संस्मरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संस्मरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 19 मार्च 2026

निराला और महादेवी

12 सितंबर 2024   
हम लोग तब बी.ए.के छात्र थे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में, जब पता चला कि निराला पर बोलने महादेवी आयेंगी और मेरी पूरी मित्र मंडली ने नाक भौं सिकोड़ी। 'ये क्या बोलेंगी? समीक्षक हैं क्या?' आदि आदि। सीनेट हाल के एक हिस्से में कार्यक्रम शुरू होने से थोड़ा पहले ही हम लोग पहुँच गये इस लोभ के साथ कि कुछ न कुछ चाय बिस्किट तो मिलेगा ही। चाय तो नहीं मिली। काफी आयी। पहला घूँट लेते ही मुझे लगा कि चाय तो बहुत जल गयी, लेकिन दिमाग की तनी हुई नसों को अपूर्व आराम मिला। महादेवी जी ने बोलना शुरू किया। पहले ही उन्होंने निवेदन कर दिया कि वे न तो समीक्षक हैं और न ही समीक्षा करने आयी हैं। 'कुछ सुधियां हैं, जिन्हें मैं साझा करने आयी हूं।' फिर तो अपनी खरखराती आवाज में उन्होंने निराला से अपने संबंध के एक से एक दिलचस्प और विलक्षण प्रसंगों की विस्तार से चर्चा की। अब हम लोग मंत्रमुग्ध। 'ये क्या बोलेंगी निराला पर'? यह प्रश्न हम लोगों के मस्तिष्क में कहीं दफ्न हो गया। कैसे निराला उन्हें बहन मानते थे, कैसे राखी के दिन पंत जी निर्धारित समय पर और निराला किसी भी समय पहुँचते थे और दरवाजा खुलने से पहले ही आवाज लगाते थे, 'महादेवी, महादेवी दो रुपए भी लेती आना।'

'दो रूपये का क्या करेंगे?'
'एक रुपया रिक्शे वाले को देंगे और एक तुम्हे।'
महादेवी जी बोल रही थीं हम लोग उनकी सुधियों के सरित प्रवाह में ऊभ-चूभ हो रहे थे। काफी से मेरा दिमाग हल्का हुआ था, महादेवी जी के सुधियों के संचय की उस सहज सरल अभिव्यक्ति में निराला का महामानव रूप भास्वर हो रहा था। मेरे मन में एक महाप्राण का चिरस्थायी तैल चित्र बन रहा था। अब मेरा सिर जो हल्का हुआ था, वह उदात्त दशा को पहुँच रहा था।हाँ, उसी क्रम में उन्होंने पंत जी के बारे में बताया कि कैसे एक बार पंत जी बाल कटा कर पहुँचे राखी बँधवाने और महादेवी जी के पूछने पर बोले,'आज कल दास कैपिटल पढ़ रहा हूँ।' महीयसी को स्मृति नमन..!

 

मुंशी सतई सिंह

Shivshankar Mishra

6 सितंबर 2024 ·

अक्षर और अंक बोध तो माँ ने कराया और बड़े बाबा ने। कक्षा तीन से प्राथमिक विद्यालय में जाना हुआ। वहाँ मुंशी सतई सिंह थे, जिनका दृढ़ विश्वास था कि जो पहाड़ा नहीं याद कर सकता, वह पढ़ाई नहीं कर सकता। पहाड़ा कभी याद न हुआ, नतीजतन रोज़ दोनों हथेलियों के गुरु पर्वत मुंशी जी के डंडे की चोट से घायल रहते। जिस दिन मुंशी जी छुट्टी पर रहते हम लोग बेहद खुश होते। सहायक अध्यापक पिटाई नहीं करते थे।कभी कर भी देते,तो प्रतीकात्मक। विद्यालय पहुँच कर हम लोग दूर महुए के पेड़ों तले तक उनकी साइकिल की आतंक पैदा करने वाली चमक देखते।..आ तो नहीं रहे हैं मुंशी जी!
हाँ, एक बात और। जब वे पिटाई करते,तो एक गाली ज़रूर देते,'चमार'। चूँकि मुंशी जी खुद उसी जाति के थे, इस लिए इसे निरामिष ही समझा जाता। होता भी था। कक्षा पाँच की परीक्षा में 'सेंटर' शब्द से परिचय हुआ। मुंशी जी कभी कहते 'सेंटर अमुक जगह जायेगा', कभी कहते- 'नहीं दूसरी जगह जायेगा। हम लोगों में कौतूहल था और भय भी। ..कितना बड़ा होगा सेंटर! ..कहाँ से आयेगा !..पहिये तो बड़े बड़े होंगे! आदि आदि। सेंटर तो आया नहीं। हाँ, हम लोगों को जाना पड़ा। पूरे परीक्षा काल में भय। लिखित परीक्षा होने के बाद पहली बार मुंशी जी मुस्कराते हुए कहा, 'काहे रे चमार, तू ने नंबर तो अच्छे पाये हैं। चल, एक गाना सुना दे।' मुंशी जी की उपस्थिति में गाना? बमुश्किल एक पंक्ति सुनायी। आगे भूल गया। 'चल,चल! ठीक सुनाया।' यह उनके वत्सल रूप का पहला दीदार था। इस तरह मुंशी जी के दृढ़ विश्वास के विपरीत बिना पहाड़ा याद किये प्राथमिक कक्षाओं से निजात मिली।

