जहाँ सीसीटीवी हार गए और अंतःकरण जीत गया : ‘हराम की नहीं’

🎙️ जब विश्वविद्यालय की नैतिकता डगमगाने लगती है, तब एक साधारण रिक्शाचालक ईमानदारी का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाता है। शिवशंकर मिश्र की कहानी ‘हराम की नहीं’ का यह श्रव्य रूप कहानी के भावलोक में प्रवेश करने का एक सशक्त माध्यम है -


समकालीन हिंदी कहानी का एक महत्त्वपूर्ण दायित्व अपने समय की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक जटिलताओं को इस प्रकार अभिव्यक्त करना है कि वे केवल घटनाओं का विवरण न रह जाएँ, बल्कि समाज और मनुष्य की गहरी परतों को उद्घाटित करने वाली रचनात्मक संरचनाओं में रूपांतरित हो सकें। शिवशंकर मिश्र की कहानी ‘हराम की नहीं’ इसी अर्थ में एक उल्लेखनीय रचना है। यह कहानी पहली दृष्टि में विश्वविद्यालय के एक मूल्यांकन केंद्र में घटित एक साधारण-सी घटना पर आधारित प्रतीत होती है, किंतु इसके भीतर प्रवेश करते ही स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल भ्रष्टाचार, रिश्वत या शिक्षा-व्यवस्था की कहानी नहीं है; यह उस नैतिक संकट की कथा है, जिसमें आधुनिक संस्थाएँ, शिक्षित मध्यवर्ग और सामाजिक प्रतिष्ठा के स्थापित मानदंड धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता खोते जाते हैं, जबकि जीवन के हाशिए पर खड़ा एक साधारण मनुष्य नैतिकता का सबसे प्रामाणिक प्रतिनिधि बनकर उभरता है।

कहानी का आरंभ जिस दृश्य से होता है, वह अपने आप में अत्यंत अर्थपूर्ण है। बाहर भीषण लू चल रही है, जबकि विश्वविद्यालय के वातानुकूलित मूल्यांकन केंद्र में परीक्षक उत्तर-पुस्तिकाओं की जाँच में व्यस्त हैं। विभिन्न प्रकार के परिधान, इत्र की मिली-जुली गंध, औपचारिक संबोधन, चाय-नाश्ते की व्यवस्था और उत्तर-पुस्तिकाओं के ढेर—सब मिलकर एक ऐसे संसार का निर्माण करते हैं, जो ज्ञान, व्यवस्था और सभ्यता का प्रतिनिधि प्रतीत होता है। किंतु लेखक बहुत सूक्ष्म ढंग से इस बाहरी चमक के भीतर छिपी नैतिक रिक्तता को उद्घाटित करना शुरू कर देते हैं। उत्तर-पुस्तिकाओं में नोट निकलने की चर्चा किसी असामान्य घटना की तरह नहीं, बल्कि एक सामान्य अनुभव की तरह सामने आती है। यही वह बिंदु है, जहाँ कहानी भ्रष्टाचार की घटना से आगे बढ़कर भ्रष्टाचार के सामान्यीकरण की कहानी बन जाती है।

वास्तव में किसी समाज का सबसे बड़ा संकट भ्रष्टाचार का अस्तित्व नहीं, बल्कि उसका स्वाभाविक मान लिया जाना है। जब अनैतिकता सामाजिक व्यवहार का नियमित हिस्सा बन जाती है, तब वह अपराध नहीं रह जाती, संस्कृति का रूप ले लेती है। कहानी में दो परीक्षकों का पचास रुपये के नोट को लेकर झगड़ना इसी मानसिकता का उद्घाटन करता है। किसी को इस बात पर आपत्ति नहीं है कि उत्तर-पुस्तिका में नोट क्यों रखा गया था, विवाद केवल इस बात पर है कि नोट किसका है। यह प्रसंग व्यंग्यात्मक होते हुए भी अत्यंत गंभीर है, क्योंकि यह दिखाता है कि नैतिक प्रश्न अब अप्रासंगिक हो चुके हैं और उनकी जगह स्वार्थ ने ले ली है।

