अभी कुछ घंटे पहले Shiv Murti जी का फोन आया। मुझे लगा कि मामला कुछ कुशल क्षेम जैसा होगा। हुआ भी; पर असल मामला कुछ यूँ था कि वे मेरी पत्नी से और मुझसे तकरीबन तीस साल पहले (या शायद उससे भी ज्यादा) सुने गये लोकगीतों में से एक 'डोरी डाल दे' का अपनी एक कथाकृति में उपयोग करने हेतु अनुमति माँग रहे थे। यह उनकी विनम्रता भी है और साहित्यिक तरीका भी। इससे पहले 'तर्पण' की रचना प्रक्रिया के दौरान उन्होंने बड़ी साफगोई से मुझसे सुने गये किसी कथा प्रसंग को कथा विषय बनाया था, ऐसी सूचना भी दी थी। पर मेरी किसी रचना का निषेध उनकी कोई भी रचना नहीं करती। एक ही घटना या परिवेश अलग अलग रचनात्मक मानस को अलग अलग प्रतीतियाँ देता है।इसी क्रम में राजेश जोशी याद आते हैं। फोन उन्होंने भी किया था, पर अनुमति के लिए नहीं, माफी माँगने के लिए। वह भी तब, जब उनकी तथाकथित कविता 'पखावज वृत्तांत' आलोचना में प्रकाशित करवा ली और मेरा लीगल नोटिस उन्हें प्राप्त हुआ। माफी का औचित्य आज तक मेरी समझ में नहीं आया। यदि उन्होंने मेरी रचना का अर्थोपकर्ष किया होता, तो मैं उनका अभिनंदन करता, पर उन्होंने तो अर्थापकर्ष किया है।
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