बाबा की उघन्नी': एक ढहते सामंती ढांचे का विश्लेषण



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आदरणीय डॉ० शिवशंकर मिश्र की कहानी 'बाबा की उघन्नी' ग्रामीण भारत की ढहती हुई सामंती सत्ता और संयुक्त परिवार की आंतरिक संवेदनहीनता का एक बेबाक दस्तावेज़ है।

हुकूमत का भ्रम : उघन्नी और लाठी

कहानी के केंद्र में बाबा की 'उघन्नी' (चाबियों का गुच्छा) है, जो महज़ लोहे का टुकड़ा नहीं. बल्कि उनकी महारत और हुकूमत का एक मुगालता है। विडंबना यह है कि ये चाबियाँ अब 'बेकार' और 'नकली' हो चुकी हैं, फिर भी 110 साल के बाबा इन्हें अपनी मुट्ठी में भींचे हुए हैं, ताकि परिवार पर उनकी संप्रभुता क़ायम रहे। यह गुच्छा उस मरणासन्न सामंती व्यवस्था का प्रतीक है. जो वक़्त के साथ अपनी रूह खो चुकी है।

आर्थिक खोखलापन : फ़र्ज़ी हिसाब-किताब

कहानी में अतीत और वर्तमान का एक अजीबोग़रीब टकराव है। बाबा आज भी तीस साल पुरानी क़ीमतों की कल्पना में जी रहे हैं, जहाँ ट्रैक्टर तीन हज़ार का है। दूसरी तरफ़, हक़ीक़त यह है कि परिवार क़र्ज़ के दलदल और किसान क्रेडिट कार्ड के बोझ तले दबा है। संतोख द्वारा बाबा को दिया जाने वाला 'झूठा लेखा' उस मजबूरी और फ़रेब को साफ़ तौर पर ज़ाहिर करता है, जहाँ बुजुर्गों के 'पुन्य-प्रताप' के भ्रम को बचाने के लिए सच का गला घोंटा जाता है।

दिखावे बनाम हकीकत : पितृसत्तात्मक निष्ठुरता

लेखक ने उस साहुत के पर्दे को चाक किया है, जिस पर दुनिया रश्क करती है। घर के भीतर औरतों के दरमियान जो दिमागी और मनोवैज्ञानिक जंग है, वह 'नचकऊ बहू' की मौत से अपने चरम पर पहुँचती है। एक महीने से बीमार बहू की तीमारदारी महज़ इसलिए नहीं हुई, क्योंकि घर में शादी का तमाशा और तामझाम चल रहा था। उसकी मौत के बाद भी हीरालाल जी की पहली फ़िक्र यह थी कि 'मेहमान खाना नहीं खाएंगे', जो इस पितृसत्तात्मक ढांचा की बेहद निष्ठुर और संवेदनहीन तस्वीर पेश करता है।

मौत का ख़ौफ़ : अस्तित्ववादी तड़प

बाबा की जिजीविषा और मौत के बीच का मंज़र कहानी का सबसे कारुणिक हिस्सा है। यमपुरी के हाकिमों को 'बत्तीस आने' की रिश्वत (टिकस) देकर पाँच साल की मोहलत माँगना, उनके सत्ता-मोह और नाशवानता के डर को ज़ाहिर करता है। वे मौत से डरते हैं, 'अलगौझी' (बंटवारे) से डरते हैं और इसीलिए अपनी 'उघन्नी' को मुट्ठी में और कस लेते हैं।

निष्कर्ष

'बाबा की उघन्नी' एक ऐसी कालजयी कृति है, जो समाज के उस तबके का पर्दाफ़ाश करती है; जो ऊपर से 'अमीर' मगर अंदर से आर्थिक बदहाली का शिकार है। यह कहानी साबित करती है कि जब परंपराएँ बोझ बन जाएँ, तो वे इंसानियत का दम घोंटने लगती हैं। नचकऊ बहू की लाश के पास जलती हुई आग और बाबा की उघन्नी पर उनकी मजबूत होती पकड़, मानवीय संवेदनाओं के क्षरण की दिल को चीर देने वाली कहानी है।

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