कहानी का विश्वविद्यालय केवल एक शैक्षणिक संस्था नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय संस्थागत जीवन का रूपक है। यहाँ ज्ञान है, पद है, प्रशासन है, नियम हैं, कैमरे हैं और औपचारिक अनुशासन भी है, किंतु नैतिकता अनुपस्थित है। मूल्यांकन केंद्र में लगे सीसीटीवी कैमरे लगातार घूमते रहते हैं। समन्वयक बार-बार याद दिलाता है कि हर गतिविधि रिकॉर्ड हो रही है। यह दृश्य आधुनिक समाज की उस निगरानी-व्यवस्था की याद दिलाता है, जिसे फ्रांसीसी चिंतक मिशेल फूको ने आधुनिक सत्ता का केंद्रीय उपकरण माना था। फूको के अनुसार आधुनिक संस्थाएँ मनुष्य को निरंतर निगरानी के माध्यम से अनुशासित करती हैं। किंतु ‘हराम की नहीं’ यह दिखाती है कि निगरानी नैतिकता का विकल्प नहीं बन सकती। कैमरे सब कुछ देख रहे हैं, फिर भी भ्रष्टाचार मौजूद है। इससे एक गहरा प्रश्न उभरता है—क्या मनुष्य को केवल बाहरी नियंत्रणों से नैतिक बनाया जा सकता है? कहानी का उत्तर स्पष्ट है—नहीं। नैतिकता का स्रोत अंतःकरण है, कैमरा नहीं।

कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण वैचारिक क्षण तब आता है, जब समन्वयक यह कहता है कि यदि उत्तर-पुस्तिका में मिले नोट के मामले को औपचारिक रूप से उठाया गया, तो “परीक्षार्थी का भविष्य बिगड़ जाएगा।” यह वाक्य पहली दृष्टि में सहानुभूतिपूर्ण प्रतीत हो सकता है, किंतु वास्तव में यह उस सामाजिक मानसिकता का उद्घाटन करता है, जिसमें समस्या को समाप्त करने के बजाय उसे ढँक देना अधिक सुविधाजनक माना जाता है। लेखक यहाँ एक अत्यंत असुविधाजनक प्रश्न उठाते हैं—यदि रिश्वत देने का प्रयास करने वाले विद्यार्थी का भविष्य बचाने के नाम पर भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया जाए, तो वास्तव में किस भविष्य की रक्षा की जा रही है? व्यक्ति की या भ्रष्टाचार की संस्कृति की? कहानी इस प्रश्न का प्रत्यक्ष उत्तर नहीं देती, लेकिन पाठक को इस नैतिक विडंबना के सामने अकेला छोड़ देती है।

कथावाचक स्वयं भी इस नैतिक संकट से मुक्त नहीं है। वह आदर्शवादी नायक नहीं है, बल्कि एक साधारण मनुष्य है। जब उसकी उत्तर-पुस्तिका से सौ रुपये का नोट निकलता है, तो वह दुविधा में पड़ जाता है। वह निश्चय नहीं कर पाता कि क्या किया जाए। यह दुविधा ही उसे विश्वसनीय बनाती है। वह भ्रष्टाचार से असहज है, किंतु उसके विरुद्ध निर्णायक प्रतिरोध भी नहीं कर पाता। इस अर्थ में वह आधुनिक शिक्षित मध्यवर्ग का प्रतिनिधि बन जाता है—एक ऐसा वर्ग जो नैतिक प्रश्नों को समझता है, उनसे परेशान भी होता है, किंतु व्यवस्था के भीतर रहते हुए अक्सर समझौतों का रास्ता चुन लेता है।

कहानी को जाँ-पॉल सार्त्र के अस्तित्ववादी दर्शन के आलोक में पढ़ा जा सकता है। सार्त्र का मानना था कि मनुष्य अपने चुनावों से निर्मित होता है। उसके सामने उपस्थित परिस्थितियाँ महत्वपूर्ण अवश्य हैं, किंतु निर्णायक नहीं। निर्णायक उसका चुनाव है। कथावाचक के सामने रखा सौ रुपये का नोट केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि एक नैतिक चुनाव है। उत्तर-पुस्तिका मूलतः विद्यार्थी की परीक्षा लेने के लिए बनी थी, किंतु इस क्षण वह परीक्षक की परीक्षा लेने लगती है। कहानी का यह बिंदु अस्तित्ववादी अर्थों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ मनुष्य अपने विवेक के सामने अकेला खड़ा है। वह जो भी निर्णय करेगा, वही उसकी नैतिक पहचान बनेगा।

