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जहाँ सीसीटीवी हार गए और अंतःकरण जीत गया : ‘हराम की नहीं’

🎙️ जब विश्वविद्यालय की नैतिकता डगमगाने लगती है, तब एक साधारण रिक्शाचालक ईमानदारी का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाता है। शिवशंकर मिश्र की कहानी ‘हराम की नहीं’ का यह श्रव्य रूप कहानी के भावलोक में प्रवेश करने का एक सशक्त माध्यम है - समकालीन हिंदी कहानी का एक महत्त्वपूर्ण दायित्व अपने समय की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक जटिलताओं को इस प्रकार अभिव्यक्त करना है कि वे केवल घटनाओं का विवरण न रह जाएँ, बल्कि समाज और मनुष्य की गहरी परतों को उद्घाटित करने वाली रचनात्मक संरचनाओं में रूपांतरित हो सकें।   शिवशंकर मिश्र की कहानी ‘हराम की नहीं’ इसी अर्थ में एक उल्लेखनीय रचना है।  यह कहानी पहली दृष्टि में विश्वविद्यालय के एक मूल्यांकन केंद्र में घटित एक साधारण-सी घटना पर आधारित प्रतीत होती है, किंतु इसके भीतर प्रवेश करते ही स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल भ्रष्टाचार, रिश्वत या शिक्षा-व्यवस्था की कहानी नहीं है; यह उस नैतिक संकट की कथा है, जिसमें आधुनिक संस्थाएँ, शिक्षित मध्यवर्ग और सामाजिक प्रतिष्ठा के स्थापित मानदंड धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता खोते जाते हैं, जबकि जीवन के हाशिए पर खड़ा एक साधारण मनुष्य नैति...

बाबा की उघन्नी': एक ढहते सामंती ढांचे का विश्लेषण

यह कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक का प्रयोग करें - https://aakhyaan.blogspot.com/2010/06/blog-post.html आदरणीय डॉ० शिवशंकर मिश्र की कहानी 'बाबा की उघन्नी' ग्रामीण भारत की ढहती हुई सामंती सत्ता और संयुक्त परिवार की आंतरिक संवेदनहीनता का एक बेबाक दस्तावेज़ है। हुकूमत का भ्रम : उघन्नी और लाठी कहानी के केंद्र में बाबा की 'उघन्नी' (चाबियों का गुच्छा) है, जो महज़ लोहे का टुकड़ा नहीं. बल्कि उनकी महारत और हुकूमत का एक मुगालता है। विडंबना यह है कि ये चाबियाँ अब 'बेकार' और 'नकली' हो चुकी हैं, फिर भी 110 साल के बाबा इन्हें अपनी मुट्ठी में भींचे हुए हैं, ताकि परिवार पर उनकी संप्रभुता क़ायम रहे। यह गुच्छा उस मरणासन्न सामंती व्यवस्था का प्रतीक है. जो वक़्त के साथ अपनी रूह खो चुकी है। आर्थिक खोखलापन : फ़र्ज़ी हिसाब-किताब कहानी में अतीत और वर्तमान का एक अजीबोग़रीब टकराव है। बाबा आज भी तीस साल पुरानी क़ीमतों की कल्पना में जी रहे हैं, जहाँ ट्रैक्टर तीन हज़ार का है। दूसरी तरफ़, हक़ीक़त यह है कि परिवार क़र्ज़ के दलदल और किसान क्रेडिट कार्ड के बोझ तले दबा है। संतोख द्वारा बाबा को...

'अंतिम उच्चारण' : संवेदना, प्रतीक और मनोवैज्ञानिक विस्थापन का आलोचनात्मक विश्लेषण -

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"यह लेख डॉ. शिवशंकर मिश्र की कहानी 'अंतिम उच्चारण' के साहित्यिक अध्ययन और आलोचनात्मक विवेचन पर आधारित है। प्रस्तुत विचार मेरे निजी अध्ययन और विश्लेषण का परिणाम हैं।" कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें -  https://aakhyaan.blogspot.com/2010/05/blog-post_24.html अंतिम उच्चारण : संक्षिप्त कथा-सार गाँव का एक मूक बालक, जिसे लोग "बई" कहकर पुकारते हैं, अपनी सरलता, निष्कपटता और प्रेमपूर्ण स्वभाव के कारण पाठकों के मन को छू लेता है। वह समाज की जटिल जातिगत और सामाजिक संरचनाओं को नहीं समझता। उसकी दुनिया बच्चों की मित्रता, माँ के स्नेह और प्रकृति के सौंदर्य तक सीमित है।  एक छोटी-सी घटना के कारण वह सामाजिक बहिष्कार का शिकार बन जाता है। धीरे-धीरे उसके जीवन में अकेलापन, अपमान और मानसिक आघात बढ़ते जाते हैं। पिता की मृत्यु और समाज की कठोर मान्यताएँ उसकी संवेदनशील चेतना को गहराई से प्रभावित करती हैं।  कहानी अंततः यह प्रश्न उठाती है कि क्या समाज की तथाकथित "शुद्धता" और "सुधार" की अवधारणाएँ किसी व्यक्ति की मानवीय गरिमा और स्वतंत्र अस्तित्व से अधिक महत्वपू...

श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान : ‘पखावज वृत्तान्त’

कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - https://aakhyaan.blogspot.com/2019/10/blog-post.html ‘पखावज वृत्तान्त’ : श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान - आदरणीय डॉ0 शिवशंकर मिश्र जी  की कहानी ‘पखावज वृत्तान्त’ भारतीय समाज की जातिगत विडम्बनाओं, श्रम की उपेक्षा और सांस्कृतिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य करती है। आकार में छोटी होने के बावजूद यह कहानी अपने भीतर अत्यन्त व्यापक सामाजिक अर्थ समेटे हुए है। लेखक ने प्रतीकात्मक शैली के माध्यम से यह दिखाया है कि समाज जिन वस्तुओं, व्यक्तियों अथवा श्रम को ‘जूठा’ कहकर तिरस्कृत करता है, वही वास्तव में जीवन और सृजन के सबसे आवश्यक तत्व होते हैं। कथ्य कहानी का मूल कथ्य भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत ऊँच-नीच, श्रम की उपेक्षा और सामाजिक पाखंड को उजागर करना है। लेखक यह स्थापित करना चाहता है कि जिन श्रमिकों और निम्नवर्गीय लोगों के श्रम से समाज और संस्कृति जीवित रहती है, उसी समाज में उन्हें तिरस्कार और अपमान का सामना करना पड़ता है। ‘भात’ और ‘पखावज’ के माध्यम से कहानी यह बताती है कि जीवन, कला और सृजन का वास्तविक आधार श्रम है, किन्तु सामंती मानसिकता उ...