परजीवी पुत्र

कुछ पुत्र
जन्म नहीं लेते,
धीरे-धीरे
माता-पिता के त्याग पर उग आते हैं।

वे घर में रहते हैं,
पर घर का भार नहीं उठाते।

उनकी पत्नियाँ
सुविधाओं को जीवन समझती रहती हैं,
और बूढ़े माँ-बाप
धीरे-धीरे
घर की वस्तु बनते जाते हैं।

पिता की देह
एक पुराने वृक्ष की तरह
हर मौसम सहती रहती है।

उसकी थकी हुई नसों में
अब भी
घर की रोटियाँ चलती रहती हैं।

माँ
अपनी भूख,
अपनी दवाइयाँ,
अपनी इच्छाएँ
धीरे-धीरे छोड़ती रहती है।

और उसी त्याग के बीच
बेटों के घर बसते रहते हैं।

बहुएँ
अपनी दुनिया में व्यस्त,
बेटे
अपनी असफलताओं में डूबे,

और दो बूढ़े लोग
अपने ही घर में
धीरे-धीरे
अनावश्यक होते हुए।

यह केवल आर्थिक निर्भरता नहीं होती,
यह आत्मा की परजीविता होती है।

जहाँ मनुष्य
दूसरों के श्रम पर जीते-जीते
अपना आत्मबल खो देता है।

पिता
अब कम बोलता है।

उसे पता चल जाता है
कि उसके जीवित रहने से अधिक
उसकी पेंशन जरूरी हो चुकी है।

माँ
रात में खाँसते हुए भी
दरवाज़े की आहट सुनती रहती है,
मानो कोई बेटा
फिर से छोटा होकर लौट आएगा।

लेकिन समय
एक बार बड़ा हो जाने के बाद
वापस बच्चा नहीं बनता।

फिर एक दिन
पिता चला जाता है।

घर में कुछ देर शोक ठहरता है,
फिर
जीवन अपनी स्वार्थी चाल में लौट आता है।

मगर माँ
पति के साथ
अपने भीतर का आधा संसार भी खो चुकी होती है।

अब उसकी उपस्थिति
घर में बोझ की तरह महसूस की जाती है।

उसकी धीमी चाल,
उसकी खाँसी,
उसकी पुरानी बातें—
सब लोगों को असुविधा देने लगती हैं।

एक रात
वह चुपचाप
पति की तस्वीर सीने से लगाकर लेटती है।

उसकी आँखों में
नींद नहीं,
जीवन से थक जाने की नमी होती है।

सुबह
वह नहीं उठती।

और उसी क्षण
घर की दीवारों से
एक अदृश्य छाया हट जाती है।

अब घर में
सब कुछ बचा रहता है—

कमरे,
फर्नीचर,
बँटी हुई अलमारियाँ,
बैंक के काग़ज़,
जायदाद के हिस्से।

बस
वे दो लोग नहीं बचते
जिनकी चुप यातनाओं पर
पूरा घर टिका हुआ था।

फिर धीरे-धीरे
बेटों के बीच
विवाद शुरू होते हैं।

बहुएँ
अपनी-अपनी सीमाएँ खींचने लगती हैं।

और उसी घर में
जहाँ कभी माँ की दुआएँ गूँजती थीं,
अब केवल
स्वार्थ की आवाज़ें बचती हैं।

तब बहुत देर बाद
किसी बेटे को एहसास होता है—

कि मनुष्य
जब अपने ही माता-पिता के त्याग पर
परजीवी बनकर जीता है,

तब वह केवल उनका जीवन नहीं खाता,
धीरे-धीरे
अपनी आत्मा की गरिमा भी खो देता है।

और कुछ घर
माता-पिता की मृत्यु के बाद नहीं उजड़ते,
वे तो बहुत पहले उजड़ चुके होते हैं—
जब बेटों ने
उनके जीवित रहते हुए ही
उन्हें अकेला छोड़ दिया था।

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