कहानी की संरचना भी अत्यंत सूक्ष्म है। इसका पहला भाग विश्वविद्यालय के भीतर घटित होता है और दूसरा भाग विश्वविद्यालय के बाहर। यह केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि मूल्य परिवर्तन है। विश्वविद्यालय के भीतर शिक्षा, पद, प्रतिष्ठा और आधुनिकता है, लेकिन नैतिकता का अभाव है। विश्वविद्यालय के बाहर धूल, गर्मी, श्रम और अभाव है, किंतु आत्मसम्मान और ईमानदारी मौजूद है। लेखक इस विरोध के माध्यम से आधुनिक समाज की मूल्य-व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। क्या शिक्षा वास्तव में मनुष्य को बेहतर बनाती है? क्या सामाजिक प्रतिष्ठा नैतिक श्रेष्ठता की गारंटी है? कहानी का उत्तर नकारात्मक प्रतीत होता है।

कथानक का चरम क्षण रिक्शाचालक के साथ घटित होता है। कथावाचक अपने ऊपर से सौ रुपये के नैतिक बोझ को उतारने के लिए उसे रिक्शाचालक को देना चाहता है। उसे लगता है कि इस प्रकार वह अपने अपराधबोध से मुक्त हो जाएगा। किंतु रिक्शाचालक का उत्तर पूरी कहानी का अर्थ बदल देता है—“मैं जाति का कसाई हूँ, हराम की कमाई नहीं खा सकता।” यह केवल एक संवाद नहीं, बल्कि पूरी कथा का नैतिक केंद्र है। इस एक वाक्य में कहानी का समूचा प्रतिपाद्य निहित है।

यहाँ लेखक सामाजिक पदानुक्रम को उलट देते हैं। विश्वविद्यालय के शिक्षित, प्रतिष्ठित और प्रभावशाली पात्र जहाँ नैतिक रूप से संदिग्ध दिखाई देते हैं, वहीं एक साधारण श्रमिक नैतिकता का सबसे बड़ा प्रतिनिधि बन जाता है। जनवादी दृष्टि से देखें तो यह श्रमशील वर्ग की नैतिक प्रतिष्ठा का पुनर्स्थापन है। बहुजन विमर्श की दृष्टि से देखें तो यह सामाजिक संरचना के बदलाव का क्षण है, जहाँ हाशिए पर स्थित व्यक्ति नैतिक रूप से केंद्र में आ जाता है। लेखक किसी वैचारिक नारे के बिना यह काम कर दिखाते हैं।

मार्क्सवादी दृष्टिकोण से भी कहानी अत्यंत रोचक है। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति नैतिक रूप से सबसे समृद्ध सिद्ध होता है, जबकि संसाधनों, वेतन और सामाजिक प्रतिष्ठा से सम्पन्न लोग नैतिक संकट में दिखाई देते हैं। यहाँ लेखक वर्गीय श्रेष्ठता की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देते हैं। वे संकेत करते हैं कि आर्थिक स्थिति मनुष्य के नैतिक मूल्य का अंतिम निर्धारक नहीं है। नैतिकता की वास्तविक भूमि मनुष्य का अंतःकरण है।

कहानी का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष शिक्षा-विमर्श से जुड़ा है। आधुनिक समाज में शिक्षा को प्रायः सामाजिक प्रगति का माध्यम माना जाता है। किंतु लेखक यह प्रश्न उठाते हैं कि यदि शिक्षा मनुष्य के भीतर नैतिक विवेक का निर्माण नहीं कर पा रही, तो उसकी सफलता का मूल्यांकन किस आधार पर किया जाएगा? विश्वविद्यालय का पूरा वातावरण इस प्रश्न को और अधिक तीक्ष्ण बना देता है। यहाँ ज्ञान का उत्पादन हो रहा है, किंतु चरित्र का नहीं। इस प्रकार कहानी शिक्षा के उद्देश्य पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करती है।

