‘पखावज वृत्तान्त’ : श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान


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‘पखावज वृत्तान्त’ : श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान -

आदरणीय डॉ0 शिवशंकर मिश्र जी की कहानी ‘पखावज वृत्तान्त’ भारतीय समाज की जातिगत विडम्बनाओं, श्रम की उपेक्षा और सांस्कृतिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य करती है। आकार में छोटी होने के बावजूद यह कहानी अपने भीतर अत्यन्त व्यापक सामाजिक अर्थ समेटे हुए है। लेखक ने प्रतीकात्मक शैली के माध्यम से यह दिखाया है कि समाज जिन वस्तुओं, व्यक्तियों अथवा श्रम को ‘जूठा’ कहकर तिरस्कृत करता है, वही वास्तव में जीवन और सृजन के सबसे आवश्यक तत्व होते हैं।

कथ्य

कहानी का मूल कथ्य भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत ऊँच-नीच, श्रम की उपेक्षा और सामाजिक पाखंड को उजागर करना है। लेखक यह स्थापित करना चाहता है कि जिन श्रमिकों और निम्नवर्गीय लोगों के श्रम से समाज और संस्कृति जीवित रहती है, उसी समाज में उन्हें तिरस्कार और अपमान का सामना करना पड़ता है। ‘भात’ और ‘पखावज’ के माध्यम से कहानी यह बताती है कि जीवन, कला और सृजन का वास्तविक आधार श्रम है, किन्तु सामंती मानसिकता उसे स्वीकार करने के बावजूद सम्मान नहीं देती। अंततः कहानी श्रमशील जनता की जीवटता और लोक-संस्कृति की अमर शक्ति को रेखांकित करती है।

कथानक

कहानी का कथानक अत्यन्त सरल किन्तु अर्थगर्भित है। इन्द्र के दरबार में पखावज बजाने की तैयारी होती है, किन्तु बिना ‘भात’ लगाए उससे मधुर ध्वनि नहीं निकलती। जब भात लगाया जाता है, तब पखावज जीवंत हो उठता है, किन्तु उसी क्षण उसे ‘जूठा’ मानकर नाले में फेंक देने का आदेश दे दिया जाता है। आगे चलकर वही पखावज मेहनतकश शूद्रों के हाथों में जाकर पुनर्जीवित होता है। यह कथानक केवल एक वाद्ययंत्र की कथा नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक संरचना का रूपक है।

कहानी में ‘पखावज’ केवल वाद्य नहीं, बल्कि श्रमशील मनुष्य और लोक-संस्कृति का प्रतीक है। ‘भात’ यहाँ उस श्रम, स्पर्श और जीवन-रस का प्रतीक बन जाता है जिसके बिना कोई कला जीवित नहीं रह सकती। विडम्बना यह है कि जिस भात से पखावज में मधुरता आती है, उसी के कारण उसे अपवित्र घोषित कर दिया जाता है। लेखक ने इसी विरोधाभास के माध्यम से ऊँच-नीच की मानसिकता पर गहरी चोट की है।

कहानी का सबसे प्रभावशाली पक्ष उसका व्यंग्य है। महाराज और दरबारियों का व्यवहार उस सामंती मानसिकता को उजागर करता है, जो श्रम के उपयोग को तो स्वीकार करती है, किन्तु श्रमिक के सम्मान को नहीं। दरबार में बार-बार नए पखावज मिढ़वाए जाते हैं, परन्तु हर बार वे ‘जूठे’ घोषित कर दिए जाते हैं। यह स्थिति उस सामाजिक ढाँचे का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ श्रम का शोषण तो होता है, किन्तु श्रमिक को सम्मान और अधिकार नहीं मिलते।

लेखक की भाषा अत्यन्त सरल, प्रवाहपूर्ण और व्यंजना-समृद्ध है। कहीं भी अनावश्यक अलंकरण नहीं है, फिर भी कथा अपनी प्रतीकात्मकता और व्यंग्य के कारण गहरी प्रभावशीलता अर्जित करती है। ‘भाँय-भाँय’, ‘भद्द-भद्द’ और ‘मधुर बोल’ जैसे ध्वन्यात्मक शब्द कहानी को जीवंत बना देते हैं। संवाद छोटे हैं, किन्तु अपने भीतर तीखा सामाजिक अर्थ रखते हैं।

कहानी का अन्त विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जो पखावज राजमहल में उपेक्षित होकर नाले में सड़ जाते हैं, वही मेहनतकशों के हाथों में जाकर ‘चिरंजीवी’ हो उठते हैं। यह अन्त केवल आशा का संकेत नहीं, बल्कि यह घोषणा भी है कि सृजन, संस्कृति और जीवन की वास्तविक शक्ति राजमहलों में नहीं, बल्कि श्रमशील जनता के हाथों में निहित है।

समग्रतः ‘पखावज वृत्तान्त’ एक अत्यन्त सारगर्भित, प्रतीकात्मक और वैचारिक कहानी है। यह कहानी जाति-व्यवस्था, छुआछूत और श्रम-विरोधी मानसिकता की आलोचना करते हुए श्रम और लोक-संस्कृति की गरिमा को स्थापित करती है। अपनी तीक्ष्ण सामाजिक दृष्टि, सशक्त प्रतीकों और प्रभावशाली व्यंग्य के कारण यह कहानी हिंदी साहित्य में विशेष महत्व रखती है।       

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