भय : कल्पना की कैद, साहस की मुक्ति

भय : कल्पना की कैद, साहस की मुक्ति

मनुष्य के हृदय में जितने भाव निवास करते हैं, उनमें भय का स्थान अत्यंत प्राचीन है। संभवतः जीवन के साथ ही उसका जन्म हुआ होगा। जहाँ जीवन है, वहाँ उसके नष्ट होने की आशंका है; जहाँ सुख है, वहाँ उसके छिन जाने की चिंता है; और जहाँ प्रेम है, वहाँ वियोग की संभावना है। भय इसी संभावना की संतान है।
अरस्तू ने भय को भविष्य में आने वाली किसी पीड़ादायक अथवा विनाशकारी घटना की मानसिक आशंका से उत्पन्न व्याकुलता माना था। आधुनिक विज्ञान ने भी, अपनी भिन्न भाषा में, इसी सत्य की पुष्टि की है। भय मनुष्य के भीतर निर्मित वह प्राचीन सुरक्षा-तंत्र है जो उसे संकट के प्रति सावधान करता है। मस्तिष्क का एक भाग—अमिग्डाला—संभावित खतरों की पहचान और उनसे संबंधित भावनात्मक प्रतिक्रियाओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस दृष्टि से भय केवल मन की दुर्बलता नहीं, जीवन की रक्षा के लिए प्रकृति द्वारा निर्मित एक अदृश्य प्रहरी है।
किंतु मनुष्य और अन्य प्राणियों के भय में एक महत्त्वपूर्ण अंतर है। पशु प्रायः सामने उपस्थित संकट से डरता है; मनुष्य उस संकट से भी भयभीत हो सकता है जो अभी अस्तित्व में ही नहीं आया। उसकी कल्पना भविष्य में प्रवेश करती है और वहाँ संभावित दुखों की असंख्य छवियाँ बना लेती है। मृत्यु आने से पहले ही मनुष्य मृत्यु से अनेक बार मरता है। दरिद्रता आने से पहले वह निर्धनता की आशंका में अपनी शांति खो देता है। अपमानित होने से पहले ही वह अपमान के भय से अपना आचरण बदल लेता है।
मनुष्य की बुद्धि ने उसे भविष्य को देखने की शक्ति दी है; किंतु इसी शक्ति ने उसे भविष्य से डरना भी सिखाया है। वह केवल वर्तमान में नहीं जीता—वह स्मृतियों और आशंकाओं के बीच जीता है। अतीत की चोटें उसके भय को जन्म देती हैं और भविष्य की कल्पनाएँ उसे विस्तृत करती हैं। इसी कारण भय कभी वास्तविक संकट से उत्पन्न होता है और कभी केवल उस संकट की संभावना से।
मनुष्य के भय अनेक हैं, परंतु उनके मूल में जीवन की सुरक्षा और अस्तित्व की रक्षा की आकांक्षा ही दिखाई देती है। वह शरीर के लिए रोग, पीड़ा, दुर्घटना और मृत्यु से डरता है। वह मन के लिए असफलता, अकेलेपन और हीनता से भयभीत रहता है। समाज में रहने के कारण उपहास, अपमान, बदनामी और बहिष्कार उसे विचलित करते हैं। वह प्रेम करता है, इसलिए प्रियजनों को खोने से डरता है। वह धन और आजीविका पर आश्रित है, इसलिए भूख, निर्धनता और बेरोजगारी की आशंका उसे घेरे रहती है।
वस्तुतः मनुष्य जितना अधिक किसी वस्तु से जुड़ता है, उसे खोने का भय उतना ही प्रबल होता जाता है। संपत्ति का सुख उसके नष्ट होने की चिंता को जन्म देता है; प्रतिष्ठा की ऊँचाई उसके पतन की आशंका साथ लाती है; प्रेम जितना गहरा होता है, वियोग की संभावना उतनी ही अधिक पीड़ादायक हो उठती है। इस अर्थ में भय केवल संकट से नहीं, हमारे संबंधों से भी जन्म लेता है।
परंतु भय केवल व्यक्ति के भीतर निवास नहीं करता। समाज भी डरता है। समुदाय अपनी पहचान खोने से भयभीत होते हैं, राष्ट्र अपनी सीमाओं और सुरक्षा के लिए चिंतित रहते हैं और सभ्यताएँ अपने विनाश की आशंका से व्याकुल होती हैं। युद्ध, महामारी, अकाल और प्राकृतिक आपदाएँ केवल व्यक्तियों को ही नहीं, संपूर्ण समाज को भयग्रस्त कर सकती हैं।
