गुरुवार, 19 मार्च 2026

हम ऐसे युग में जीने को विवश हैं, जिस में चोर खुद को आसानी और बेहयाई से महान घोषित कर देते हैं...

सुन रहा हूँ, कवि नरेश सक्सेना के साथ हुआ अपराध और यह भी कि वे व्यथित हो कर एकान्त वास में चले आते वे। सक्सेना जी,चोर अब 'महान' समझने लगे हैं खुद को। सन् 2014के 'आलोचना' के अंक में श्री राजेश जोशी की कविता 'पखावज वृत्तान्त' देख कर मैं ही नहीं, अनेक मित्र चौंक गये, क्यों कि यह 'अभिप्राय', अप्रैल 1983 में प्रकाशित मेरी लोक शैली में लिखी कहानी का अविकल रूप था। शीर्षक तक नहीं बदला गया। मेरा लीगल नोटिस मिलने पर फोन से उनकी क्षमा याचना आती, मगर अखबार में उनके वक्तव्य का शीर्षक था'एक रचना चुरा कर मैं महान न बन जाता। 'साहित्यिक थानेदारों को मेरे पंजीकृत और खुले पत्र भी नहीं मिले। क्या मतलब इस भाषा में कुछ लिखने का? कोई कभी चुरा लेगा और फिर खुद के महान होने की घोषणा कर देगा। सक्सेना जी का एकान्तवासी होना स्वाभाविक है। मैं तो हो गया। मैं मशहूर नहीं हूँ,पर नरेश जी आप न हों। 'महान' भले ही न हों, पर मशहूर तो हैं। हम ऐसे युग में जीने को विवश हैं, जिस में चोर खुद को आसानी और बेहयाई से महान घोषित कर देते हैं और भेड़ियाधसान जैकारे लगने लगते हैं।

SHIV SHANKAR MISHRA

साहित्य में चौर्य और प्रेरण-

Shivshankar Mishra
·16 मार्च 2023 ·

अभी कुछ घंटे पहले Shiv Murti जी का फोन आया। मुझे लगा कि मामला कुछ कुशल क्षेम जैसा होगा। हुआ भी; पर असल मामला कुछ यूँ था कि वे मेरी पत्नी से और मुझसे तकरीबन तीस साल पहले (या शायद उससे भी ज्यादा) सुने गये लोकगीतों में से एक 'डोरी डाल दे' का अपनी एक कथाकृति में उपयोग करने हेतु अनुमति माँग रहे थे। यह उनकी विनम्रता भी है और साहित्यिक तरीका भी। इससे पहले 'तर्पण' की रचना प्रक्रिया के दौरान उन्होंने बड़ी साफगोई से मुझसे सुने गये किसी कथा प्रसंग को कथा विषय बनाया था, ऐसी सूचना भी दी थी। पर मेरी किसी रचना का निषेध उनकी कोई भी रचना नहीं करती। एक ही घटना या परिवेश अलग अलग रचनात्मक मानस को अलग अलग प्रतीतियाँ देता है।इसी क्रम में राजेश जोशी याद आते हैं। फोन उन्होंने भी किया था, पर अनुमति के लिए नहीं, माफी माँगने के लिए। वह भी तब, जब उनकी तथाकथित कविता 'पखावज वृत्तांत' आलोचना में प्रकाशित करवा ली और मेरा लीगल नोटिस उन्हें प्राप्त हुआ। माफी का औचित्य आज तक मेरी समझ में नहीं आया। यदि उन्होंने मेरी रचना का अर्थोपकर्ष किया होता, तो मैं उनका अभिनंदन करता, पर उन्होंने तो अर्थापकर्ष किया है।

