काल के आईने में आदमी

आईना कभी झूठ नहीं बोलता

एक आदमी रोज़ आईने के सामने खड़ा होता..
कपड़े ठीक करता, बाल सँवारता और निकल जाता..
एक दिन उसने आईने से पूछा—
“तू मुझे हमेशा ठीक ही क्यों दिखाता है?”

आईना चुप रहा।
आदमी हँसा—
“तुझे मेरी कमियाँ दिखाई नहीं देतीं क्या?”

इस बार भी आईना चुप रहा।
आदमी ने खुद ही जवाब दिया—
“शायद इसलिए कि आईना चेहरा दिखाता है,
नीयत नहीं।”

उस दिन से उसने आईना देखना कम कर दिया।
लोगों को देखने लगा।
और पता चला—
दुनिया में सबसे महँगा आईना वह है,
जिसमें इंसान को अपना असली चेहरा दिखाई दे जाए।
बाकी आईने तो बाजार में बहुत मिलते हैं।

काल का साक्षी

नदी ने कभी यह नहीं कहा
कि उसका जल निर्मल है।
वह बहती रही...।

पर्वत ने कभी अपने धैर्य का प्रमाण नहीं दिया।
वह खड़ा रहा...।

वृक्ष ने कभी यह नहीं समझाया
कि उसने कितनी धूप सही...।
वह छाया देता रहा...।

ऋतुएँ आती रहीं...,
जाती रहीं...।
किसी ने वसंत को उत्सव कहा,
किसी ने पतझड़ को अभिशाप...।

पर वृक्ष ने किसी के निर्णय पर
अपनी जड़ें नहीं बदलीं।

काल की गति भी ऐसी ही है।
वह न किसी के पक्ष में ठहरता,
न किसी के विरोध में।

वह केवल इतना करता है—
जो आज शब्दों में उलझा है,
उसे कल परिणाम में प्रकट कर देता है।

इसलिए सत्य को
शोर की आवश्यकता नहीं।

जिसे अपनी निर्मलता का विश्वास हो,
वह नदी की तरह बहता है।

जिसे अपने धैर्य पर भरोसा हो,
वह पर्वत की तरह खड़ा रहता है।

और जिसे समय पर विश्वास हो,
वह मौन रहकर भी
अपना पक्ष सुरक्षित रखता है।

क्योंकि काल की आँखों से
कोई दृश्य छिपा नहीं रहता।

आदमी : अजीब जीव

सच बोले तो बदतमीज़,
चुप रहे तो घमंडी,
हँसे तो बेपरवाह,
दुखी हो तो नाटक।

किसी की खुशी में न पहुँचे
तो रिश्ते भूल गया।
और पहुँच जाए
तो दिखावा करने आया है।

आदमी करे तो करे क्या?

एक दिन आदमी ने सोचा—
“चलो, अब जैसा लोग समझना चाहें,
वैसा ही समझने देते हैं।”
फिर आदमी चुप हो गया।

लोगों ने कहा—
“देखो, अब अकड़ आ गई।”
आदमी मुस्कुराया।
उसे पहली बार समझ आया—

लोगों को आदमी नहीं चाहिए,
उन्हें अपनी बनाई हुई
आदमी की कहानी चाहिए।

तराजू पर सच तौलता आदमी

एक पलड़े में अपनी बात रखता,
दूसरे में लोगों की राय।
हर बार लोगों की राय भारी पड़ती।

एक दिन उसने तराजू उठाकर बाहर फेंक दिया।
लोगों ने पूछा—
“क्या हुआ?”
वह बोला—
“कुछ नहीं…
बस समझ आया कि जिस तराजू में
लोग अपना-अपना वजन लेकर आएँ,
उसमें सच कभी बराबर नहीं बैठता।”

लोग हँस दिए।
उसे भी हँसी आ गई।
फिर बोला—
“अच्छा है…
अब जो जितना समझना चाहे, समझे।
सच को हर आदमी के हिसाब से
नापने की जिम्मेदारी किसने दी है?”
और वह आगे बढ़ गया।

