ऑनलाइन दुनिया का ऑफलाइन आदमी
दुनिया ऑनलाइन है, आदमी ऑनलाइन है… बस इंसानियत कहीं ऑफलाइन हो गई है।
आज का आदमी बड़ा भाग्यशाली है। दुनिया उसकी मुट्ठी में है और उसकी मुट्ठी मोबाइल में। एक स्पर्श करते ही अमेरिका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक के लोग उसके सामने हाजिर हो जाते हैं। जिनसे कभी मुलाकात नहीं हुई, वे उसके मित्र हैं; जिन्हें उसने कभी देखा नहीं, वे उसके परिचित हैं और जिनका नाम तक वह ठीक से नहीं जानता, उनके सुख-दुःख पर वह बाकायदा संवेदना प्रकट करता है। बस एक छोटी-सी दिक्कत है— जिसे वह रोज देखता है, उसे देखने का समय नहीं है।
घर में पिता बैठे हैं, बच्चे सामने हैं, पत्नी पास है; लेकिन आदमी की दुनिया कहीं और चल रही है। उसकी आँखें घर में हैं, उँगलियाँ मोबाइल में और ध्यान उस दुनिया में, जहाँ उसे कोई जानता तक नहीं। वह किसी अनजान व्यक्ति की तस्वीर पर लिख सकता है— “बहुत सुंदर परिवार।”
लेकिन अपने परिवार के साथ बैठकर पाँच मिनट बात करना उसके लिए लगभग राष्ट्रीय दायित्व जैसा कठिन काम है। आज आदमी की संवेदनशीलता भी बड़ी आधुनिक हो गई है। दूर देश में किसी के साथ अन्याय हो जाए तो उसका खून खौल उठता है; पड़ोस में किसी बूढ़े को दवा की जरूरत हो तो वह पहले देखता है कि उसकी पोस्ट किसने लाइक की।
वह दुनिया के दुःख से दुखी है, बस घर के दुःख से थोड़ा व्यस्त है। सोशल मीडिया ने आदमी को इतना सामाजिक बना दिया है कि अब अकेले बैठकर भी वह अकेला नहीं रह सकता। पाँच मिनट मोबाइल दूर हो जाए तो उसे लगता है जैसे दुनिया ने उसे भुला दिया।
पहले आदमी खाली समय में अपने बारे में सोचता था। अब खाली समय मिलते ही दूसरों के बारे में देखने लगता है।दूसरे क्या खा रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं, किससे मिल रहे हैं, किसके साथ घूम रहे हैं—इन सबकी जानकारी उसे रहती है। बस अपनी जिंदगी कहाँ जा रही है, इसका पता नहीं रहता।
उसके पाँच हजार मित्र हैं, लेकिन सुख-दुःख बाँटने के लिए एक आदमी नहीं। हजारों लोग उसकी पोस्ट देखते हैं, लेकिन उसके चेहरे को पढ़ने वाला कोई नहीं। आदमी ने संपर्कों का साम्राज्य खड़ा कर लिया है और संबंधों का घर खाली छोड़ दिया है। अब वह जीवन जीता कम है, उसका स्क्रीनशॉट ज्यादा रखता है।
खुशी आई—स्टेटस। दुःख आया—स्टेटस। मंदिर गया—स्टेटस। घूमने गया—स्टेटस। कभी-कभी तो लगता है कि आदमी भगवान से भी पहले सोशल मीडिया को बताता है कि वह भगवान के दर्शन करके आया है और मजे की बात यह है कि जिसे वह दिखा रहा है, उसे भी कोई विशेष रुचि नहीं है। वह भी बस अपना स्टेटस डालने की जल्दी में है।
इस तरह पूरा समाज एक-दूसरे को देखने में व्यस्त है और किसी के पास किसी को देखने का समय नहीं। आदमी के पास अब सूचना बहुत है, समझ कम; संपर्क बहुत हैं, संबंध कम; अभिव्यक्ति बहुत है, संवाद कम। शायद सबसे बड़ी विडंबना यही है— आदमी हर समय ऑनलाइन है, लेकिन उसकी जिंदगी लगातार ऑफलाइन होती जा रही है।
मोबाइल की स्क्रीन चमक रही है, स्टेटस चमक रहा है, प्रोफाइल चमक रही है, बस आदमी के भीतर का इंसान धीरे-धीरे अँधेरे में जा रहा है।
— मुक्ताभ


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