सामूहिक भय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अनेक व्यक्तियों के मनों को एक साथ संचालित करने लगता है। जब समाज भयभीत होता है, तब उसकी बुद्धि के स्थान पर अक्सर उत्तेजना और संशय काम करने लगते हैं। वह ऐसे प्रश्नों के उत्तर भी शीघ्रता से स्वीकार करने लगता है जिन्हें शांत अवस्था में शायद वह अस्वीकार कर देता।
यहीं भय सत्ता के हाथों में एक साधन भी बन सकता है।
मनुष्य को केवल बल से अधिक समय तक नियंत्रित नहीं किया जा सकता, किंतु भय उसके विचारों और व्यवहार पर अदृश्य शासन कर सकता है। दंड का भय वाणी को मौन कर सकता है; अपमान का भय सत्य को दबा सकता है; आजीविका छिन जाने की आशंका व्यक्ति को अन्याय सहने के लिए विवश कर सकती है। राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में अनेक बार भय का उपयोग लोगों को एकजुट करने, विभाजित करने अथवा नियंत्रित करने के लिए किया गया है।
भय की राजनीति विशेष रूप से विचित्र है। उसमें पहले किसी संकट की छवि निर्मित होती है, फिर उस संकट से बचाने वाले व्यक्ति अथवा शक्ति को प्रस्तुत किया जाता है। कभी बेरोजगारी का भय, कभी बाहरी शत्रु का भय, कभी संस्कृति के विनाश का भय और कभी भविष्य की असुरक्षा—मनुष्य की आशंकाएँ अनेक रूपों में राजनीतिक भाषा का हिस्सा बन सकती हैं। इस प्रकार भय केवल एक भावना नहीं रहता; वह सामाजिक शक्ति बन जाता है।
मनुष्य का एक बड़ा भय अज्ञात का भय है। अंधकार स्वयं शायद उतना भयावह नहीं होता, जितना उसमें छिपी हुई अज्ञात संभावना। मनुष्य अंधेरे कमरे से नहीं, इस प्रश्न से डरता है कि उसमें क्या हो सकता है। मृत्यु भी इसलिए भयावह है कि उसके पार का अनुभव मनुष्य के लिए अज्ञात है।
अज्ञान और भय का संबंध बड़ा विचित्र है। अज्ञान कभी मनुष्य को अंधविश्वास की ओर ले जाता है, तो कभी वही भय उसे ज्ञान की खोज के लिए प्रेरित करता है। बिजली की चमक और बादलों की गर्जना से भयभीत मनुष्य ने प्रकृति के रहस्यों को जानने का प्रयत्न किया। रोगों से डरने वाले मनुष्य ने चिकित्सा-विज्ञान विकसित किया। मृत्यु की अनिवार्यता ने दर्शन और धर्म को जन्म देने वाले प्रश्नों को गहरा किया।
अतः भय मनुष्य को नीचे भी गिरा सकता है और ऊपर भी उठा सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि मनुष्य भय के सामने अपनी बुद्धि खो देता है या उसी भय को समझने का प्रयत्न करता है।
धर्म के क्षेत्र में भी भय का स्थान रहा है। मृत्यु, अज्ञात और दंड की आशंकाओं ने धार्मिक चेतना को प्रभावित किया है। किंतु धर्म को केवल भय की संतान मान लेना मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा को अत्यधिक सरल बना देना होगा। धर्म के भीतर भय है, पर उसके भीतर करुणा भी है; दंड की कल्पना है, पर क्षमा का विचार भी है; मृत्यु का प्रश्न है, पर मुक्ति की खोज भी है।
इसी प्रकार कानून का आधार भी केवल भय नहीं है। दंड का भय व्यक्ति को अपराध करने से रोक सकता है, किंतु न्याय के प्रति आंतरिक सम्मान समाज को अधिक स्थायी रूप से बाँधता है। भय से अनुशासन उत्पन्न हो सकता है, पर विश्वास के बिना समाज का स्वस्थ जीवन संभव नहीं।
आधुनिक युग ने मनुष्य के पुराने भय समाप्त नहीं किए; उसने उनके साथ नए भय जोड़ दिए हैं। जंगल और जंगली पशुओं से डरने वाला मनुष्य आज मशीनों और तकनीक से भी भयभीत है। उसे रोजगार छिन जाने की चिंता है; कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव से अपने कार्य की उपयोगिता समाप्त हो जाने का भय है; डिजिटल संसार में अपनी निजता के नष्ट होने की आशंका है।