साहित्यिक परंपरा की दृष्टि से देखें तो ‘हराम की नहीं’ प्रेमचंदीय नैतिक यथार्थवाद की स्मृति जगाती है। प्रेमचंद की अनेक कहानियों में साधारण मनुष्य नैतिक शक्ति का वाहक बनकर सामने आता है। नमक का दारोगा में ईमानदारी और भ्रष्टाचार का संघर्ष जिस प्रकार उपस्थित है, उसका एक समकालीन रूप यहाँ दिखाई देता है। किंतु शिवशंकर मिश्र प्रेमचंद की पुनरावृत्ति नहीं करते। वे उसी नैतिक परंपरा को आधुनिक संस्थागत समाज के संदर्भ में पुनर्परिभाषित करते हैं।

समकालीन हिंदी कहानी के परिप्रेक्ष्य में भी यह रचना महत्त्वपूर्ण है। उदय प्रकाश, स्वयं प्रकाश, संजीव, अखिलेश और पंकज मित्र जैसे कथाकारों ने व्यवस्था, सामाजिक विडंबनाओं और मनुष्य की असुरक्षा को अपने लेखन का विषय बनाया है। ‘हराम की नहीं’ इस परंपरा से संवाद करती है, किंतु उसकी विशिष्टता यह है कि वह नैतिक संभावना को पूरी तरह समाप्त नहीं होने देती। जहाँ समकालीन कथा-साहित्य का एक बड़ा हिस्सा नैतिक संशय और विखंडन पर केंद्रित है, वहीं यह कहानी नैतिक स्पष्टता का पक्ष ग्रहण करती है। वह यह विश्वास व्यक्त करती है कि ईमानदारी और आत्मसम्मान अभी भी समाज के भीतर जीवित हैं, भले ही वे सबसे अप्रत्याशित स्थानों पर क्यों न मिलें।

निस्संदेह कहानी पर यह आपत्ति की जा सकती है कि रिक्शाचालक का चरित्र कुछ हद तक आदर्शीकृत है। समकालीन यथार्थ की जटिलताओं को देखते हुए उसका नैतिक आग्रह असाधारण प्रतीत हो सकता है। किंतु साहित्य का उद्देश्य केवल यथार्थ की नकल करना नहीं होता; वह मूल्यबोध की संभावनाओं को भी निर्मित करता है। इस दृष्टि से रिक्शाचालक कहानी का पात्र कम और नैतिक प्रतिरोध का प्रतीक अधिक बन जाता है।

अंततः ‘हराम की नहीं’ केवल भ्रष्टाचार-विरोधी कहानी नहीं है। यह आधुनिक संस्थाओं की नैतिक विफलता, मध्यवर्गीय अंतर्द्वंद्व, शिक्षा की सीमाओं, सामाजिक पदानुक्रम की विडंबनाओं और लोकजीवन में बची हुई नैतिक शक्ति का गहन आख्यान है। शिवशंकर मिश्र ने एक अत्यंत साधारण घटना के माध्यम से यह दिखाया है कि समाज की वास्तविक शक्ति पद, प्रतिष्ठा, वेतन और संस्थागत अधिकार में नहीं, बल्कि मनुष्य के आत्मसम्मान और नैतिक विवेक में निहित होती है। जब शिक्षित समाज और उसकी संस्थाएँ अपने दायित्व से चूकने लगती हैं, तब कभी-कभी नैतिकता किसी विश्वविद्यालय के प्राध्यापक में नहीं, बल्कि एक रिक्शाचालक में जीवित मिलती है। यही इस कहानी का सबसे बड़ा सत्य है, यही उसका सबसे बड़ा व्यंग्य है और यही उसकी सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि भी।

— मुक्ताभ


आपकी राय

क्या आपको लगता है कि आज के समाज में ईमानदारी और आत्मसम्मान अब भी उतनी ही दृढ़ता से जीवित हैं, जितनी इस कहानी के रिक्शाचालक में दिखाई देती है? अपने विचार टिप्पणी के माध्यम से अवश्य साझा करें।

📚 साहित्य, समाज और मानवीय मूल्यों पर ऐसी ही समीक्षाएँ पढ़ने के लिए मुक्ताभ से जुड़े रहें।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हाइकू

भास्कराचार्य त्रिपाठी : सरस्वती-वंदना

'अंतिम उच्चारण' : संवेदना, प्रतीक और मनोवैज्ञानिक विस्थापन का आलोचनात्मक विश्लेषण -