शनिवार, 23 मई 2026

अभाव का मौन

अभाव जब अस्तित्व की नसों में
धीरे-धीरे उतरता है,
तब मनुष्य केवल जीवित नहीं रहता—
वह संवेदनाओं का
एक मौन ग्रंथ बन जाता है।

रात्रि की निस्तब्ध देह पर
भूख जब शोक लिखती है,
तब किसी माँ की आँखों में
करुणा का शाश्वत व्याकरण जन्म लेता है।

वंचनाओं के धूसर प्रदेश में
मनुष्य का अंतर्मन
अपने ही टूटे हुए प्रतिबिंबों से
संवाद करता रहता है।
और उन्हीं संवादों की राख से
भावनाओं की दिव्य अग्नि प्रकट होती है।

जिस आत्मा ने
तिरस्कार की हिमशीत लहरों को सहा हो,
वही स्पर्श की ऊष्मा को
धर्म की तरह ग्रहण करती है।

अभाव केवल अनुपस्थिति नहीं—
वह चेतना की वह गहन दरार है
जहाँ से होकर
मानवता का प्रथम प्रकाश भीतर उतरता है।

पीड़ा जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचती है,
तब वह विलाप नहीं रहती;
वह करुणा की दार्शनिक चेतना बन जाती है।

और शायद इसी कारण
सभ्यता के सबसे कोमल श्लोक,
सबसे गहरे दर्शन,
और सबसे निर्मल प्रेम
उन्हीं हृदयों से जन्म लेते हैं
जिन्होंने जीवन को
पूर्णता में नहीं,
अभाव में जिया होता है।

@गौरव मिश्र 

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