संदेश

2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नाद ब्रह्म : संगीत की अनंत कहानी

चित्र
संगीत केवल कला नहीं है। यह मनुष्य की अनुभूति, प्रकृति की लय और आत्मा की अभिव्यक्ति का संगम है। यदि पूछा जाए कि संगीत कब और कैसे आया, तो इसका उत्तर केवल इतिहास में नहीं, बल्कि मनुष्य के हृदय, उसकी संवेदनाओं और उसकी आध्यात्मिक खोज में भी छिपा हुआ है। संगीत का जन्म किसी एक दिन नहीं हुआ। वह धीरे-धीरे मनुष्य के भीतर अंकुरित हुआ, जैसे बीज से वृक्ष विकसित होता है। जब शब्द नहीं थे, तब भी संगीत था..... कल्पना कीजिए उस समय की, जब मनुष्य ने भाषा का विकास नहीं किया था। वह बोल नहीं सकता था, लेकिन वह महसूस करता था। उसे भय लगता था, प्रसन्नता होती थी, प्रेम होता था, दुःख होता था। जब वह प्रसन्न होता, तो उसकी आवाज़ में एक विशेष लय आ जाती। जब वह दुखी होता, तो उसकी ध्वनि बदल जाती। यही भावपूर्ण ध्वनियाँ संगीत के प्रथम बीज बनीं।  संगीत किसी एक व्यक्ति का आविष्कार नहीं है। वह प्रकृति की गोद में जन्मा, मानव हृदय में पला और आध्यात्मिक अनुभवों से विकसित हुआ।  वह पक्षियों के गीतों में था, माँ की लोरी में था, ऋषियों के ध्यान में था और आज भी हर धड़कते हुए हृदय में मौजूद है।  संगीत इसलिए नहीं बना कि म...

शोले: भारतीय सिनेमा का कभी न बुझने वाला अंगारा

चित्र
कुछ फिल्में हिट होती हैं, कुछ सुपरहिट होती हैं, और कुछ ऐसी होती हैं जो समय की सीमाओं को तोड़कर पीढ़ियों की स्मृति में स्थायी निवास बना लेती हैं। शोले ऐसी ही फिल्म है। इसे केवल एक फिल्म कहना वैसा ही है, जैसे गंगा को केवल एक नदी कहना। यह भारतीय सिनेमा का वह शिखर है, जहाँ पहुँचने का स्वप्न तो अनेक फिल्मों ने देखा, पर पहुँच बहुत कम सकीं। शोले की कहानी प्रतिशोध की है, लेकिन उसका हृदय मित्रता में धड़कता है। जय और वीरू केवल दो पात्र नहीं हैं; वे भारतीय मित्रता के सबसे जीवंत प्रतीक हैं। उनकी हँसी में जीवन का उल्लास है, तो उनके त्याग में मनुष्यता की सबसे ऊँची चमक। "ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे" केवल एक गीत नहीं, भारतीय जनमानस का भाव बन चुका है। फिल्म का सबसे विराट चरित्र गब्बर सिंह है। हिंदी सिनेमा में खलनायक पहले भी थे, लेकिन गब्बर जैसा तूफ़ान पहले कभी नहीं आया था। उसकी क्रूर हँसी, उसकी आँखों की आग और उसके संवाद आज भी दर्शकों के मन में भय और रोमांच की एक साथ अनुभूति पैदा करते हैं। गब्बर केवल एक डाकू नहीं, बुराई का वह चेहरा है जो हर युग में किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है। ठाकुर ...

