Thursday, 19 March 2026

कुछ महीनों पहले प्रोफ़ेसर राजेन्द्र कुमार

 Shivshankar Mishra

कुछ महीनों पहले Rajendra Kumar (प्रोफ़ेसर राजेन्द्र कुमार) से फोन पर बात हो रही थी। बीच में कुछ ऐसा हुआ कि बात अधूरी रही और फोन कट गया। मैं ने लिख भेजा कि तकनीक की समस्या से बात अधूरी रही। तत्त्काल प्रोफ़ेसर कुमार का आशुकवि रूप देखने को मिला -'तन नीक रहै,मन नीक रहै,तकनीक रहै कि रहै न रहै। यों यह वाग्विनोद ही था, मगर यह भी प्रमाणित हुआ कि मुक्त छन्द में लिखने वाले कवियों की सहज अभिव्यक्ति में भी छंद साधना निहित होती है। किसी मजबूरी में उन्हें छंद का अतिक्रमण करना पड़ता है, लेकिन आंतरिक लय का नहीं।

हम ऐसे युग में जीने को विवश हैं, जिस में चोर खुद को आसानी और बेहयाई से महान घोषित कर देते हैं...

 सुन रहा हूँ, कवि नरेश सक्सेना के साथ हुआ अपराध और यह भी कि वे व्यथित हो कर एकान्त वास में चले आते वे। सक्सेना जी,चोर अब 'महान' समझने लगे हैं खुद को। सन् 2014के 'आलोचना' के अंक में श्री राजेश जोशी की कविता 'पखावज वृत्तान्त' देख कर मैं ही नहीं, अनेक मित्र चौंक गये, क्यों कि यह 'अभिप्राय', अप्रैल 1983 में प्रकाशित मेरी लोक शैली में लिखी कहानी का अविकल रूप था। शीर्षक तक नहीं बदला गया। मेरा लीगल नोटिस मिलने पर फोन से उनकी क्षमा याचना आती, मगर अखबार में उनके वक्तव्य का शीर्षक था'एक रचना चुरा कर मैं महान न बन जाता। 'साहित्यिक थानेदारों को मेरे पंजीकृत और खुले पत्र भी नहीं मिले। क्या मतलब इस भाषा में कुछ लिखने का? कोई कभी चुरा लेगा और फिर खुद के महान होने की घोषणा कर देगा। सक्सेना जी का एकान्तवासी होना स्वाभाविक है। मैं तो हो गया। मैं मशहूर नहीं हूँ,पर नरेश जी आप न हों। 'महान' भले ही न हों, पर मशहूर तो हैं। हम ऐसे युग में जीने को विवश हैं, जिस में चोर खुद को आसानी और बेहयाई से महान घोषित कर देते हैं और भेड़ियाधसान जैकारे लगने लगते हैं।

SHIV SHANKAR MISHRA



साहित्य में चौर्य और प्रेरण-

 Shivshankar Mishra

अभी कुछ घंटे पहले Shiv Murti जी का फोन आया। मुझे लगा कि मामला कुछ कुशल क्षेम जैसा होगा। हुआ भी; पर असल मामला कुछ यूँ था कि वे मेरी पत्नी से और मुझसे तकरीबन तीस साल पहले (या शायद उससे भी ज्यादा) सुने गये लोकगीतों में से एक 'डोरी डाल दे' का अपनी एक कथाकृति में उपयोग करने हेतु अनुमति माँग रहे थे। यह उनकी विनम्रता भी है और साहित्यिक तरीका भी। इससे पहले 'तर्पण' की रचना प्रक्रिया के दौरान उन्होंने बड़ी साफगोई से मुझसे सुने गये किसी कथा प्रसंग को कथा विषय बनाया था, ऐसी सूचना भी दी थी। पर मेरी किसी रचना का निषेध उनकी कोई भी रचना नहीं करती। एक ही घटना या परिवेश अलग अलग रचनात्मक मानस को अलग अलग प्रतीतियाँ देता है।इसी क्रम में राजेश जोशी याद आते हैं। फोन उन्होंने भी किया था, पर अनुमति के लिए नहीं, माफी माँगने के लिए। वह भी तब, जब उनकी तथाकथित कविता 'पखावज वृत्तांत' आलोचना में प्रकाशित करवा ली और मेरा लीगल नोटिस उन्हें प्राप्त हुआ। माफी का औचित्य आज तक मेरी समझ में नहीं आया। यदि उन्होंने मेरी रचना का अर्थोपकर्ष किया होता, तो मैं उनका अभिनंदन करता, पर उन्होंने तो अर्थापकर्ष किया है।