लेखपाल नुमा बुजुर्ग

·
वह कौन सा वर्ष था, याद नहीं, जब देवेन्द्र जी एक लेखपाल नुमा बुजुर्ग के साथ बिरला छात्रावास (बी.एच.यू.) के मेरे कमरे में आये और बोले- 'ये त्रिलोचन जी हैं और आज ही इन्हें दिल्ली जाना है।' उस दिन शहर में कर्फ़्यू था। रिक्शे बंद थे। आखिरकार एक साइकिल का इंतजाम किया गया। त्रिलोचन जी ख़ुशी से आगे बैठ गये। मैं ने महसूस किया कि भारी वजन है इस ठोस काया का। देवेन्द्र जी तो मुक्त हो गये थे। अब मैं और त्रिलोचन और साइकिल। हाँ, शहर के बाहर का रास्ता मुझे मालूम नहीं था, मगर शहर से बाहर आकर त्रिलोचन जी मुखर हो गये- 'मुझे सब पता है। चलिए। हाँ आप को परेशानी हो रही हो, तो साइकिल मैं चलाऊँ।' मैं चौंक गया। यह उम्र और यह कद काठी, ये साइकिल चलायेंगे, वह भी मुझे बैठा कर?'
'नहीं नहीं। आप बैठे रहें। बस मुझे रास्ता बताते रहें।'

फिर तो वे रास्ता ही नहीं, रास्ते में मिलने वाली एक एक घास का सविस्तार परिचय देने लगे।कभी कभी तो साइकिल से उतर कर भी। जंक्शन से पहले तक वे चुप नहीं हुए। कैसे उन्होंने लाहौर में रिक्शा चलाया और और भी बहुत कुछ। अब मैं अभिभूत हो रहा था। संस्कृत की उनकी बहुज्ञता से लाहौर वाले प्रसंग में ही परिचित हुआ। बकौल त्रिलोचन, उनके रिक्शे पर संस्कृत के दो विद्वान बैठे थे और एक शब्द की व्युत्पत्ति पर जिरह कर रहे थे। जिरह खत्म नहीं हुई। मंजिल तक पहुँचाकर त्रिलोचन जी ने रिक्शा रोका और उनकी जिरह सही उत्तर देकर खत्म करवायी। ट्रेन आ गयी। त्रिलोचन चले गये और अपनी सहजता और सरलता के साथ मेरे भीतर उतर गये..!

कुछ महीनों पहले प्रोफ़ेसर राजेन्द्र कुमार

Shivshankar Mishra

19 अगस्त 2024 ·

कुछ महीनों पहले Rajendra Kumar (प्रोफ़ेसर राजेन्द्र कुमार) से फोन पर बात हो रही थी। बीच में कुछ ऐसा हुआ कि बात अधूरी रही और फोन कट गया। मैं ने लिख भेजा कि तकनीक की समस्या से बात अधूरी रही। तत्त्काल प्रोफ़ेसर कुमार का आशुकवि रूप देखने को मिला -'तन नीक रहै,मन नीक रहै,तकनीक रहै कि रहै न रहै। यों यह वाग्विनोद ही था, मगर यह भी प्रमाणित हुआ कि मुक्त छन्द में लिखने वाले कवियों की सहज अभिव्यक्ति में भी छंद साधना निहित होती है। किसी मजबूरी में उन्हें छंद का अतिक्रमण करना पड़ता है, लेकिन आंतरिक लय का नहीं।



'अंतिम उच्चारण' : संवेदना, प्रतीक और मनोवैज्ञानिक विस्थापन का आलोचनात्मक विश्लेषण -

प्रस्तावना : कथा का वैचारिक धरातल और सामरिक महत्व- शिवशंकर मिश्र की कहानी 'अंतिम उच्चारण' हिंदी कथा-साहित्य के यथार्थवादी परिप्रेक्ष...