‘जश्न’ : सबाल्टर्न अस्मिता, प्रतीकात्मक सत्ता और ग्रामीण सांस्कृतिक चेतना का समाजशास्त्रीय पाठ

‘जश्न’ कहानी पढ़ने के लिए नीचे दी गयी लिंक पर क्लिक करें - https://aakhyaan.blogspot.com/2010/05/blog-post_24.html "जश्न'' सबाल्टर्न  subaltern  अस्मिता का आख्यान है आदरणीय डॉ.   शिवशंकर मिश्र   की कहानी ‘जश्न’ भारतीय ग्रामीण समाज के वंचित वर्गों की अस्मिता, प्रतीकात्मक सत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा की आकांक्षा का एक महत्त्वपूर्ण आख्यान है।   'सबाल्टर्न' (Subaltern) शब्द मूल रूप से  अंतोनियो ग्राम्शी Antonio Gramsci  (1891–1937)  ने इस्तेमाल किया था। बाद में भारतीय इतिहासकारों के एक समूह  Subaltern Studies Group  ने इसे लोकप्रिय बनाया।  सबाल्टर्न (Subaltern) का अर्थ है — समाज के वे लोग या समूह जो सत्ता, संसाधनों, प्रतिष्ठा और निर्णय लेने की मुख्य धारा से बाहर रखे गए हों।  जब कोई कहानी, उपन्यास या कविता उन लोगों के जीवन-संघर्ष, पीड़ा, प्रतिरोध और अस्मिता को केंद्र में रखती है, जिन्हें समाज ने हाशिये पर धकेल दिया है, तो उसे सबाल्टर्न विमर्श से जुड़ा माना जाता है।  "जश्न" में सबाल्टर्न कौन है? इस कहानी में अनंतर...

रोटी से बड़ी भूख

चित्र
शा म ढल रही थी। सड़क के किनारे एक वृद्ध चुपचाप बैठा था।   उसके सामने कुछ सूखी रोटियाँ रखी   थीं,  जिन्हें किसी राहगीर ने दया से दे दिया था।  वह रोटियों को देख रहा था, पर खा नहीं रहा था। तभी एक युवक वहाँ रुका। उसने सोचा, शायद बाबा भूखे हैं।  उसने पास की दुकान से खाना खरीदकर वृद्ध के सामने रख दिया और बोला— "बाबा, अब तो पेट भर जाएगा।" वृद्ध ने उसकी ओर देखा। आँखों में एक अजीब-सी नमी थी।  धीरे से पूछा—   "बेटा, तुम्हारे पास दो मिनट हैं?"  युवक थोड़ा चौंका। फिर वहीं बैठ गया।  वृद्ध की आँखें कहीं दूर चली गईं।  "जानते हो, आज मेरा जन्मदिन है।" युवक मुस्कुरा दिया।  "अच्छा! फिर तो आपको खुश होना चाहिए।" वृद्ध के होंठ काँपे। "खुश...?" कुछ क्षण मौन रहा। फिर बोला— "पाँच साल पहले तक मेरा भी घर था। पत्नी थी। बच्चे थे।  जन्मदिन पर घर में चहल-पहल होती थी।  आज सुबह से मैं इसी उम्मीद में बैठा हूँ कि  शायद किसी बेटे का फोन आ जाए।" उसने जेब से एक पुराना मोबाइल निकाला। स्क्रीन बार-बार देखे जाने से घिस चुकी थी। "एक भी फोन नहीं आया।" अब उसकी ...

हिंदी साहित्य की दस महत्वपूर्ण कहानियाँ : समाज, मनुष्य और समय का जीवंत दस्तावेज

हिंदी साहित्य की कहानी-परंपरा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रही है, बल्कि उसने भारतीय समाज के बदलते स्वरूप, मनुष्य की संवेदनाओं, संघर्षों और सपनों को शब्दों में दर्ज किया है। हिंदी की महान कहानियाँ अपने समय की साक्षी होने के साथ-साथ समय से परे जाकर भी मनुष्य के जीवन को समझने की दृष्टि प्रदान करती हैं। यही कारण है कि कुछ कहानियाँ लिखे जाने के दशकों बाद भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं जितनी अपने रचनाकाल में थीं। हिंदी कहानी का वास्तविक विकास बीसवीं शताब्दी में हुआ। इस काल में कहानी ने लोककथाओं और आख्यानों की सीमाओं से बाहर निकलकर जीवन की वास्तविक समस्याओं को अपना विषय बनाया। किसान, मजदूर, स्त्री, मध्यवर्ग, प्रेम, गरीबी, अकेलापन, सामाजिक विषमता और मानवीय संबंधों की जटिलता कहानी के केंद्र में आई। इस परिवर्तन ने हिंदी कहानी को एक नई ऊँचाई प्रदान की। "कफ़न", "पूस की रात" और "ईदगाह" जैसी कहानियाँ भारतीय समाज के उस यथार्थ को सामने लाती हैं, जिसे अक्सर सभ्यता और विकास की चमक ढँक देती है। इन कहानियों में गरीबी केवल आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि एक ऐसी त्रासदी बनकर उभरती है...