मैं तो चेतना का नैरन्तर्य हूं।


मेरे आत्मस्वरूपा हैं शिवशंकर मिश्र (Shivshankar Mishra)। कोई छल-छद्म नहीं, एकदम सच्चे, भोले शंकर, निष्कपट। कंठ में सरस्वती, कर में काम भर की लक्ष्मी। बुजुर्ग की परवाह, बच्चों की सरलता। हम सभी उनको अस्सी के दशक से ही पंडित कहते आए हैं। मेरी बीमारी की बात सुनी तो विह्वल हो गए। बेटे से फोन करवाया। हाल-चाल जाना। बोले – अनिल, हम लोग तो न जाने कब से भूत बन गए चुके हैं, बस शरीर यहां पड़ा है। फिर बातचीत के दौरान भावुक हो गए। बोले – हम न मरब, मरे संसारा।
यह विचार तभी से छज्जे पर बैठे पंछी के टूटे कोमल पंख की तरह मेरे मन में भटक रहा है। कबीर ने जब यह कहा होगा तो उनका मतलब क्या था? कबीर हमारे अपने जिस इलाके में जन्मे, पल-बढ़े, घूमे-फिरे और संतई की, वहां हम का सीधा मतलब ‘मैं’ होता है। उनका कहना था – मैं नहीं मरूंगा, मरेगा यह संसार। क्या कबीर का ‘मैं’ शंकराचार्य का ब्रह्म है या गीता की आत्मा? दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना, रामनाम का मरम है आना – कहनेवाले कबीर का ‘मैं’ ब्रह्म या आत्मा कतई नहीं हो सकता। फिर क्या है?
बुद्ध कहते हैं सब मर जाता है हमारे कर्म नहीं मरते। उनका नैरन्तर्य है। उन्होंने भव-संसार की कड़ी-दर-कड़ी निकाली थी। बुद्ध का कहना था: अनित्य को नित्य, अशुद्ध को शुद्ध, दुख को सुख और अनात्म को आत्म जानना ही अविद्या है और इस अविद्या से ही तमाम संस्कार या मनोगत धारणाएं पैदा होती हैं। मृत्यु के समय जो च्युति संस्कार या सबसे गहरी गांठ होती है, वह नए जन्म का सबब बन जाती है।
बुद्धवाणी में कहा गया है - अविज्जा पच्चया संखारा, संखारा पच्चया विञ्ञाणं, विञ्ञाण पच्चया नामरूपं, नामरूप पच्चया सलायतनं, सलायतन पच्चया फस्सो, फस्स पच्चया वेदना, वेदना पच्चया तण्हा, तण्हा पच्चया उपादानं, उपादान पच्चया भवो, भव पच्चया जाति। अविद्या से संस्कार, उनसे चेतना या प्रकृति के नियमों का बंधन, शरीर व चित्त, मन समेत छह इंद्रियां, स्पर्श, संवेदना, तृष्णा व आसक्ति। आसक्ति से भव-पुनर्भव, भव-संसार और फिर जन्म से मृत्यु तक का चक्र दोबारा चल निकलता है।
हमारे कर्मों से निकले संस्कार ही नए जन्म का आधार बनते हैं। लोक में तो यहां तक मान्यता है कि नया जन्म मनुष्य या किसी जीव के रूप में ही नहीं, पेड़-पौधों तक के रूप में हो सकता है। सीत-बसंत की कथा में दोनों भाइयों को उनकी सौतेली मां मरवा डालती है तो वे अपने घर के पीछे फूलों का पौधा बनकर जन्म लेते हैं।

