अपना–पराया


रिश्ते कभी-कभी बिना किसी वजह के ही टूट जाते हैं। जो लोग कभी दिल के सबसे करीब लगते थे, वही धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं। उनकी आवाज़ें, उनकी बातें और उनका साथ सब बस यादों में रह जाता है। दिल चुपचाप सब सहता रहता है, लेकिन अंदर कहीं न कहीं एक खालीपन रह जाता है, जिसे कोई भर नहीं पाता। और फिर जिंदगी का सबसे अजीब सच सामने आता है—कुछ अनजान लोग बिना कुछ कहे इतने अपने लगने लगते हैं कि हम खुद हैरान रह जाते हैं।तब बस एक ही एहसास रह जाता है— सच में अपना कौन है…

अपना कौन… पराया कौन…
ये वक्त बताता है,
जो दर्द में साथ निभाए,
वही अपना कहलाता है।

चेहरे तो सब हँसते मिलते,
दिल कौन पढ़ पाता है,
इस मतलब की दुनिया में
हर रिश्ता आज़माया जाता है।

कुछ लोग दुआओं जैसे थे,
फिर क्यों सपनों से बिछड़ गए,
जिन हाथों को थामा था हमने,
वो हाथ ही आखिर छोड़ गए।

दिल चुपके-चुपके रोता है,
आँखों से कुछ ना कहता है,
जो अपना लगता था कल तक,
आज वही बेगाना है।

अपना कौन… पराया कौन…
ये दिल समझ ना पाया है,
जिसे चाहा टूट के हमने,
उसी ने दिल दुखाया है।

माँ की ममता, पिता  का साया,
रब की सबसे बड़ी दुआ,
बाकी जग का सारा रिश्ता 
वक्त के संग में बदला  हुआ।

दौलत वाले यार बहुत थे,
ग़म में कोई आया ना,
तन्हा रातों ने ये सिखलाया,
अपना कोई साया ना।

फिर भी दिल उम्मीद लिए है,
कोई तो सच्चा होगा,
इस पत्थर जैसी दुनिया में
कोई दिल से अपना होगा।

 —मुक्ताभ

“सच में अपना कौन है… यह सवाल हमेशा दिल में रह जाता है।”

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