शकुंतला के आँसू से वैशम्पायन की आवाज़ तक


जिस सत्य को दो मनुष्यों ने अकेले में जिया था,
क्या वह राजसभा में असत्य हो जाता है? 
जिस प्रेम को मनुष्य ने स्वयं अनुभव किया था, उसके सत्यापन के लिए अंततः एक निर्जीव वस्तु की आवश्यकता पड़ती है।


प्रेम और स्वतंत्रता जब अपनी चरम परिपक्वता को प्राप्त करते हैं, तो वे किसी युग की सीमाओं में नहीं बंधते; वे कालजयी हो जाते हैं। महाकवि कालिदास का नाटक 'अभिज्ञानशाकुंतलम' और महाकवि बाणभट्ट की गद्य-शिरोमणि कृति 'कादंबरी' (कथामुखम्) केवल कुछ पौराणिक चरित्रों की गुज़री हुई गाथाएँ नहीं हैं। यदि हम इनका एक उच्च-स्तरीय और दार्शनिक विश्लेषण करें, तो ये दोनों अमर कृतियाँ असल में इंसानी जज्बातों की पवित्रता, पुरुष-मन की सुविधाजनक भूलने की बीमारी और आधुनिक समाज के अदृश्य बंधनों का वह शाश्वत दस्तावेज़ हैं, जिसकी गूँज आज के इस तथाकथित आधुनिक और यांत्रिक युग में और भी तीव्र हो उठी है। जिसे आज की युवा पीढ़ी इंटरनेट के 'आभासी-भ्रम' (छलावे) में अपनी प्रगतिशीलता समझकर खुश हो रही है, इन दो मनीषियों ने सदियों पहले उसके खोखलेपन को शब्द दे दिए थे। आइए, इन दोनों महाकाव्यों के अंतःकरण में उतरकर हम अपनी ही चेतना से एक गंभीर और संवेदनशील अन्वेषण करते हैं-

 क्या मनुष्य ने पिंजरा बदला है, स्वतंत्रता नहीं?

साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति यह नहीं कि वह अतीत को सुरक्षित रखता है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह अतीत के पात्रों को अचानक हमारे सामने खड़ा कर देता है और फिर हमें पहचानने के लिए विवश करता है कि उनमें से कौन हम हैं।

कालिदास की 'शकुंतला' और बाणभट्ट का 'वैशम्पायन' इसी अर्थ में केवल पात्र नहीं हैं। वे भारतीय साहित्य की दो दूरस्थ दिशाओं से उठती हुई दो चेतनाएँ हैं—

एक स्मृति के खो जाने पर प्रश्न करती है, दूसरी अपनी चेतना के बंध जाने पर। एक के सामने प्रेम का प्रमाण माँगा जाता है। दूसरा ज्ञानवान होकर भी अपनी देह की सीमाओं में कैद है और इन दोनों के बीच खड़ा है— आधुनिक मनुष्य।

वह मनुष्य, जिसने आकाश को माप लिया, समुद्र की गहराई नाप ली, चंद्रमा तक पहुँच गया; मगर आज भी अपने भीतर उठे एक छोटे-से प्रश्न से भयभीत है—

“यदि संसार मुझे स्वीकार न करे, तो क्या मैं फिर भी स्वयं को स्वीकार कर पाऊँगा?”

यहीं से कालिदास और बाणभट्ट हमारे समकालीन हो जाते हैं।


दुष्यंत की विस्मृति : क्या यह केवल शाप था?

परंपरागत पाठ में दुर्वासा का शाप दुष्यंत की विस्मृति का कारण बनता है, लेकिन साहित्य का गंभीर पाठ वहीं समाप्त नहीं होता जहाँ कथा समाप्त होती है। वह वहीं से आरम्भ होता है। शाप को यदि हम केवल अलौकिक घटना मानकर आगे बढ़ जाएँ, तो कथा का आधा अर्थ हमारे हाथ से निकल जाता है।

प्रश्न यह भी है— मनुष्य को किसी सत्य को भूलने के लिए हमेशा किसी शाप की आवश्यकता क्यों पड़ती है? क्या सत्ता स्वयं एक प्रकार की विस्मृति उत्पन्न नहीं करती? क्या सुविधा मनुष्य की स्मृति को चयनात्मक नहीं बना देती? क्या सामाजिक प्रतिष्ठा कभी-कभी मनुष्य को उस सत्य से दूर नहीं कर देती जिसे उसने एकांत में पूरे मन से स्वीकार किया था?

यहीं शकुंतला का दुःख व्यक्तिगत प्रेम-विरह से उठकर एक सभ्यतागत प्रश्न बन जाता है। वह पूछती है—

जिस सत्य को दो मनुष्यों ने अकेले में जिया था, क्या वह राजसभा में असत्य हो जाता है?

और यह प्रश्न केवल शकुंतला का नहीं। यह हर उस मनुष्य का प्रश्न है, जिसका निजी सत्य सार्वजनिक व्यवस्था के सामने प्रमाण माँगता है।


अंगूठी : प्रेम का प्रमाण या स्मृति की बैसाखी

अभिज्ञान की अंगूठी केवल कथा की वस्तु नहीं। वह स्मृति का प्रतीक है, लेकिन यहाँ एक विचित्र विडंबना जन्म लेती है—

जिस प्रेम को मनुष्य ने स्वयं अनुभव किया था, उसके सत्यापन के लिए अंततः एक निर्जीव वस्तु की आवश्यकता पड़ती है।

आज अंगूठी बदल गई है। अब उसके स्थान पर चैट है। फोटो है। वीडियो है। स्क्रीनशॉट है। कॉल रिकॉर्ड है। और कभी-कभी पूरा डिजिटल इतिहास है।

फिर भी प्रश्न वही है—

क्या प्रमाण बढ़ जाने से संबंधों का सत्य भी बढ़ गया? 