बुद्ध की बात से लेकर लोक की मान्यता ही कबीर के इस कथन का सार है कि हम न मरब, मरे संसारा। भव की कड़ी टूट जाएगी तो यह भव-संसार मिट जाएगा। लेकिन मैं तो चेतना का नैरन्तर्य हूं। मैं कहां मरनेवाला। उस दिन पंडित ने भी कहा था – चेतना का नैरन्तर्य है। आखिर कौन-सी चेतना का नैरन्तर्य? वही चेतना जो कोई तरल या ठोस नहीं, जिसे हम अपने कर्मों से बराबर जन्म-दर-जन्म गढ़ते व बदलते रहते हैं, परिष्कृत करते रहते हैं, जिसने अरबों साल में मछली, सरीसृप व पक्षी से इंसान बनने तक सफर तय किया है।
शायद इंसान के दो स्वरूप साथ-साथ चलते रहते हैं। एक तो शरीर है जो लीवर से लेकर किडनी, फेफड़े, हृदय व तमाम अंगों-प्रत्यंगों का समन्वय है और दूसरा है उसका मनोमय रूप जो वह पिछले जन्म के च्युति संस्कार से लेकर रेशा-दर-रेशा हमारी क्रिया-प्रतिक्रिया व अनुभवों से बनता जाता है। मरने पर शरीर के रसायन रीसाइकल हो जाते हैं, जबकि मन का भी सब कुछ हवा हो जाता है केवल च्युति सस्कार को छोड़कर जो आगे की यात्रा का आधार बन जाता है। यही चेतना का नैरन्तर्य है। यही जीवन का सातत्य है।
अंत में पंडित की बात से ही अपनी बात समाप्त करता हूं, “यों भी कभी सिर्फ अपने लिए नहीं जिए, अब क्या! मौत की तलाश में इतने जीवन की कल्पना भी कभी नहीं थी!
जय जीवन! जय सातत्य की प्रतीति!

शून्य का एहसास

मेरी रिक्तता का बोध और
शून्य का एहसास कह रहा
ओ मेरी प्रतिभा मर जाओ!


जिन्दगी जुआ जब बन जाये
तब हार जीत के क्या माने!


मैंने सोचा है
मेरी मौत वहाँ हो,
जहाँ-न कोई गीध हो,
न चील,न कुत्ता,न स्यार,
न घड़ियाल
और न कोई-
घड़ियाली आँसू हो!

अंतिम उच्चारण- शिवशंकर मिश्र सहयात्रा प्रकाशन, नयी दिल्ली



Shashank Shukla

30 जुलाई 2021 ·

आज आदरणीय डॉ शिवशंकर मिश्र जी का कहानी संग्रह 'अंतिम उच्चारण' मिला। कहानी में छः कहानी संग्रहीत हैं। अंतिम उच्चारण, बाबा की उघन्नी, मूरतें, मुनुआ की वीरगति, पखावज, मुजरिम। इनमें पखावज कहानी अवांतर कारणों से चर्चित रही है। वर्षों पहले संभवतः कथादेश में बाबा की उघन्नी पढ़ी थी, तभी शिवशंकर मिश्र जी के कहानी कहन के ढंग से प्रभावित हुआ था। संग्रह की अंतिम कहानी मुजरिम 101 पेज की लंबी कहानी है। युवा कहानी में लंबी कहानी एक प्रचलित शिल्प विधान रहा है।

लेखक परिचय में माता-पिता का नाम दर्ज़ है, जो लेखक के जड़ों से जुड़ाव का संकेत समझना चाहिए। उचित ही है कि पुस्तक पिता को समर्पित है।
पुस्तक में भूमिका नहीं है। लेखक का मानना है कि कहानी स्वयं में एक भूमिका होती हैं। अतः कहानी स्वयं एक पूर्व कथन और मुख्य कथन है।
शिवशंकर मिश्र कम लिखते हैं, किन्तु ठहराव के साथ लिखते हैं। आपको पढ़ना ठहर कर ही सम्भव है। शेष पाठ के बाद...








मुद्दा आज भी जीवित है...

 मुद्दा आज भी जीवित है. साहित्य के माफिया निहायत बेशर्मी से मौन साध कर महाकवि का मुकुट धारण किए भ्रमण कर रहे हैं .क्या ऐसे अपराधों का संज्ञान हमारा हिंदी जगत् और इसके मठाधीश कभी नहीं लेंगे?

रात में दिन नहीं, जनवरी में नववर्ष नहीं.

