कौशलेन्द्र के नवगीत
माँ चूल्हे की जलती रोटी सी, तेज ऑंच में जलती मॉं ।। भीतर-भीतर बलके फिर भी बाहर नहीं उबलती मॉं।। धागे धागे यादें बुनती खुद को नई रुई सा धुनती दिन भर तनी तॉंत सी बजती घर ऑंगन में चलती मॉं।। सिर पर रखे हुए पूरा घर, अपनी भूख प्यास से ऊपर। घर को नया जन्म देने में, धीरे-धीरे गलती मॉं।। ...
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