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अभाव का मौन

अभाव मनुष्य के जीवन का केवल एक सामाजिक या आर्थिक अनुभव नहीं है, बल्कि वह उसकी चेतना, संवेदना और आत्मबोध को भी गहराई से प्रभावित करता है। अनेक बार जीवन की सबसे बड़ी सीखें, सबसे कोमल भावनाएँ और सबसे गहन मानवीय अनुभव अभाव की भूमि पर ही अंकुरित होते हैं। प्रस्तुत कविता अभाव को केवल कमी के रूप में नहीं, बल्कि मानवता की अंतर्धारा के रूप में देखने का प्रयास है। अभाव जब अस्तित्व की नसों में धीरे-धीरे उतरता है, तब मनुष्य केवल जीवित नहीं रहता— वह संवेदनाओं का एक मौन ग्रंथ बन जाता है। रात्रि की निस्तब्ध देह पर भूख जब शोक लिखती है, तब किसी माँ की आँखों में करुणा का शाश्वत व्याकरण जन्म लेता है। वंचनाओं के धूसर प्रदेश में मनुष्य का अंतर्मन अपने ही टूटे हुए प्रतिबिंबों से संवाद करता रहता है। और उन्हीं संवादों की राख से भावनाओं की दिव्य अग्नि प्रकट होती है। जिस आत्मा ने तिरस्कार की हिमशीत लहरों को सहा हो, वही स्पर्श की ऊष्मा को धर्म की तरह ग्रहण करती है। अभाव केवल अनुपस्थिति नहीं— वह चेतना की वह गहन दरार है जहाँ से होकर मानवता का प्रथम प्रकाश भीतर उतरता है। पीड़ा जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचती है, तब वह...

अपना–पराया

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रिश्ते कभी-कभी बिना किसी वजह के ही टूट जाते हैं। जो लोग कभी दिल के सबसे करीब लगते थे, वही धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं। उनकी आवाज़ें, उनकी बातें और उनका साथ सब बस यादों में रह जाता है। दिल चुपचाप सब सहता रहता है, लेकिन अंदर कहीं न कहीं एक खालीपन रह जाता है, जिसे कोई भर नहीं पाता। और फिर जिंदगी का सबसे अजीब सच सामने आता है—कुछ अनजान लोग बिना कुछ कहे इतने अपने लगने लगते हैं कि हम खुद हैरान रह जाते हैं। तब बस एक ही एहसास रह जाता है—  सच में अपना कौन है… अपना कौन… पराया कौन… ये वक्त बताता है, जो दर्द में साथ निभाए, वही अपना कहलाता है। चेहरे तो सब हँसते मिलते, दिल कौन पढ़ पाता है, इस मतलब की दुनिया में हर रिश्ता आज़माया जाता है। कुछ लोग दुआओं जैसे थे, फिर क्यों सपनों से बिछड़ गए, जिन हाथों को थामा था हमने, वो हाथ ही आखिर छोड़ गए। दिल चुपके-चुपके रोता है, आँखों से कुछ ना कहता है, जो अपना लगता था कल तक, आज वही बेगाना है। अपना कौन… पराया कौन… ये दिल समझ ना पाया है, जिसे चाहा टूट के हमने, उसी ने दिल दुखाया है। माँ की ममता, पिता  का साया, रब की सबसे बड़ी दुआ, बाकी जग का सारा रिश्ता  व...

हाइकू

सुमन पांखुरी काँटे ही काँटे उगे हैं जमी पर सम्हल कर ही चलना चुभें ना कहीं पर। अजब लीला तेरी ऐ दुनिया के मालिक  कि काँटे चुभे हैं सुमन-पाँखुरी पर। साँसों का कोई ठिकाना नही है, बातों के चर्चे चले हैं सदी भर। जिधर देखिये बस तुमुल ही तुमुल है कि बजती नहीं रागिनी बाँसुरी पर। काँटे ही काँटे उगे हैं जमी पर, सम्हल कर ही चलना चुभें ना कहीं पर। दंड-ए-ठंड भीगी छत पर ओस नहीं, रात का टूटा हुआ स्वप्न बिखरा है। कबूतर नहीं कुछ भूखी परछाइयाँ हैं, जो नमी को जीवन समझकर चुग रही हैं। थोड़ी देर पहले जो धूप कोहरे में धीरे-धीरे घुल रही थी, अब भी मौन में है। ओसकण नहीं गिरते, वे समय की टूटी हुई साँसें हैं। नीला आकाश भी धुंध के कंधों पर ढहता जा रहा है। वनस्पतियाँ नहीं, ये धरती की ठंडी उँगलियाँ हैं। और खबरें… वे तभी जन्म लेती हैं, जब कोई शरीर ठंड की चुप्पी में खो जाता है। — मुक्ताभ 

भास्कराचार्य त्रिपाठी : सरस्वती-वंदना

आधुनिक संस्कृत साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित विद्वान भास्कराचार्य त्रिपाठी की यह रचना देवी सरस्वती को समर्पित है। इस गीत में ज्ञान, वाणी और विद्या की अधिष्ठात्री देवी के दिव्य स्वरूप का अत्यंत मधुर एवं काव्यमय चित्रण किया गया है। संस्कृत में रचित यह गीत भक्ति, सौंदर्य और साहित्यिक कौशल का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है- सितवसन मितहसन मधुमितरसनवति- विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति॥१॥ निगम -तिलकितवपुरुषशि तव दिवि लसति यदुपनतदृशी विनतजगदधिचिति वसति वटुवरटकुलमपि च वलदपचिति भवति विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति ॥२॥ करकलित जपवलित मणिगुण उरु चलति स हि सततमपि जगति शुभगतिमनुफलति नवल मतिझरमिह तरलयति यतिमवति विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति ॥३॥ तव ललितरव-तत कुकुभ परिमिलदुरसि तरति सुतरतिनुलहरिरिव हिमसरसि विबुधजनकृतसुकृतिरिहजनमभिभवति विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति ॥४॥ गीत का भावार्थ "विधिरमणि तव न भव उपमितिमनुभवति" अर्थात् – हे ब्रह्मा की प्रिय देवी सरस्वती! इस संसार में कोई भी आपकी उपमा नहीं पा सकता। आपका सौंदर्य, ज्ञान और महिमा अनुपम है। प्रथम श्लोक देवी श्वे...

कौशलेन्द्र के नवगीत

 माँ चूल्हे की जलती रोटी सी तेज आँच में जलती माँ। भीतर-भीतर बलके फिर भी बाहर नहीं उबलती माँ , रेशे-रेशे धागे बुनती, नई रुई सी खुद को धुनती नववीणा की तनी ताँत-सी घर-आँगन में चलती माँ। सावन के मेघ जल भरे सावन के मेघ जल भरे भीगी पलकों पर उतरे धान पान तिथियाँ त्योहार की बेटी ससुराल से पुकारती फसलों पर ऋण की हरियाली हँसी झरे होठों से उधार की ऊपर से आँगन के नखरे बिजुरी सी चमकें चिन्ताएँ अँधियारे चलते दायें-बाँये ऐसे में राह नहीं सूझे बिजुरी की कौंध आजमायें पाँवों के चिह्न कहाँ उभरे, उफनाये ताल नदी नाले आँगन में ओरी पर नाले फुफकारें हर कोने से विपदाओं के विषधर काले मुरझाये जूड़े के मोंगरे सावन के मेघ जल भरे। जनसन्देश में  प्रकाशित  2012