साहित्य का आदमी

साहित्य मनुष्य के लिए है—

यह वाक्य जितनी बार कहा जाता है,
उतनी ही बार मनुष्य
साहित्य से थोड़ा और दूर खड़ा दिखाई देता है।

मंच पर शब्द होते हैं।
शब्दों के पीछे विचार।
विचारों के पीछे सिद्धांत।
और सिद्धांतों के पीछे—

कहीं बहुत भीतर,
एक अदृश्य-सी इच्छा—

दिखाई देने की।

साहित्य का संसार
अक्सर मनुष्य को खोजता है।

कभी खेत में।
कभी कारखाने में।
कभी फुटपाथ पर।
कभी भूख में।
कभी आँसू में।

वह उसकी पीड़ा को उठाता है,
उसे भाषा देता है,
उसे सौंदर्य देता है,
उसे अर्थ देता है।

और फिर—

उसी पीड़ा को
पुस्तक बनाकर
बाजार में रख देता है।

पीड़ा अब
सिर्फ पीड़ा नहीं रहती।

वह
प्रकाशित सामग्री हो जाती है।


गरीब साहित्य में बहुत सम्मानित है।

वास्तविक जीवन में उतना नहीं।

उसकी झोपड़ी कहानी में सुंदर लगती है।

उसका फटा कुर्ता कविता में मार्मिक।

उसकी भूख उपन्यास में प्रतीक।

उसकी चुप्पी आलोचना में विमर्श।

लेकिन जब वही गरीब
साहित्यिक सभा के दरवाजे पर
खड़ा होकर पूछता है—

“अंदर आ सकता हूँ?”

तब साहित्य अचानक व्यवस्था बन जाता है।

पास चाहिए, पहचान चाहिए, निमंत्रण चाहिए।

और सबसे बढ़कर—

साहित्य को समझने की योग्यता चाहिए।

भूख समझने के लिए भूखा होना जरूरी नहीं,

लेकिन साहित्य समझने के लिए साहित्यिक होना जरूरी है।

साहित्य सत्ता से प्रश्न करता है।

यह उसका धर्म है।

लेकिन साहित्यिक प्रतिष्ठा
अपने प्रश्नों की भी
एक सीमा तय करती है।

सत्ता पर प्रश्न— स्वतंत्रता।

मित्र पर प्रश्न— असभ्यता।

गुट पर प्रश्न— ईर्ष्या।

पुरस्कार पर प्रश्न— कुंठा।

प्रसिद्ध लेखक पर प्रश्न—अज्ञान।

और स्वयं पर प्रश्न—

उसकी कोई आवश्यकता नहीं।

क्योंकि लेखक
दूसरों का विवेक हो सकता है,

पर स्वयं के लिए
विवेक का प्रयोग करना
शायद सबसे कठिन साहित्य है।


आलोचना भी विचित्र वस्तु है।

दूसरे की रचना में
एक अल्पविराम तक
अर्थ खोज लिया जाता है।

एक शब्द गलत हो जाए
तो पूरी विचारधारा कटघरे में।

एक वाक्य कमज़ोर हो
तो लेखक की संवेदना संदिग्ध।

लेकिन अपनी रचना पर
सवाल उठे—

तो आलोचक की दृष्टि
“पूर्वाग्रहग्रस्त” हो जाती है।

दूसरों की कमियाँ
साहित्यिक विवेक हैं।

अपनी कमियाँ—

सृजनात्मक स्वतंत्रता।


पुरस्कार साहित्य का मूल्य नहीं।

यह बात
पुरस्कार मिलने से पहले
बहुत सुंदर लगती है।

पुरस्कार मिल जाए—

तो वही सम्मान
साहित्य की उपलब्धि हो जाता है।

न मिले—

तो पुरस्कार व्यवस्था
संदेहास्पद हो जाती है।

साहित्य की निष्पक्षता

परिणाम के साथ बदलती है।

और आश्चर्य यह कि
इस परिवर्तन को
कोई विरोधाभास नहीं कहा जाता।

इसे कहा जाता है—

“साहित्यिक राजनीति।”


प्रसिद्धि से साहित्य को बचाने की बातें होती हैं।

लेकिन लेखक की तस्वीर किताब से बड़ी होती जाती है।

कृति छोटी होती जाती है, परिचय बड़ा।

रचना पीछे, रचनाकार आगे।

विचार पीछे, नाम आगे।

और धीरे-धीरे
साहित्य में वह क्षण आता है
जब पुस्तक पढ़ने से पहले
यह देखना जरूरी समझा जाता है—

लेखक कौन है?