 

दुनियाभर के समाज, धर्म और देशों में अलग-अलग समय में नववर्ष मनाया जाता है। अधिकतर कैलेंडर में नववर्ष मार्च से अप्रैल के बीच आता है और दूसरे दिन की शुरुआत सूर्योदय से होती है। मार्च में बदलने वाले कैलेंडर को ही प्रकृति और विज्ञान सम्मत माना जाता है जिसके कई कारण है।
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मार्च में प्रकृति और धरती का एक चक्र पूरा होता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार सूर्योदय से दिन शुरू होता है। सूर्यास्त के बाद उस दिन की रात प्रारंभ होती है। उस रात का अंतिम प्रहर बीत जाने पर जब नया सूर्योदय होता है तब दिन और रात का एक चक्र पूरा हो जाता है। जबकि ईसाई कैलेंडर में रात की 12 बजे नया दिन प्रारंभ हो जाता है जो कि विज्ञान सम्मत नहीं है। दूसरा यह कि जनवरी में प्रकृति का चक्र पूरा नहीं होता। धरती के अपनी धूरी पर घुमने और धरती के सूर्य का एक चक्कर लगाने लेने के बाद जब दूसरा चक्र प्रारंभ होता है असल में वही नववर्ष होता है। नववर्ष में नए सिरे से प्रकृति में जीवन की शुरुआत होती है। वसंत की बहार आती है।
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यदि कोई कैलेंडर आपकी मान्यता, विश्वास, धार्मिक घटना, संदेशवाहक के जन्म, जयंती आदी पर आधारित है तो वह कैलेंडर भी कैलेंडर ही होता है लेकिन उसका संबंध विज्ञान से नहीं इतिहास से होता है। हालांकि सभी तरह के कैलेंडर अनुसार नववर्ष मनाया जा जा सकता है, क्योंकि सभी का सम्मान भी जरूरी है। लेकिन सच को स्वीकार करना भी जरूरी है। आपके लिए यहां संक्षिप्त में जानकारी है कि किस कैलेंडर अनुसार इस समय कौन-सा सन् या संवत चल रहा है।
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सिख संवत................
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इस वक्त सिख संवत् नानकशाही 551-52 चल रहा है। सिख नानकशाही कैलेंडर के अनुसार होला मोहल्ला (होली के दूसरे दिन) से नए साल की शुरुआत होती है। पंजाब में नया साल वैशाखी पर्व के रूप में मनाया जाता है, जो कि अप्रैल में आती है।
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हिजरी संवत................
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इस वक्त मुस्लिम समुदाय का हिजरी संवत् 1442-43 चल रहा है। हिजरी सन् की शुरुआत मोहर्रम माह के पहले दिन से होती है। इसकी शुरुआत 622 ईस्वी में हुई थी। हजरत मोहम्मद जब मक्का से निकलकर मदीना में बस गए तो इसे 'हिजरत' कहा गया। जिस दिन वे मक्का से मदीना आए, उस दिन से हिजरी कैलेंडर शुरू हुआ। हिजरी कैलेंडर में चन्द्रमा की घटती-बढ़ती चाल के अनुसार दिनों का संयोजन नहीं किया गया है, अत: इसके महीने हर साल करीब 10 दिन पीछे खिसकते रहते हैं।
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शक संवत....................
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इस वक्त शक संवत् 1942-43 चल रहा है। शक और शाक्य में फर्क है। शकों ने भारत पर आक्रमण किया था। इस संवत् की शुरुआत शक सम्राट कनिष्क ने 78 ईस्वी में की थी। इसे शालिवाहन संवत् भी कहा जाता है। स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने इसी शक संवत् को राष्ट्रीय संवत् के रूप में घोषित कर दिया। राष्ट्रीय संवत् का नववर्ष 22 मार्च से शुरू होता है। यह संवत् सूर्य के मेष राशि में प्रवेश से शुरू होता है।
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ईस्वी संवत..........