काल के तट पर

संध्या उतर रही थी...।
नदी चुप थी...।
आकाश में लौटते पक्षियों की एक पतली पंक्ति थी।
दूर पर्वत पर सूर्य की अंतिम किरण ठहरी हुई थी—
मानो दिन जाते-जाते
धरती से कुछ कहकर जाना चाहता हो।

नदी से किसी ने पूछा—
“तुम्हारे जल में इतना कलुष घुला,
फिर भी तुम बहती क्यों रहीं?”
नदी ने उत्तर नहीं दिया।
वह बहती रही...।

पर्वत से पूछा गया—
“तुम पर ऋतुएँ बदलीं,
वर्षाएँ आईं, आँधियाँ गुज़रीं,
फिर भी तुम्हारे मुख पर यह मौन क्यों?”
पर्वत मौन रहा।

वृक्ष से पूछा गया—
“तुम्हारी छाया में बैठने वाले
तुम्हारे ही पत्ते तोड़ ले जाते हैं,
फिर भी तुम छाया क्यों देते हो?”
वृक्ष ने कोई उत्तर नहीं दिया।

तभी समय वहाँ से गुज़रा।
उसने तीनों को देखा और कहा—
“नदी को अपने निर्मल होने का प्रमाण
किसी से माँगना नहीं पड़ा।
पर्वत को अपने स्थिर होने की घोषणा
कभी करनी नहीं पड़ी।
वृक्ष को अपनी उदारता का
लेखा कभी नहीं देना पड़ा।

प्रकृति अपने सत्य का प्रचार नहीं करती।
वह उसे जीती है।
मनुष्य ही है
जो अपने सत्य के लिए
शब्दों की भीड़ जुटाता है।”

संध्या और गहरी हो गई।
नदी बहती रही।
पर्वत खड़ा रहा।
वृक्ष की छाया बनी रही।

और समय—
वह चुपचाप आगे बढ़ गया।
उसे मालूम था—
जिस सत्य को बार-बार समझाना पड़े,
वह अभी शब्दों में है;
जिस सत्य को समय स्वयं प्रकट कर दे,
वही इतिहास बनता है।

समय का नियम

समय ने कभी किसी से पूछा नहीं
कि तुम सच बोल रहे हो या झूठ।
वह बस चलता रहा।

किसी के पास ताली थी,
किसी के पास शिकायत।
किसी के पास शब्द बहुत थे,
किसी के पास केवल मौन।

दिन बीतते गए।
फिर एक दिन
शब्द थक गए।
शिकायतें पुरानी पड़ गईं।
तालियाँ बंद हो गईं।
मौन वहीं खड़ा रहा।

समय ने पलटकर देखा
और मुस्कुराया।
उसे मालूम था—
सच को साबित करने की जल्दी
अक्सर उन्हीं को होती है
जिन्हें सच पर भरोसा नहीं होता।
और जो सच में सच्चा होता है,
वह समय को अपना गवाह बना देता है।

आदमी और समय

आदमी ने समय से पूछा—
“तू सच का साथ कब देता है?”
समय हँसकर बोला —
“मैं सच का साथ नहीं देता,
मैं सिर्फ इंतज़ार करता हूँ।”
आदमी चुप रहा।
समय ने फिर कहा—
“झूठ को मेरे सामने बहुत जल्दी होती है।
वह आज ही जीतना चाहता है,
आज ही तालियाँ चाहता है,
आज ही भीड़ चाहता है।
सच को जल्दी नहीं होती।”

आदमी ने पूछा—
“तो सच करता क्या है?”
समय ने कहा—
“सच चुप रहता है।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसे मालूम है—
जो बात आज समझाने के लिए
सौ शब्द माँग रही है,
कल वही बात
एक घटना से समझ में आएगी।”

आदमी देर तक सोचता रहा।
फिर बोला—
“और तब तक?”
समय मुस्कुराया—
“तब तक आदमी को आदमी ही रहने देना…
हर बात का जवाब देने वाला
न्यायाधीश मत बनाना।”

आदमी ने सिर झुका लिया।
शायद पहली बार उसे समझ आया था—
हर लड़ाई जीतना जरूरी नहीं होता।
कुछ लड़ाइयाँ समय के हवाले करना ही
सबसे बड़ी जीत होती है।

मुक्ताभ



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