या

हमने केवल अपने अविश्वास को तकनीकी रूप दे दिया?


और तब वैशम्पायन प्रवेश करता है...

यहीं बाणभट्ट का वैशम्पायन हमारे सामने एक अप्रत्याशित दर्पण रख देता है। एक पक्षी बोलता है। लेकिन इस दृश्य की वास्तविक विस्मयकारी बात यह नहीं कि पक्षी मनुष्य की भाषा बोलता है। विस्मयकारी बात यह है कि—

कहीं-कहीं मनुष्य अपनी भाषा खो देता है और तब पक्षी को बोलना पड़ता है।

यहाँ वैशम्पायन केवल कथा का पात्र नहीं रह जाता। वह वाणी की स्वतंत्रता का रूपक बन जाता है। वह बोल सकता है, पर स्वतंत्र है या नहीं?

यही प्रश्न आधुनिक मनुष्य पर भी लागू होता है। हम बोल सकते हैं। हम लिख सकते हैं। हम पोस्ट कर सकते हैं। हम प्रसारित कर सकते हैं। हमारे हाथ में संचार की अभूतपूर्व शक्ति है। फिर भी क्या हम वही बोलते हैं जो वास्तव में सोचते हैं?

या वही, जिसे बोलने की सामाजिक अनुमति मिली हुई है? यहीं वैशम्पायन अचानक हमारे सामने खड़ा होकर पूछता है—

“तुम मुझे पिंजरे में देखकर दया क्यों करते हो, जब तुम्हारी अपनी सलाखें तुम्हें दिखाई ही नहीं देतीं?”


पिंजरा बदल गया है

प्राचीन पिंजरा लोहे का था। आधुनिक पिंजरा अवसर का है। कभी मनुष्य को सत्ता बाँधती थी। आज कभी-कभी वेतन बाँधता है। कभी समाज की मर्यादा बाँधती थी। आज सामाजिक प्रतिष्ठा। कभी राजदंड का भय था। आज ‘लोग क्या कहेंगे’ का।

कभी कैदी सलाखें गिनता था। आज हम नोटिफिकेशन गिनते हैं और सबसे भयानक बात? हमें अपनी कैद पर गर्व है। हम उसे “सफलता” कहते हैं।


यहीं कालिदास और बाणभट्ट एक-दूसरे से मिलते हैं

शकुंतला का संकट है—

“मेरे सत्य को कौन मानेगा?”

वैशम्पायन का संकट है—

“मेरी चेतना कितनी स्वतंत्र है?”

आधुनिक मनुष्य का संकट इन दोनों का संयोग है—

“मैं जो हूँ, उसे जी भी सकता हूँ या नहीं?”

यही वह बिंदु है, जहाँ ये दोनों महान कृतियाँ केवल साहित्य नहीं रह जातीं। वे मनुष्य के अस्तित्व का प्रश्न बन जाती हैं और शायद यही कालजयी साहित्य की अंतिम पहचान है—

वह अपने समय का वर्णन करते-करते भविष्य के मनुष्य की आत्मकथा लिख देता है।


अंतिम चुनौती

अब एक क्षण के लिए कालिदास और बाणभट्ट को छोड़ दीजिए। न शकुंतला को देखिए। न वैशम्पायन को। केवल स्वयं को देखिए। 

आपके जीवन में वह कौन-सी चीज़ है जिसे आप प्रेम कहते हैं, लेकिन खोने के भय से पकड़कर बैठे हैं? आपकी वह कौन-सी उपलब्धि है जिसे संसार सफलता कहता है, लेकिन आपका अंतःकरण उसे बंधन समझता है? आपकी वह कौन-सी आवाज़ है जिसे आपने इसलिए दबा दिया क्योंकि आपको डर था कि—

“लोग क्या कहेंगे?”

यदि उसका उत्तर मिल जाए, तो शायद अगला प्रश्न और कठिन होगा, क्योंकि स्वतंत्रता की सबसे बड़ी विडंबना यही है—

मनुष्य अक्सर स्वतंत्र होना चाहता है, पर स्वतंत्रता की कीमत अपनी सुविधाजनक पहचान छोड़कर चुकानी पड़ती है।

शकुंतला को अपना सत्य सिद्ध करना पड़ा। वैशम्पायन को अपनी वाणी में अपना अस्तित्व ढोना पड़ा।

और हम? हमारे पास कोई दुर्वासा नहीं, कोई राजसभा नहीं, कोई सोने का पिंजरा भी नहीं। फिर भी हम बँधे हुए हैं। किससे? परिवार से। प्रतिष्ठा से। धन से। प्रेम से। भय सेऔर सबसे अधिक अपने ही बनाए हुए उस व्यक्ति से, जिसे संसार के सामने हम “मैं” कहते हैं।

शायद मनुष्य की सबसे बड़ी दासता यह नहीं कि कोई दूसरा उसे बाँध दे। सबसे बड़ी दासता तब जन्म लेती है, जब मनुष्य स्वयं अपनी बेड़ियों को अपना व्यक्तित्व समझने लगे और शायद स्वतंत्रता का प्रथम क्षण भी वहीं जन्म लेता है—

जब वह पहली बार अपने भीतर से पूछता है—

“जो मैं संसार को दिखाई देता हूँ—क्या मैं वास्तव में वही हूँ?”

यदि उत्तर “नहीं” है, तो समझिए पिंजरे का द्वार खुल चुका है। अब केवल बाहर निकलने का साहस शेष है।

टिप्पणियाँ