मैं तो चेतना का नैरन्तर्य हूं।

मेरे आत्मस्वरूपा हैं शिवशंकर मिश्र (Shivshankar Mishra)। कोई छल-छद्म नहीं, एकदम सच्चे, भोले शंकर, निष्कपट। कंठ में सरस्वती, कर में काम भर की लक्ष्मी। बुजुर्ग की परवाह, बच्चों की सरलता। हम सभी उनको अस्सी के दशक से ही पंडित कहते आए हैं। मेरी बीमारी की बात सुनी तो विह्वल हो गए। बेटे से फोन करवाया। हाल-चाल जाना। बोले – अनिल, हम लोग तो न जाने कब से भूत बन गए चुके हैं, बस शरीर यहां पड़ा है। फिर बातचीत के दौरान भावुक हो गए। बोले – हम न मरब, मरे संसारा।
यह विचार तभी से छज्जे पर बैठे पंछी के टूटे कोमल पंख की तरह मेरे मन में भटक रहा है। कबीर ने जब यह कहा होगा तो उनका मतलब क्या था? कबीर हमारे अपने जिस इलाके में जन्मे, पल-बढ़े, घूमे-फिरे और संतई की, वहां हम का सीधा मतलब ‘मैं’ होता है। उनका कहना था – मैं नहीं मरूंगा, मरेगा यह संसार। क्या कबीर का ‘मैं’ शंकराचार्य का ब्रह्म है या गीता की आत्मा? दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना, रामनाम का मरम है आना – कहनेवाले कबीर का ‘मैं’ ब्रह्म या आत्मा कतई नहीं हो सकता। फिर क्या है?
बुद्ध कहते हैं सब मर जाता है हमारे कर्म नहीं मरते। उनका नैरन्तर्य है। उन्होंने भव-संसार की कड़ी-दर-कड़ी निकाली थी। बुद्ध का कहना था: अनित्य को नित्य, अशुद्ध को शुद्ध, दुख को सुख और अनात्म को आत्म जानना ही अविद्या है और इस अविद्या से ही तमाम संस्कार या मनोगत धारणाएं पैदा होती हैं। मृत्यु के समय जो च्युति संस्कार या सबसे गहरी गांठ होती है, वह नए जन्म का सबब बन जाती है।
बुद्धवाणी में कहा गया है - अविज्जा पच्चया संखारा, संखारा पच्चया विञ्ञाणं, विञ्ञाण पच्चया नामरूपं, नामरूप पच्चया सलायतनं, सलायतन पच्चया फस्सो, फस्स पच्चया वेदना, वेदना पच्चया तण्हा, तण्हा पच्चया उपादानं, उपादान पच्चया भवो, भव पच्चया जाति। अविद्या से संस्कार, उनसे चेतना या प्रकृति के नियमों का बंधन, शरीर व चित्त, मन समेत छह इंद्रियां, स्पर्श, संवेदना, तृष्णा व आसक्ति। आसक्ति से भव-पुनर्भव, भव-संसार और फिर जन्म से मृत्यु तक का चक्र दोबारा चल निकलता है।
हमारे कर्मों से निकले संस्कार ही नए जन्म का आधार बनते हैं। लोक में तो यहां तक मान्यता है कि नया जन्म मनुष्य या किसी जीव के रूप में ही नहीं, पेड़-पौधों तक के रूप में हो सकता है। सीत-बसंत की कथा में दोनों भाइयों को उनकी सौतेली मां मरवा डालती है तो वे अपने घर के पीछे फूलों का पौधा बनकर जन्म लेते हैं।

