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'अंतिम उच्चारण' : संवेदना, प्रतीक और मनोवैज्ञानिक विस्थापन का आलोचनात्मक विश्लेषण -

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"यह लेख डॉ. शिवशंकर मिश्र की कहानी 'अंतिम उच्चारण' के साहित्यिक अध्ययन और आलोचनात्मक विवेचन पर आधारित है। प्रस्तुत विचार मेरे निजी अध्ययन और विश्लेषण का परिणाम हैं।" कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें -  https://aakhyaan.blogspot.com/2010/05/blog-post_24.html अंतिम उच्चारण : संक्षिप्त कथा-सार गाँव का एक मूक बालक, जिसे लोग "बई" कहकर पुकारते हैं, अपनी सरलता, निष्कपटता और प्रेमपूर्ण स्वभाव के कारण पाठकों के मन को छू लेता है। वह समाज की जटिल जातिगत और सामाजिक संरचनाओं को नहीं समझता। उसकी दुनिया बच्चों की मित्रता, माँ के स्नेह और प्रकृति के सौंदर्य तक सीमित है।  एक छोटी-सी घटना के कारण वह सामाजिक बहिष्कार का शिकार बन जाता है। धीरे-धीरे उसके जीवन में अकेलापन, अपमान और मानसिक आघात बढ़ते जाते हैं। पिता की मृत्यु और समाज की कठोर मान्यताएँ उसकी संवेदनशील चेतना को गहराई से प्रभावित करती हैं।  कहानी अंततः यह प्रश्न उठाती है कि क्या समाज की तथाकथित "शुद्धता" और "सुधार" की अवधारणाएँ किसी व्यक्ति की मानवीय गरिमा और स्वतंत्र अस्तित्व से अधिक महत्वपू...

श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान : ‘पखावज वृत्तान्त’

कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - https://aakhyaan.blogspot.com/2019/10/blog-post.html ‘पखावज वृत्तान्त’ : श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान - आदरणीय डॉ0 शिवशंकर मिश्र जी  की कहानी ‘पखावज वृत्तान्त’ भारतीय समाज की जातिगत विडम्बनाओं, श्रम की उपेक्षा और सांस्कृतिक पाखंड पर तीखा व्यंग्य करती है। आकार में छोटी होने के बावजूद यह कहानी अपने भीतर अत्यन्त व्यापक सामाजिक अर्थ समेटे हुए है। लेखक ने प्रतीकात्मक शैली के माध्यम से यह दिखाया है कि समाज जिन वस्तुओं, व्यक्तियों अथवा श्रम को ‘जूठा’ कहकर तिरस्कृत करता है, वही वास्तव में जीवन और सृजन के सबसे आवश्यक तत्व होते हैं। कथ्य कहानी का मूल कथ्य भारतीय समाज में व्याप्त जातिगत ऊँच-नीच, श्रम की उपेक्षा और सामाजिक पाखंड को उजागर करना है। लेखक यह स्थापित करना चाहता है कि जिन श्रमिकों और निम्नवर्गीय लोगों के श्रम से समाज और संस्कृति जीवित रहती है, उसी समाज में उन्हें तिरस्कार और अपमान का सामना करना पड़ता है। ‘भात’ और ‘पखावज’ के माध्यम से कहानी यह बताती है कि जीवन, कला और सृजन का वास्तविक आधार श्रम है, किन्तु सामंती मानसिकता उ...