हाइकू
सुमन पांखुरी काँटे ही काँटे उगे हैं जमी पर सम्हल कर ही चलना चुभें ना कहीं पर। अजब लीला तेरी ऐ दुनिया के मालिक कि काँटे चुभे हैं सुमन-पाँखुरी पर। साँसों का कोई ठिकाना नही है, बातों के चर्चे चले हैं सदी भर। जिधर देखिये बस तुमुल ही तुमुल है कि बजती नहीं रागिनी बाँसुरी पर। काँटे ही काँटे उगे हैं जमी पर, सम्हल कर ही चलना चुभें ना कहीं पर। दंड-ए-ठंड भीगी छत पर ओस नहीं, रात का टूटा हुआ स्वप्न बिखरा है। कबूतर नहीं कुछ भूखी परछाइयाँ हैं, जो नमी को जीवन समझकर चुग रही हैं। थोड़ी देर पहले जो धूप कोहरे में धीरे-धीरे घुल रही थी, अब भी मौन में है। ओसकण नहीं गिरते, वे समय की टूटी हुई साँसें हैं। नीला आकाश भी धुंध के कंधों पर ढहता जा रहा है। वनस्पतियाँ नहीं, ये धरती की ठंडी उँगलियाँ हैं। और खबरें… वे तभी जन्म लेती हैं, जब कोई शरीर ठंड की चुप्पी में खो जाता है। — मुक्ताभ