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इस वक्त ईस्वी संवत 2020 चल रहा है। 1 जनवरी को मनाया जाने वाला नववर्ष दरअसल ग्रेगोरियन कैलेंडर पर आधारित है। इसकी शुरुआत रोमन कैलेंडर से हुई थी, जबकि पारंपरिक रोमन कैलेंडर का नववर्ष 1 मार्च से शुरू होता है। दुनियाभर में आज जो कैलेंडर प्रचलित है, उसे पोप ग्रेगोरी अष्टम ने 1582 में तैयार किया था। ग्रेगोरी ने इसमें लीप ईयर का प्रावधान किया था। वर्तमान में इसे ईसाई संवत कहते हैं। इस संवत के कारण दुनिया के इतिहास को 2 भागों में बांट दिया गया- ईसा पूर्व और ईसा बाद। इस कैलेंडर का दिन रात की 12 बजे बदल जाता है।
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विक्रम संवत..................
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इस समय विक्रम संवत 2077 चल रहा है जिसकी शुरुआत ईस्वी पूर्व 57 को उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने की थी। इस कैलेंडर की शुरुआत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होती है। यह हिन्दू धर्म का सर्वमान्य कैलेंडर है। इसी दिन से चैत्र नवरात्र का भी प्रारंभ होता है। 1 साल में 12 महीने और 7 दिन का सप्ताह विक्रम संवत से ही प्रेरित होकर दुनियाभर में प्रचलित हुआ। यह कैलेंडर सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र की गतिविधियों पर आधारित है, लेकिन इसमें चान्द्रमास को ज्यादा महत्व दिया गया है। इस कैलेंडर का एक दिन सूर्योदय से लेकर अगले दिन तक के सूर्योदय तक चलता है।
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वीर निर्वाण संवत्..................
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इस वक्त जैन समुदाय का 2547 (महावीर संवत 2616) वीर निर्वाण संवत् चल रहा है। जैन समुदाय का नया साल दीपावली के दिन से प्रारंभ होता है। इस दिन भगवान महावीर स्वामी ने निर्वाण पद प्राप्त किया था इसीलिए इसे वीर निर्वाण संवत् कहते हैं।
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बौद्ध संवत.................
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इस वक्त बौद्ध संवत 2595 चल रहा है। भगवान बुद्ध का निर्वाण 543 ईस्वी पूर्व हुआ था। बौद्ध धर्म के कुछ अनुयायी बुद्ध पूर्णिमा के दिन 17 अप्रैल को नया साल मनाते हैं। कुछ 21 मई को नया वर्ष मानते हैं। थाईलैंड, बर्मा, श्रीलंका, कंबोडिया और लाओस के लोग 7 अप्रैल को बौद्ध नववर्ष मनाते हैं।
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कलि संवत...................
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कलियुग संवत 5120 चल रहा है।। इसे महाभारत और युधिष्ठिर संवत् भी कहते हैं। कलि संवत् 3102 ईस्वी पूर्व से प्रारंभ होता है। जब द्वापर युग का अंत हुआ और कलियुग का प्रारंभ हुआ तब कलि संवत् की शुरुआत हुई। महाभारत के अंत के बाद पांडव पुत्र युधिष्ठिर ने 37 साल 8 महीने 25 दिन तक राज किया था। उन्हीं के राज्यारोहण के समय से युधिष्ठिर संवत् चल रहा है। महाभारत युद्ध को 5153-54 वर्ष हो चुके हैं। कलियुग की कुल आयु 4,32,000 वर्ष है। कलियुग आरम्भ हुए 5121 वर्ष हो चुके होंगे। तथा कलियुग समाप्त होने को 4,26,879 वर्ष शेष रहेंगे। इसके बाद उन्तीसवाँ सतयुग (कृतयुग) आरम्भ होगा।
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यहूदी संवत् ........................
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इस समय यहूदी संवत् 5781 चल रहा है। 3561 ईस्वी पूर्व इस संवत् का प्रारंभ हुआ था। यहूदी नववर्ष ग्रेगोरी के कैलेंडर के अनुसार 5 सितंबर से 5 अक्टूबर के बीच आता है। हिब्रू या यहूदी मान्यता के अनुसार ईश्वर द्वारा विश्व को बनाने में 7 दिन लगे थे। यहूदी पैगंबर हजरत मूसा 3656 वर्ष पूर्व हुए थे।
