क्या यह आज़ादी की मौत नहीं?
15 अगस्त आते ही
देशभक्ति के कपड़े अलमारी से निकल आते हैं।
तिरंगा छत पर चढ़ जाता है,
देशभक्ति मोबाइल की स्क्रीन पर उतर आती है,
और आदमी—
जो पूरे साल आदमी को आदमी नहीं समझता—
एक दिन राष्ट्र को अपना परिवार घोषित कर देता है।
अजीब तमाशा है।
जिसके सामने निर्धन की आवाज़ सुनाई नहीं देती,
वह राष्ट्रगान में राष्ट्र की आत्मा सुन लेता है।
जिसे अपने सामने खड़े आदमी का दुख दिखाई नहीं देता,
उसे सीमा पर खड़े सैनिक का बलिदान दिखाई देता है।
जिसे अपने अधिकार के लिए चक्कर काटते आदमी से कोई सरोकार नहीं,
वही स्वतंत्रता पर सबसे लंबा भाषण देता है।
हमने अंग्रेज़ों को तो निकाल दिया।
लेकिन शायद अंग्रेज़ियत नहीं निकली।
सत्ता आज भी ऊपर बैठी है,
आदमी आज भी नीचे खड़ा है।
फर्क़ केवल इतना है कि
पहले हुक्म देने वाले का चेहरा विदेशी था,
अब अपना है।
पहले सलाम मजबूरी था,
अब आदत है।
पहले डराया जाता था,
अब आदमी स्वयं डरता है।
पहले बेड़ियाँ दिखाई देती थीं,
अब वे दिखाई नहीं देतीं।
यही शायद अधिक ख़तरनाक है।
एक आदमी भूखा है—
हम कहते हैं, व्यवस्था की समस्या है।
एक आदमी बेरोज़गार है—
हम कहते हैं, समय ख़राब है।
एक आदमी अन्याय सह रहा है—
हम कहते हैं, उसका निजी मामला है।
और फिर 15 अगस्त को
उसी देश के सामने खड़े होकर कहते हैं—
“हम आज़ाद हैं।”
किससे?
विदेशी शासन से?
निस्संदेह।
लेकिन आदमी की उस ख़ामोशी से,
जो अन्याय देखकर भी कुछ नहीं कहती?
नहीं।
उस भय से,
जो सत्य को होंठों तक आते ही लौटा देता है?
नहीं।
उस मानसिकता से,
जो मनुष्य की कीमत उसकी जेब, जाति, पद और पहुँच से तय करती है?
नहीं।
तो फिर बचा क्या?
एक ध्वज।
एक समारोह।
कुछ नारे।
कुछ स्मृतियाँ।
और एक प्रश्न—
**कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने आज़ादी को बचा लिया,
लेकिन उसके अर्थ को मार डाला?**
शायद इसी प्रश्न से
15 अगस्त की असली शुरुआत होती है।
और शायद—
यही प्रश्न सबसे अधिक असुविधाजनक है।


टिप्पणियाँ