यहीं से साहित्य की यात्रा
शब्द से नाम की ओर मुड़ती है।
और नाम
शब्द से अधिक शक्तिशाली हो जाए—
साहित्य साहित्य नहीं रहता।
वह प्रतिष्ठा का
एक सुन्दर रूप बन जाता है।

सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं
कि साहित्य में अहंकार है।
अहंकार तो मनुष्य का पुराना रोग है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है
कि अहंकार भी
साहित्यिक शब्दावली सीख गया है।

महत्त्वाकांक्षा—“सृजनात्मक बेचैनी।”
ईर्ष्या—“आलोचनात्मक दृष्टि।”
प्रसिद्धि की भूख—“पाठकों तक पहुँच।”
गुटबंदी—“विचारधारात्मक निकटता।”
समझौता—“व्यावहारिक विवेक।”
आत्ममुग्धता—“लेखकीय आत्मविश्वास।”

भाषा कितनी दयालु है!

वह मनुष्य के हर दोष को
एक सम्मानजनक नाम दे देती है।


लेकिन साहित्य का असली संकट
शब्दों की कमी नहीं।

शब्द तो बहुत हैं।

किताबें बहुत हैं।

विमर्श बहुत हैं।

बहसें बहुत हैं।

घोषणाएँ बहुत हैं।

संकल्प बहुत हैं।

कमी केवल एक चीज की है—

अपने लिखे हुए शब्दों के सामने
स्वयं खड़े होने की।

क्योंकि दूसरों पर लिखना दृष्टि है।

अपने ऊपर लिखना दर्पण।

दूसरों को कटघरे में खड़ा करना साहस है।

अपने भीतर कटघरा बनाना—साहित्य।


शायद इसलिए
सबसे कठिन कविता वह नहीं
जिसमें कठिन शब्द हों।

सबसे कठिन कहानी वह नहीं
जिसमें असाधारण कथानक हो।

सबसे कठिन आलोचना वह नहीं
जिसमें विद्वानों के नाम हों।

सबसे कठिन रचना वह है—
जिसे लिखते समय लेखक अपने लिए
कोई सुरक्षित स्थान न छोड़ सके।

जहाँ हर पंक्ति पहले लेखक से पूछे—

“जो लिख रहे हो,क्या उसे जी भी रहे हो?”
और यदि उत्तर ‘नहीं’ हो—
तो अगली पंक्ति लिखने से पहले
कलम को रुक जाना चाहिए।

यहीं साहित्य शब्द से सत्य बनता है।

यहीं लेखक लेखक से मनुष्य बनता है।

और यहीं साहित्य का सबसे बड़ा आईना
सामने आता है—

जिसमें समाज नहीं,

लेखक स्वयं दिखाई देता है।

तब कोई पुरस्कार नहीं बचता।

कोई पद नहीं।

कोई परिचय नहीं।

कोई प्रशंसा नहीं।

कोई आलोचक नहीं।

केवल एक मनुष्य।

और उसके लिखे हुए शब्द।

फिर साहित्य पूछता है—

“इतना सब लिखकर
तुमने दुनिया को कितना बदला?”

एक क्षण रुककर—

फिर उससे भी कठिन प्रश्न—

“और स्वयं को?”

यही वह प्रश्न है
जिससे साहित्यिक संसार
सबसे अधिक डरता है।

क्योंकि दुनिया को बदलने का दावा
शब्दों से किया जा सकता है।

स्वयं को बदलने का प्रमाण—

जीवन से देना पड़ता है।


— मुक्ताभ

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