए बेचैन रहा है, ऐसा इतिहास से विदित होता है। इसी अभिव्यक्ति की बेचैनी के क्रम में कभी ध्वनियाँ सार्थक हो गयी होंगी। कभी हर्ष के अतिरेक ने, तो कभी शोक के अतिरेक ने ध्वनियों को सार्थक बना दिया होगा। इस तरह भाषा बनी होगी और संगीत भी। मनुष्य की भाव-संकुलता की अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य को एक मनुष्य की जरूरत है और यह जरूरत कभी समाप्त नहीं होगी। यदि यहाँ लिखे शब्द आपके मन में किसी विचार, संवेदना या प्रश्न को जन्म दें, तो यही इस ब्लॉग की सार्थकता होगी।
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अप्रैल 19, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
‘पखावज वृत्तान्त’ : श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान
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