बाबा की उघन्नी': एक ढहते सामंती ढांचे का विश्लेषण

यह कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक का प्रयोग करें - https://aakhyaan.blogspot.com/2010/06/blog-post.html आदरणीय डॉ० शिवशंकर मिश्र की कहानी 'बाबा की उघन्नी' ग्रामीण भारत की ढहती हुई सामंती सत्ता और संयुक्त परिवार की आंतरिक संवेदनहीनता का एक बेबाक दस्तावेज़ है। हुकूमत का भ्रम : उघन्नी और लाठी कहानी के केंद्र में बाबा की 'उघन्नी' (चाबियों का गुच्छा) है, जो महज़ लोहे का टुकड़ा नहीं. बल्कि उनकी महारत और हुकूमत का एक मुगालता है। विडंबना यह है कि ये चाबियाँ अब 'बेकार' और 'नकली' हो चुकी हैं, फिर भी 110 साल के बाबा इन्हें अपनी मुट्ठी में भींचे हुए हैं, ताकि परिवार पर उनकी संप्रभुता क़ायम रहे। यह गुच्छा उस मरणासन्न सामंती व्यवस्था का प्रतीक है. जो वक़्त के साथ अपनी रूह खो चुकी है। आर्थिक खोखलापन : फ़र्ज़ी हिसाब-किताब कहानी में अतीत और वर्तमान का एक अजीबोग़रीब टकराव है। बाबा आज भी तीस साल पुरानी क़ीमतों की कल्पना में जी रहे हैं, जहाँ ट्रैक्टर तीन हज़ार का है। दूसरी तरफ़, हक़ीक़त यह है कि परिवार क़र्ज़ के दलदल और किसान क्रेडिट कार्ड के बोझ तले दबा है। संतोख द्वारा बाबा को...

अभाव का मौन

अभाव जब अस्तित्व की नसों में धीरे-धीरे उतरता है, तब मनुष्य केवल जीवित नहीं रहता— वह संवेदनाओं का एक मौन ग्रंथ बन जाता है। रात्रि की निस्तब्ध देह पर भूख जब शोक लिखती है, तब किसी माँ की आँखों में करुणा का शाश्वत व्याकरण जन्म लेता है। वंचनाओं के धूसर प्रदेश में मनुष्य का अंतर्मन अपने ही टूटे हुए प्रतिबिंबों से संवाद करता रहता है। और उन्हीं संवादों की राख से भावनाओं की दिव्य अग्नि प्रकट होती है। जिस आत्मा ने तिरस्कार की हिमशीत लहरों को सहा हो, वही स्पर्श की ऊष्मा को धर्म की तरह ग्रहण करती है। अभाव केवल अनुपस्थिति नहीं— वह चेतना की वह गहन दरार है जहाँ से होकर मानवता का प्रथम प्रकाश भीतर उतरता है। पीड़ा जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचती है, तब वह विलाप नहीं रहती; वह करुणा की दार्शनिक चेतना बन जाती है। और शायद इसी कारण सभ्यता के सबसे कोमल श्लोक, सबसे गहरे दर्शन, और सबसे निर्मल प्रेम उन्हीं हृदयों से जन्म लेते हैं जिन्होंने जीवन को पूर्णता में नहीं, अभाव में जिया होता है। @गौरव मिश्र 