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पारसी संवत..........................
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पारसी समुदाय में नववर्ष को 'नवरोज' कहते हैं। लगभग 3,000 वर्ष पूर्व शुरू हुए इस कैलेंडर को ईरानी कैलेंडर कहा जा सकता है। वैसे पारसियों में 3 तरह के कैलेंडर प्रचलित है जिनके नाम हैं- शहंशाही, फासली और कादमी। ईस्वी कैलेंडर के अनसार नवरोज प्रतिवर्ष 20 या 21 मार्च से आरंभ होता है। शहंशाही कैलेंडर के अनुसार यह 1387वां वर्ष चल है। इसे जमशेदी नवरोज भी कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार पारसी संवत् 189923 वर्ष प्राचीन है।
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सप्तर्षि संवत.......................
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सप्तर्षि संवत भारत का सबसे प्राचीन संवत है। प्राचीन सप्तर्षि संवत 6676 ईस्वी पूर्व से प्रारंभ होता है और नवीन सप्तर्षि संवत 3076 ईसापूर्व से प्रारंभ होता है। इस वक्त प्राचीन के अनुसार सप्तर्षि संवत का यह 8693-94 चल रहा है और नवीन के अनुसार सप्तर्षि संवत 5093-94 चल रहा है। सप्तर्षि संवत मेष राशि से प्रारंभ होता है। यह नक्षत्रों पर आधारित कैलेंडर है। प्राचीनकाल में भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी सप्तर्षि संवत का प्रयोग होता था। भारत में विक्रम संवत, कलि संवत और सप्तर्षि संवत एक ही तिथि से प्रारंभ होते हैं। सप्तर्षि कैलेंडर मुख्यत: कश्मीर, हिमाचल और उसके आसपास के क्षेत्र में प्रचलित था।
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सप्तर्षि संवत् भारत का प्राचीन संवत है जो ३०७६ ईपू से आरम्भ होता है। महाभारत काल तक इस संवत् का प्रयोग हुआ था। बाद में यह धीरे-धीरे विस्मृत हो गया। एक समय था जब सप्तर्षि-संवत् विलुप्ति की कगार पर पहुंचने ही वाला था, बच गया। इसको बचाने का श्रेय कश्मीर और हिमाचल प्रदेश को है। उल्लेखनीय है कि कश्मीर में सप्तर्षि संवत् को 'लौकिक संवत्' कहते हैं और हिमाचल प्रदेश में 'शास्त्र संवत्'। जब से सृष्टि प्रारंभ हुई है, तभी से सप्तर्षि संवत् अस्तित्व में आया है। प्राचीन काल में भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी सप्तर्षि संवत् का प्रयोग होता था। इसके प्रमाण हैं हमारे पुराण, महाभारत, राजतरंगिणी, श्रीलंका का प्रसिद्ध ग्रंथ महावंश आदि हैं।
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नाम से ही स्पष्ट है कि इस संवत् का नामकरण सप्तर्षि तारों के नाम पर किया गया है। ब्राह्मांड में कुल 27 नक्षत्र हैं। सप्तर्षि प्रत्येक नक्षत्र में 100-100 वर्ष ठहरते हैं। इस तरह 2700 साल पर सप्तर्षि एक चक्र पूरा करते हैं। इस चक्र का सौर गणना के साथ तालमेल रखने के लिए इसके साथ 18 वर्ष और जोड़े जाते हैं। अर्थात् 2718 वर्षों का एक चक्र होता है। एक चक्र की समाप्ति पर फिर से नई गणना प्रारंभ होती है। इन 18 वर्षों को संसर्पकाल कहते हैं। जब सृष्टि प्रारंभ हुई थी उस समय सप्तर्षि श्रवण नक्षत्र पर थे और आजकल अश्वनी नक्षत्र पर हैं। श्रीलंका के प्रसिद्ध ग्रंथ "महावंश" में एक जगह लिखा गया है-
जिन निवाणतो पच्छा पुरे तस्साभिसेकता।
साष्टा रसं शतद्वयमेवं विजानीयम् ॥
इसका अर्थ है सम्राट् अशोक का राज्याभिषेक सप्तर्षि संवत् 6208 में हुआ।
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सृष्टि संवत...........................
