'जश्न' : अंधविश्वास, सामाजिक पाखंड और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण का मार्मिक आख्यान

दरणीय डॉ० शिव शंकर मिश्र द्वारा रचित कहानी 'जश्न' ग्रामीण जीवन की विडंबनाओं, अंधविश्वास और मानवीय संवेदनाओं के निरंतर होते क्षरण का एक अत्यंत गहरा और मर्मस्पर्शी चित्रण है। यह कहानी केवल एक सरकारी कर्मचारी की सेवानिवृत्ति की घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है जहाँ 'पैसा' संवेदनाओं पर भारी पड़ जाता है

1. पद और रुतबे का मिथ्या बोध

कहानी का नायक अनंतराम एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी है, लेकिन वह 'खाकी कमीज' को अपने रुतबे का प्रतीक मानता है ताकि वह खुद को पुलिस के सिपाही जैसा शक्तिशाली महसूस कर सके। यह उसके भीतर छिपे एक हीनता बोध और सत्ता के प्रति आकर्षण को दर्शाता है। दफ्तर में उसकी विदाई पर कोई आधिकारिक समारोह न होना और उसका स्वयं ही अपने 'जश्न' का आयोजन करना, प्रशासनिक तंत्र में छोटे कर्मचारियों की उपेक्षा और उनके अकेलेपन को रेखांकित करता है

अंधविश्वास बनाम विज्ञान का द्वंद्व                        
लेखक ने कहानी में अंधविश्वास और वैज्ञानिक सोच के बीच के टकराव को बहुत बारीकी से बुना है। अनंतराम को 'विवैक्स मलेरिया' है, जो जाड़ा देकर बुखार आने और उल्टियों का स्पष्ट लक्षण है; लेकिन पूरा परिवार और गाँव इसे 'बचई पाँड़े' (मृत पिता) का साया या 'बरम' मान लेता है। यहाँ तक कि जब डॉक्टर स्पष्ट रूप से बताता है कि यह केवल बीमारी है, तब भी परिवार 'दवा और दुआ' दोनों के फेर में पड़ा रहता है और अंततः अंधविश्वास ही उन पर हावी रहता है 

जातिगत जड़ें और सामाजिक पाखंड 
कहानी में जातिगत भेदभाव की जड़ें बहुत गहरी दिखाई गई हैं। शहर से गाँव आते समय जो भाई वैन में एक साथ सटे हुए बैठे थे, गाँव पहुँचते ही उनका 'ब्राह्मणत्व' जाग उठता है और वे ड्राइवर (मुसलमान) और लाउडस्पीकर वाले (हरिजन) से छुआछूत बरतने लगते हैं यह ग्रामीण समाज के उस दोहरे चरित्र को उजागर करता है जहाँ स्वार्थ के लिए शहर में नियम लचीले होते हैं, लेकिन गाँव में परंपरा के नाम पर भेदभाव फिर से जीवित हो जाता है।

प्रकृति और परिवेश का सजीव चित्रण
लेखक ने प्रकृति का उपयोग कहानी के मूड को दर्शाने के लिए किया है। गुलमोहर की गिरती पंखुड़ियाँ, शाम को उत्तर की ओर उड़ते कौओं का झुंड, रात में झींगुरों की 'रीं-रीं' और सियारों की 'हुआ-हुआ' वातावरण में एक रहस्यमय और डरावना प्रभाव पैदा करती हैं। दीवार पर लिखी स्वास्थ्य विभाग की इबारत 'मलेरिया एक जानलेवा बुखार है' पूरे समय चमकती रहती है, जिसे लोग पढ़ते तो हैं पर समझते नहीं। 

संवेदनाओं का पतन और त्रासदी का अंत

कहानी का सबसे प्रभावशाली और दुखद हिस्सा इसका अंत है। एक तरफ गाय और छोटी बहू (छोटकी) की मृत्यु हो जाती है, जिसे परिवार 'नखरा' कहकर नजरअंदाज करता रहा है। दूसरी तरफ, अनंतराम के मोबाइल पर संदेश आता है कि उनके खाते में साढ़े पाँच लाख रुपये जमा हो गए हैं। शोक के क्षण में भी अनंतराम का मन इस धन की गणना करने लगता है और वह बेटे की दूसरी शादी व मिलने वाले दहेज (दैजा-दहेज) के बारे में सोचने लगता है 
कहानी का शीर्षक 'जश्न' अपने भीतर गहरा व्यंग्य समेटे हुए है। जहाँ एक ओर सेवानिवृत्ति का उत्सव है, वहीं दूसरी ओर मृत्यु, शोक और मानवीय संवेदनाओं का क्षरण भी मौजूद है। यही विरोधाभास कहानी को विशेष अर्थवत्ता प्रदान करता है।
निष्कर्ष  
'जश्न' एक ऐसी कहानी है जो पाठक को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आधुनिकता के इस दौर में भी हम अंधविश्वासों से मुक्त हो पाए हैं? कहानी का अंत यह कड़वा संदेश देता है कि आज के युग में आर्थिक लाभ, मानवीय रिश्तों और मृत्यु के शोक से भी बड़ा 'जश्न' बन गया है। लेखक ने अत्यंत कुशलता से एक साधारण सेवानिवृत्ति को एक गहन सामाजिक त्रासदी में बदल दिया है।


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