बुद्ध की बात से लेकर लोक की मान्यता ही कबीर के इस कथन का सार है कि हम न मरब, मरे संसारा। भव की कड़ी टूट जाएगी तो यह भव-संसार मिट जाएगा। लेकिन मैं तो चेतना का नैरन्तर्य हूं। मैं कहां मरनेवाला। उस दिन पंडित ने भी कहा था – चेतना का नैरन्तर्य है। आखिर कौन-सी चेतना का नैरन्तर्य? वही चेतना जो कोई तरल या ठोस नहीं, जिसे हम अपने कर्मों से बराबर जन्म-दर-जन्म गढ़ते व बदलते रहते हैं, परिष्कृत करते रहते हैं, जिसने अरबों साल में मछली, सरीसृप व पक्षी से इंसान बनने तक सफर तय किया है।

शायद इंसान के दो स्वरूप साथ-साथ चलते रहते हैं। एक तो शरीर है जो लीवर से लेकर किडनी, फेफड़े, हृदय व तमाम अंगों-प्रत्यंगों का समन्वय है और दूसरा है उसका मनोमय रूप जो वह पिछले जन्म के च्युति संस्कार से लेकर रेशा-दर-रेशा हमारी क्रिया-प्रतिक्रिया व अनुभवों से बनता जाता है। मरने पर शरीर के रसायन रीसाइकल हो जाते हैं, जबकि मन का भी सब कुछ हवा हो जाता है केवल च्युति सस्कार को छोड़कर जो आगे की यात्रा का आधार बन जाता है। यही चेतना का नैरन्तर्य है। यही जीवन का सातत्य है।
अंत में पंडित की बात से ही अपनी बात समाप्त करता हूं, “यों भी कभी सिर्फ अपने लिए नहीं जिए, अब क्या! मौत की तलाश में इतने जीवन की कल्पना भी कभी नहीं थी!
जय जीवन! जय सातत्य की प्रतीति!

शून्य का एहसास

मेरी रिक्तता का बोध और
शून्य का एहसास कह रहा
ओ मेरी प्रतिभा मर जाओ
जिन्दगी जुआ जब बन जाये
तब हार जीत के क्या माने।
मैंने सोचा है
मेरी मौत वहाँ हो
जहाँ-न कोई गीध हो
न चील,न कुत्ता,न स्यार
न घड़ियाल
और न कोई-
घड़ियाली आँसू हो।

अंतिम उच्चारण- शिवशंकर मिश्र सहयात्रा प्रकाशन, नयी दिल्ली

 Shashank Shukla, Shivshankar Mishra के साथ हैं.

30 जुलाई 2021 





आज आदरणीय डॉ शिवशंकर मिश्र जी का कहानी संग्रह 'अंतिम उच्चारण' मिला। कहानी में छः कहानी संग्रहीत हैं। अंतिम उच्चारण, बाबा की उघन्नी, मूरतें, मुनुआ की वीरगति, पखावज, मुजरिम। इनमें पखावज कहानी अवांतर कारणों से चर्चित रही है। वर्षों पहले संभवतः कथादेश में बाबा की उघन्नी पढ़ी थी, तभी शिवशंकर मिश्र जी के कहानी कहन के ढंग से प्रभावित हुआ था। संग्रह की अंतिम कहानी मुजरिम 101 पेज की लंबी कहानी है। युवा कहानी में लंबी कहानी एक प्रचलित शिल्प विधान रहा है।
लेखक परिचय में माता-पिता का नाम दर्ज़ है, जो लेखक के जड़ों से जुड़ाव का संकेत समझना चाहिए। उचित ही है कि पुस्तक पिता को समर्पित है।
पुस्तक में भूमिका नहीं है। लेखक का मानना है कि कहानी स्वयं में एक भूमिका होती हैं। अतः कहानी स्वयं एक पूर्व कथन और मुख्य कथन है।
शिवशंकर मिश्र कम लिखते हैं, किन्तु ठहराव के साथ लिखते हैं। आपको पढ़ना ठहर कर ही सम्भव है। शेष पाठ के बाद...