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रोटी से बड़ी भूख

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शा म ढल रही थी। सड़क के किनारे एक वृद्ध चुपचाप बैठा था।   उसके सामने कुछ सूखी रोटियाँ रखी   थीं,  जिन्हें किसी राहगीर ने दया से दे दिया था।  वह रोटियों को देख रहा था, पर खा नहीं रहा था। तभी एक युवक वहाँ रुका। उसने सोचा, शायद बाबा भूखे हैं।  उसने पास की दुकान से खाना खरीदकर वृद्ध के सामने रख दिया और बोला— "बाबा, अब तो पेट भर जाएगा।" वृद्ध ने उसकी ओर देखा। आँखों में एक अजीब-सी नमी थी।  धीरे से पूछा—   "बेटा, तुम्हारे पास दो मिनट हैं?"  युवक थोड़ा चौंका। फिर वहीं बैठ गया।  वृद्ध की आँखें कहीं दूर चली गईं।  "जानते हो, आज मेरा जन्मदिन है।" युवक मुस्कुरा दिया।  "अच्छा! फिर तो आपको खुश होना चाहिए।" वृद्ध के होंठ काँपे। "खुश...?" कुछ क्षण मौन रहा। फिर बोला— "पाँच साल पहले तक मेरा भी घर था। पत्नी थी। बच्चे थे।  जन्मदिन पर घर में चहल-पहल होती थी।  आज सुबह से मैं इसी उम्मीद में बैठा हूँ कि  शायद किसी बेटे का फोन आ जाए।" उसने जेब से एक पुराना मोबाइल निकाला। स्क्रीन बार-बार देखे जाने से घिस चुकी थी। "एक भी फोन नहीं आया।" अब उसकी ...