अभाव का मौन

अभाव मनुष्य के जीवन का केवल एक सामाजिक या आर्थिक अनुभव नहीं है, बल्कि वह उसकी चेतना, संवेदना और आत्मबोध को भी गहराई से प्रभावित करता है। अनेक बार जीवन की सबसे बड़ी सीखें, सबसे कोमल भावनाएँ और सबसे गहन मानवीय अनुभव अभाव की भूमि पर ही अंकुरित होते हैं। प्रस्तुत कविता अभाव को केवल कमी के रूप में नहीं, बल्कि मानवता की अंतर्धारा के रूप में देखने का प्रयास है।



अभाव जब अस्तित्व की नसों में
धीरे-धीरे उतरता है,
तब मनुष्य केवल जीवित नहीं रहता—
वह संवेदनाओं का
एक मौन ग्रंथ बन जाता है।

रात्रि की निस्तब्ध देह पर
भूख जब शोक लिखती है,
तब किसी माँ की आँखों में
करुणा का शाश्वत व्याकरण जन्म लेता है।

वंचनाओं के धूसर प्रदेश में
मनुष्य का अंतर्मन
अपने ही टूटे हुए प्रतिबिंबों से
संवाद करता रहता है।
और उन्हीं संवादों की राख से
भावनाओं की दिव्य अग्नि प्रकट होती है।

जिस आत्मा ने
तिरस्कार की हिमशीत लहरों को सहा हो,
वही स्पर्श की ऊष्मा को
धर्म की तरह ग्रहण करती है।

अभाव केवल अनुपस्थिति नहीं—
वह चेतना की वह गहन दरार है
जहाँ से होकर
मानवता का प्रथम प्रकाश भीतर उतरता है।

पीड़ा जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचती है,
तब वह विलाप नहीं रहती;
वह करुणा की दार्शनिक चेतना बन जाती है।

और शायद इसी कारण
सभ्यता के सबसे कोमल श्लोक,
सबसे गहरे दर्शन,
और सबसे निर्मल प्रेम
उन्हीं हृदयों से जन्म लेते हैं
जिन्होंने जीवन को
पूर्णता में नहीं,
अभाव में जिया होता है।


यह कविता अभाव को केवल आर्थिक कमी या वंचना के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसे मानव संवेदनाओं के निर्माण की एक गहरी प्रक्रिया मानती है। पीड़ा, तिरस्कार और संघर्ष से गुज़रा हुआ मनुष्य ही करुणा, प्रेम और मानवता के वास्तविक अर्थ को समझ पाता है। अभाव मनुष्य को भीतर से तोड़ता नहीं, बल्कि उसे अधिक संवेदनशील, सहृदय और आत्मदर्शी बनाता है।

जीवन की पूर्णता सदैव समृद्धि में नहीं मिलती। कई बार अभाव ही वह भूमि बनता है, जहाँ मानवता, करुणा और आत्मबोध के श्रेष्ठतम पुष्प खिलते हैं।

— मुक्ताभ

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कौशलेन्द्र के नवगीत

हाइकू

भास्कराचार्य त्रिपाठी : सरस्वती-वंदना

'अंतिम उच्चारण' : संवेदना, प्रतीक और मनोवैज्ञानिक विस्थापन का आलोचनात्मक विश्लेषण -