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हिन्दू कालगणना के अनुसार, इस समय कल्प संवत 01अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार 120 चल रहा है। सृष्टि संवत 01अरब 95 करोड़ 58 लाख 85 हजार 120 चल रहा है। अर्थात इस धरती पर जीवन की रचना के 1 अरब 95 करोड़ 58 लाख 85 हजार 120 वर्ष बीच चुके हैं। इससे भी पुराना कल्पाब्द संवत् 1,97,29,49,120 है। भारत में विक्रम संवत, कलि संवत और सप्तर्षि संवत एक ही दिन से प्रारंभ होते हैं।
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चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन नववर्ष आरंभ होने का कारण...
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1.प्राकृतिक कारण : इस समय अर्थात वसंत ऋतु में वृक्ष पल्लवित हो जाते हैं। उत्साहवर्धक और आल्हाददायक वातावरण होता है। ग्रहों की स्थिति में भी परिवर्तन आता है। ऐसा लगता है कि मानो प्रकृति भी नववर्ष का स्वागत कर रही है।
2.ऐतिहासिक कारण : इस दिन प्रभु श्रीराम ने बाली का वध किया। इसी दिन से शालिवाहन शक आरंभ हुआ।
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3.आध्यात्मिक कारण :
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सृष्टि की निर्मिति : इसी दिन ब्रह्मदेव द्वारा सृष्टि का निर्माण, अर्थात सत्ययुग का आरंभ हुआ। यही वर्षारंभ है। निर्मिति से संबंधित प्रजापति तरंगें इस दिन पृथ्वी पर सर्वाधिक मात्रा में आती हैं। गुढ़ीपूजन से इन तरंगों का पूजक को वर्ष भर लाभ होता है।
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साढे तीन मुहूर्तों में से एक : वर्षप्रतिपदा साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक है, इसलिए इस दिन कोई भी शुभकार्य कर सकते हैं। इस दिन कोई भी घटिका (समय) शुभमुहूर्त ही होता है।
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31 दिसंबर की रात एक तमोगुणी रात: चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के सूर्योदय पर नववर्ष आरंभ होता है। इसलिए यह एक तेजोमय दिन है। किंतु रात के 12 बजे तमोगुण बढ़ने लगता है। अंग्रेजों का नववर्ष रात के 12 बजे आरंभ होता है। प्रकृति के नियमों का पालन करने से वह कृत्य मनुष्यजाति के लिए सहायक और इसके विरुद्ध करने से वह हानिप्रद हो जाता है। पाश्चात्य संस्कृति तामसिक (कष्टदायक) है, तो हिन्दू संस्कृति सात्त्विक है।
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वर्षारंभ पवित्र होना चाहिए...............
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पाश्चात्य नववर्ष में लोग रेन डांस, अश्लील प्रदर्शन, शराब पार्टियां और पब की दिशा में झुक जाते हैं। पवित्रता की जगह यह तामसिक और राक्षसी कर्म की ओर मुड़कर खुद का, परिवार का और देश का नुकसान करते हैं।
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पाश्चात्यों का अंधानुकरण जीवन को पतन की ओर ले जाता है। इससे सभ्यता और नैतिकता का अवमूल्यन होकर वृत्ति अधिकाधिक तामसिक बनती है। राष्ट्र की युवा पीढ़ी राष्ट्र एवं धर्म का कार्य करना छोड़कर पाश्चात्य धर्म और संस्कृति को बढ़ावा देने में लग जाती है। जिन पाश्चात्यों की दासता से मुक्त होने में 200 साल लग गए अब उन्हीं की भाषा, संस्कृति, त्योहार आदि को अपनाकर मानसिक रूप से गुलामी करना मातृभूमि और शहीदों का अपमान ही है।
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उपरोक्त संवत ईस्वी संवत पर आधारित गणना करके निकाले गये हैं। पंचांग से इसके शुद्धिकरण की आवश्यकता है। अत: इसे सिर्फ अनुमानित माना जाए।

'अंतिम उच्चारण' : संवेदना, प्रतीक और मनोवैज्ञानिक विस्थापन का आलोचनात्मक विश्लेषण -

प्रस्तावना : कथा का वैचारिक धरातल और सामरिक महत्व- शिवशंकर मिश्र की कहानी 'अंतिम उच्चारण' हिंदी कथा-साहित्य के यथार्थवादी परिप्रेक्ष...