अपना–पराया

अपना कौन… पराया कौन… ये वक्त बताता है, जो दर्द में साथ निभाए, वही अपना कहलाता है। चेहरे तो सब हँसते मिलते, दिल कौन पढ़ पाता है, इस मतलब की दुनिया में हर रिश्ता आज़माया जाता है। कुछ लोग दुआओं जैसे थे, फिर क्यों सपनों से बिछड़ गए, जिन हाथों को थामा था हमने, वो हाथ ही आखिर छोड़ गए। दिल चुपके-चुपके रोता है, आँखों से कुछ ना कहता है, जो अपना लगता था कल तक, आज वही बेगाना है। अपना कौन… पराया कौन… ये दिल समझ ना पाया है, जिसे चाहा टूट के हमने, उसी ने दिल दुखाया है। माँ की ममता, पिता  का साया, रब की सबसे बड़ी दुआ, बाकी जग का सारा रिश्ता  वक्त के संग में बदला  हुआ। दौलत वाले यार बहुत थे, ग़म में कोई आया ना, तन्हा रातों ने ये सिखलाया, अपना कोई साया ना। फिर भी दिल उम्मीद लिए है, कोई तो सच्चा होगा, इस पत्थर जैसी दुनिया में कोई दिल से अपना होगा। @गौरव मिश्र 

भारतीय साहित्य में आज क्या चल रहा है?

भारतीय साहित्य आज एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। यह केवल किताबों, पुस्तकालयों और साहित्यिक गोष्ठियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, यूट्यूब, पॉडकास्ट, वेब सीरीज़ और बोलचाल की कविताओं तक फैल चुका है। आज का साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण, प्रतिरोध की आवाज़ और बदलते समय का दस्तावेज़ बन गया है। एक समय था जब भारतीय साहित्य मुख्यतः पौराणिक कथाओं, आध्यात्मिकता, राष्ट्रवाद और सामाजिक आदर्शों के इर्द-गिर्द घूमता था। मुंशी प्रेमचंद, रवीन्द्रनाथ टैगोर और महादेवी वर्मा जैसे साहित्यकारों ने समाज की संवेदनाओं को शब्द दिए। लेकिन आज का साहित्य बदलते भारत की बेचैनी, संघर्ष और टूटन को नए ढंग से प्रस्तुत कर रहा है। आज के भारतीय साहित्य में बेरोज़गारी, ऑनलाइन ठगी, मानसिक तनाव, जातिगत भेदभाव, स्त्री-असमानता, धार्मिक ध्रुवीकरण, अकेलापन और डिजिटल जीवन की कृत्रिमता जैसे विषय प्रमुख हो चुके हैं। अब साहित्य आदर्श नायकों की कहानियाँ नहीं, बल्कि आम इंसान के संघर्ष की सच्चाई लिख रहा है। क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य भी तेजी से उभर रहा है। हिंदी, उर्दू, तमिल...

'अंतिम उच्चारण' : संवेदना, प्रतीक और मनोवैज्ञानिक विस्थापन का आलोचनात्मक विश्लेषण -

चित्र
कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - https://aakhyaan.blogspot.com/2010/05/blog-post_24.html कथा का वैचारिक धरातल और सामरिक महत्व- आदरणीय डॉ० शिवशंकर मिश्र की कहानी 'अंतिम उच्चारण' हिंदी कथा-साहित्य के यथार्थवादी परिप्रेक्ष्य में एक अत्यंत गंभीर और रणनीतिक हस्तक्षेप है। इसे केवल एक मूक बालक की त्रासदी नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना की उस सूक्ष्म क्रूरता का अनावरण है, जहाँ 'वाणी' पर वर्चस्व रखने वाला वर्ग मूक संवेदनाओं का व्यवस्थित विस्थापन करता है। कहानी का केंद्रबिंदु (बई) है, जिसके माध्यम से लेखक ने यह सिद्ध किया है कि कैसे एक व्यक्ति की विशिष्टता को सामाजिक साँचों में ढालने की प्रक्रिया वास्तव में उसकी 'मनोवैज्ञानिक हत्या' है। कहानी के शीर्षक 'अंतिम उच्चारण' की सार्थकता इसके द्वंद्वात्मक विकास में निहित है। बालक द्वारा पहली बार 'बेर' कहने की विफल चेष्टा से उपजा शब्द 'बईऽऽ' उल्लास और सामाजिक जुड़ाव का प्रतीक था, जिसने उसे एक नाम और पहचान दी। परंतु, कहानी के अंत में अपनी माँ के लिए निकला आर्त्तनाद 'बाँईऽऽ' उसकी स्वतंत्र चेतना का ...