मनुष्य ने विज्ञान के माध्यम से प्रकृति पर अपना अधिकार बढ़ाया, किंतु उसके साथ अपने विनाश की शक्ति भी बढ़ा ली। जिस तकनीक ने जीवन को सरल बनाया, उसी ने निगरानी, सूचना-नियंत्रण और निजी जीवन के अतिक्रमण की नई संभावनाएँ भी उत्पन्न कीं। जिस औद्योगिक विकास ने समृद्धि दी, उसने पर्यावरण के संकटों का भय भी जन्म दिया।
आधुनिक मनुष्य की विडंबना यह है कि उसकी शक्ति जितनी बढ़ी है, उसकी असुरक्षा की चेतना भी उतनी ही विस्तृत हुई है।
वह अब केवल अपने घर की सुरक्षा के लिए चिंतित नहीं है; उसे पृथ्वी के भविष्य की भी चिंता है। उसे अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है, रोजगार के स्वरूप के बदल जाने की चिंता है और ऐसी दुनिया की चिंता है जिसका निर्माण उसकी अपनी सभ्यता ने किया है, पर जिस पर उसका पूर्ण नियंत्रण नहीं है।
फिर भी भय को मनुष्य की केवल दुर्बलता कहना उचित नहीं होगा। भय के कारण ही मनुष्य आग से बचता है, रोगों से सावधान रहता है और आने वाले संकटों के लिए तैयारी करता है। जो मनुष्य किसी भी खतरे से भयभीत न हो, वह संभवतः साहसी नहीं, बल्कि विवेकहीन होगा।
भय की एक उपयोगी सीमा है।
उस सीमा के भीतर भय जीवन की रक्षा करता है; सीमा के बाहर वही जीवन को संकुचित करने लगता है। एक सीमा तक भय सावधानी है, उसके बाद वह कैद बन जाता है। वह मनुष्य को संकट से बचाने के लिए उत्पन्न होता है, किंतु जब वह अत्यधिक बढ़ जाता है, तब मनुष्य को जीवन से ही दूर करने लगता है।
इसी बिंदु पर साहस का जन्म होता है।
साहस का अर्थ भय का अभाव नहीं है। जो किसी बात से डरता ही नहीं, उसके साहस का मूल्य क्या? साहस वहीं आरंभ होता है जहाँ भय उपस्थित हो और मनुष्य उसके बावजूद सत्य, न्याय, प्रेम अथवा अपने कर्तव्य के पक्ष में खड़ा हो।
भय मनुष्य से कहता है—पीछे हटो; साहस उससे पूछता है—पीछे हटने का कारण क्या है?
भय संभावित पराजय दिखाता है; साहस उस संभावना के बावजूद आगे बढ़ने की शक्ति देता है। इसलिए साहस भय का विलोम नहीं, बल्कि भय पर मनुष्य की चेतना की विजय है।
मानव इतिहास केवल युद्धों और विजयों का इतिहास नहीं है। वह उन असंख्य आशंकाओं का भी इतिहास है जिनके बीच मनुष्य ने प्रेम किया, परिवार बनाए, समाज रचे, ज्ञान की खोज की और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया। यदि भय मनुष्य को उसकी सीमाओं का बोध कराता है, तो साहस उसे उन सीमाओं के भीतर भी स्वतंत्र रहने की शिक्षा देता है।
अंततः मनुष्य का सबसे बड़ा भय संभवतः बाहर नहीं, उसके भीतर है। बाहरी संकट से पहले उसका मन उस संकट की छवि बनाता है और कई बार वही छवि वास्तविक संकट से अधिक भयानक हो उठती है।
इसलिए भय को जीतने का अर्थ संसार के समस्त संकटों को समाप्त कर देना नहीं है। वह तो संभव भी नहीं। भय पर विजय का अर्थ है—संकट को उसके वास्तविक आकार में देखना; कल्पना द्वारा निर्मित उसके अनावश्यक विस्तार को पहचानना; और फिर भी अपने विवेक, अपने सत्य और अपने कर्तव्य के साथ आगे बढ़ना।
भय मनुष्य को उसकी सीमाओं का बोध कराता है; साहस उसे उन सीमाओं के भीतर भी स्वतंत्र रहने की शिक्षा देता है।
और शायद मनुष्य की सबसे बड़ी विजय यही है कि वह भयभीत होते हुए भी जीता है, प्रेम करता है, सत्य कहता है और आगे बढ़ता रहता है।
भय संकट से अधिक मनुष्य की कल्पना में जन्म लेता है; साहस उसी कल्पना पर विजय का नाम है।

—' मुक्ताभ'

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