·वह कौन सा वर्ष था, याद नहीं, जब देवेन्द्र जी एक लेखपाल नुमा बुजुर्ग के साथ बिरला छात्रावास (बी.एच.यू.) के मेरे कमरे में आये और बोले- 'ये त्रिलोचन जी हैं और आज ही इन्हें दिल्ली जाना है।' उस दिन शहर में कर्फ़्यू था। रिक्शे बंद थे। आखिरकार एक साइकिल का इंतजाम किया गया। त्रिलोचन जी ख़ुशी से आगे बैठ गये। मैं ने महसूस किया कि भारी वजन है इस ठोस काया का। देवेन्द्र जी तो मुक्त हो गये थे। अब मैं और त्रिलोचन और साइकिल। हाँ, शहर के बाहर का रास्ता मुझे मालूम नहीं था, मगर शहर से बाहर आकर त्रिलोचन जी मुखर हो गये- 'मुझे सब पता है। चलिए। हाँ आप को परेशानी हो रही हो, तो साइकिल मैं चलाऊँ।' मैं चौंक गया। यह उम्र और यह कद काठी, ये साइकिल चलायेंगे, वह भी मुझे बैठा कर?''नहीं नहीं। आप बैठे रहें। बस मुझे रास्ता बताते रहें।'फिर तो वे रास्ता ही नहीं, रास्ते में मिलने वाली एक एक घास का सविस्तार परिचय देने लगे।कभी कभी तो साइकिल से उतर कर भी। जंक्शन से पहले तक वे चुप नहीं हुए। कैसे उन्होंने लाहौर में रिक्शा चलाया और और भी बहुत कुछ। अब मैं अभिभूत हो रहा था। संस्कृत की उनकी बहुज्ञता से लाहौर वाले प्रसंग में ही परिचित हुआ। बकौल त्रिलोचन, उनके रिक्शे पर संस्कृत के दो विद्वान बैठे थे और एक शब्द की व्युत्पत्ति पर जिरह कर रहे थे। जिरह खत्म नहीं हुई। मंजिल तक पहुँचाकर त्रिलोचन जी ने रिक्शा रोका और उनकी जिरह सही उत्तर देकर खत्म करवायी। ट्रेन आ गयी। त्रिलोचन चले गये और अपनी सहजता और सरलता के साथ मेरे भीतर उतर गये..!
मनुष्य सदा अपने भाव-संवेगों की अभिव्यक्ति के लिए बेचैन रहा है, ऐसा इतिहास से विदित होता है। इसी अभिव्यक्ति की बेचैनी के क्रम में कभी ध्वनियाँ सार्थक हो गयी होंगी। कभी हर्ष के अतिरेक ने, तो कभी शोक के अतिरेक ने ध्वनियों को सार्थक बना दिया होगा। इस तरह भाषा बनी होगी और संगीत भी। मनुष्य की भाव-संकुलता की अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य को एक मनुष्य की जरूरत है और यह जरूरत कभी समाप्त नहीं होगी।
Thursday, 19 March 2026
लेखपाल नुमा बुजुर्ग
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