‘पखावज वृत्तान्त’ : श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान

कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - https://aakhyaan.blogspot.com/2019/10/blog-post.html ‘पखावज वृत्तान्त’ : श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान - आदरणीय डॉ0 शिवशंकर मिश्र जी  की कहानी ‘पखावज वृत्तान्त’ भारतीय समाज की जातिगत विडम्बनाओं, श्रम की उपेक्षा और सांस्कृतिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य करती है। आकार में छोटी होने के बावजूद यह कहानी अपने भीतर अत्यन्त व्यापक सामाजिक अर्थ समेटे हुए है। लेखक ने प्रतीकात्मक शैली के माध्यम से यह दिखाया है कि समाज जिन वस्तुओं, व्यक्तियों अथवा श्रम को ‘जूठा’ कहकर तिरस्कृत करता है, वही वास्तव में जीवन और सृजन के सबसे आवश्यक तत्व होते हैं। कथ्य कहानी का मूल कथ्य भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत ऊँच-नीच, श्रम की उपेक्षा और सामाजिक पाखंड को उजागर करना है। लेखक यह स्थापित करना चाहता है कि जिन श्रमिकों और निम्नवर्गीय लोगों के श्रम से समाज और संस्कृति जीवित रहती है, उसी समाज में उन्हें तिरस्कार और अपमान का सामना करना पड़ता है। ‘भात’ और ‘पखावज’ के माध्यम से कहानी यह बताती है कि जीवन, कला और सृजन का वास्तविक आधार श्रम है, किन्तु सामंती मानसिकता उ...

दो दुनियाओं की कहानी

click the link for story  https://aakhyaan.blogspot.com/ यह वीडियो केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की उन सच्चाइयों का आईना है, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। वीडियो का हर दृश्य और हर बात भीतर तक असर छोड़ती है। इस वीडियो को ज़रूर देखिए — संभव है, अंत तक पहुँचते-पहुँचते आपकी सोच पहले जैसी न रहे। यहाँ आपको संघर्ष भी मिलेगा, संवेदना भी, और वह कड़वा सच भी जो दो अलग-अलग दुनियाओं के बीच की दूरी को उजागर करता है। जो लोग मेहनत करते हैं, वही सबसे अधिक उपेक्षित क्यों रहते हैं? सम्मान का असली हकदार कौन है? और आखिर क्यों समाज चमक-दमक के पीछे इंसानियत को भूल जाता है? इन सभी सवालों को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

निराला और महादेवी

चित्र
  12 सितंबर 2024       Shivshankar Mishra हम लोग तब बी.ए.के छात्र थे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में, जब पता चला कि निराला पर बोलने महादेवी आयेंगी और मेरी पूरी मित्र मंडली ने नाक भौं सिकोड़ी। 'ये क्या बोलेंगी? समीक्षक हैं क्या?' आदि आदि। सीनेट हाल के एक हिस्से में कार्यक्रम शुरू होने से थोड़ा पहले ही हम लोग पहुँच गये इस लोभ के साथ कि कुछ न कुछ चाय बिस्किट तो मिलेगा ही। चाय तो नहीं मिली। काफी आयी। पहला घूँट लेते ही मुझे लगा कि चाय तो बहुत जल गयी, लेकिन दिमाग की तनी हुई नसों को अपूर्व आराम मिला। महादेवी जी ने बोलना शुरू किया। पहले ही उन्होंने निवेदन कर दिया कि वे न तो समीक्षक हैं और न ही समीक्षा करने आयी हैं। 'कुछ सुधियां हैं, जिन्हें मैं साझा करने आयी हूं।' फिर तो अपनी खरखराती आवाज में उन्होंने निराला से अपने संबंध के एक से एक दिलचस्प और विलक्षण प्रसंगों की विस्तार से चर्चा की। अब हम लोग मंत्रमुग्ध। 'ये क्या बोलेंगी निराला पर'? यह प्रश्न हम लोगों के मस्तिष्क में कहीं दफ्न हो गया। कैसे निराला उन्हें बहन मानते थे, कैसे राखी के दिन पंत जी निर्धारित समय पर और निराला किसी ...

