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कफ़न के पैसों की नई गाड़ी और विदेश यात्रा! सोचिए, आज के दृश्य-मंच के ज़माने में प्रेमचंद के 'घीसू-माधव' क्या गदर मचाते?

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मुंशी प्रेमचंद ने जब वर्ष 1936 में अपनी कालजयी कहानी 'कफ़न' लिखी थी, तब उन्होंने घीसू और माधव के रूप में संवेदनहीनता की उस इंतहा   को छुआ था, जो रूह कँपा देती है। वह एक ऐसा दौर था, जहाँ सामंती व्यवस्था के अंतहीन शोषण और पेट की भयानक भूख ने इंसान को भीतर से इस कदर खोखला कर दिया था कि एक पति अपनी पत्नी के कफ़न के पैसों से मदिरालय में बैठकर पूड़ियाँ, कलेजी और ताड़ी उड़ा लेता है। लेकिन आज का दौर तकनीक का है। देश पूरी तरह डिजिटल हो चुका है, हर हाथ में तीव्र इंटरनेट की ताकत है और संवेदनाएं अब दिल से फिसलकर स्मार्टफोन की स्क्रीन पर आ चुकी हैं। ऐसे में एक बड़ा, तीखा और बेहद दिलचस्प सवाल मन में कौंधता है— अगर प्रेमचंद के 'घीसू और माधव' आज के इस आभासी दुनिया और सामाजिक पटल के ज़माने में होते, तो क्या करते? यकीन मानिए, आज वे दोनों किसी के खेत में आलू चुराकर नहीं भून रहे होते, बल्कि वे इंटरनेट की दुनिया के "प्रमाणित जन-प्रभावक" (वेरिफाइड इन्फ्लुएंसर्स) होते। आइए देखते हैं उनकी इस अजीबो-गरीब और डरावनी यात्रा को : 1. 'ग्रामीण बालकों' का सामाजिक पटल पर भौकाल आज के ...