मुंशी सतई सिंह

Shivshankar Mishra 6 सितंबर 2024 · अक्षर और अंक बोध तो माँ ने कराया और बड़े बाबा ने। कक्षा तीन से प्राथमिक विद्यालय में जाना हुआ। वहाँ मुंशी सतई सिंह थे, जिनका दृढ़ विश्वास था कि जो पहाड़ा नहीं याद कर सकता, वह पढ़ाई नहीं कर सकता। पहाड़ा कभी याद न हुआ, नतीजतन रोज़ दोनों हथेलियों के गुरु पर्वत मुंशी जी के डंडे की चोट से घायल रहते। जिस दिन मुंशी जी छुट्टी पर रहते हम लोग बेहद खुश होते। सहायक अध्यापक पिटाई नहीं करते थे।कभी कर भी देते,तो प्रतीकात्मक। विद्यालय पहुँच कर हम लोग दूर महुए के पेड़ों तले तक उनकी साइकिल की आतंक पैदा करने वाली चमक देखते।..आ तो नहीं रहे हैं मुंशी जी! हाँ, एक बात और। जब वे पिटाई करते,तो एक गाली ज़रूर देते,'चमार'। चूँकि मुंशी जी खुद उसी जाति के थे, इस लिए इसे निरामिष ही समझा जाता। होता भी था। कक्षा पाँच की परीक्षा में 'सेंटर' शब्द से परिचय हुआ। मुंशी जी कभी कहते 'सेंटर अमुक जगह जायेगा', कभी कहते- 'नहीं दूसरी जगह जायेगा। हम लोगों में कौतूहल था और भय भी। ..कितना बड़ा होगा सेंटर! ..कहाँ से आयेगा !..पहिये तो बड़े बड़े होंगे! आदि आदि। सेंटर तो आय...

लेखपाल नुमा बुजुर्ग

  Shivshankar Mishra 20 अगस्त 2024   · वह कौन सा वर्ष था, याद नहीं, जब देवेन्द्र जी एक लेखपाल नुमा बुजुर्ग के साथ बिरला छात्रावास (बी.एच.यू.) के मेरे कमरे में आये और बोले- 'ये त्रिलोचन जी हैं और आज ही इन्हें दिल्ली जाना है।' उस दिन शहर में कर्फ़्यू था। रिक्शे बंद थे। आखिरकार एक साइकिल का इंतजाम किया गया। त्रिलोचन जी ख़ुशी से आगे बैठ गये। मैं ने महसूस किया कि भारी वजन है इस ठोस काया का। देवेन्द्र जी तो मुक्त हो गये थे। अब मैं और त्रिलोचन और साइकिल। हाँ, शहर के बाहर का रास्ता मुझे मालूम नहीं था, मगर शहर से बाहर आकर त्रिलोचन जी मुखर हो गये- 'मुझे सब पता है। चलिए। हाँ आप को परेशानी हो रही हो, तो साइकिल मैं चलाऊँ।' मैं चौंक गया। यह उम्र और यह कद काठी, ये साइकिल चलायेंगे, वह भी मुझे बैठा कर?' 'नहीं नहीं। आप बैठे रहें। बस मुझे रास्ता बताते रहें।' फिर तो वे रास्ता ही नहीं, रास्ते में मिलने वाली एक एक घास का सविस्तार परिचय देने लगे।कभी कभी तो साइकिल से उतर कर भी। जंक्शन से पहले तक वे चुप नहीं हुए। कैसे उन्होंने लाहौर में रिक्शा चलाया और और भी बहुत कुछ। अब मैं अभिभूत ...