साहित्यिक मुखौटा और मौलिकता का स्पंदन
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आदरणीय डॉ. शिवशंकर मिश्र की कहानी 'काश होती कमीज पर कविता' की समीक्षा को यदि हम पाश्चात्य (Western) साहित्यिक सिद्धांतों और विमर्शों के साथ जोड़कर देखें, तो इसके अर्थ की परतें और भी स्पष्ट हो जाती हैं। हालांकि आपके स्त्रोतों में इन पाश्चात्य सिद्धांतों का सीधा उल्लेख नहीं है (यह जानकारी स्त्रोतों से बाहर की है), लेकिन कहानी के कथानक और पात्रों के व्यवहार को समझने के लिए ये सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक हैं:
1. इंटरटेक्सचुअलिटी (Intertextuality) और जूलिया क्रिस्टेवा
महाकवि का यह तर्क कि "अब कविता भी कहानी जैसी हो सकती है और कहानी भी कविता जैसी", जूलिया क्रिस्टेवा के 'इंटरटेक्सचुअलिटी' के सिद्धांत की याद दिलाता है।
- सिद्धांत: इसके अनुसार कोई भी पाठ (Text) पूरी तरह मौलिक नहीं होता, बल्कि वह अन्य पाठों का मेल होता है।
- कहानी में अनुप्रयोग: महाकवि अपनी चोरी को इसी दार्शनिक आवरण में छिपाने की कोशिश करते हैं कि उन्होंने केवल विधा (Genre) बदली है। लेकिन पाश्चात्य विमर्श में 'प्रभाव' और 'चोरी' के बीच एक महीन रेखा है, जिसे महाकवि ने पार कर लिया है।
2. एंग्जायटी ऑफ इन्फ्लुएंस (Anxiety of Influence) और हेरोल्ड ब्लूम
हेरोल्ड ब्लूम का यह सिद्धांत बताता है कि एक लेखक अपने पूर्ववर्ती लेखकों के प्रभाव से मुक्त होने के लिए संघर्ष करता है।
- संघर्ष: कहानी में श्रीमान ‘क’ को जब चौथी कविता नहीं सूझती, तो वे उस 'सृजनात्मक शून्यता' और प्रभाव के डर से बचने के लिए ३४ साल पुरानी लोककथा का सहारा लेते हैं। यह उनकी रचनात्मक अक्षमता और 'महान' बने रहने के दबाव का परिणाम है।
3. 'द डेथ ऑफ द ऑथर' (The Death of the Author) और रोलां बार्थ
रोलां बार्थ का मानना था कि रचना के प्रकाशित होते ही लेखक का अस्तित्व समाप्त हो जाता है और पाठक ही उसे अर्थ देता है।
- विडम्बना: इस कहानी में महाकवि 'लेखक की मृत्यु' के विचार का दुरुपयोग करते दिखते हैं। वे सोचते हैं कि पुरानी कहानी लिखने वाला बुजुर्ग अब तक मर गया होगा।
- आभासी संसार का प्रभाव: बार्थ के सिद्धांत के विपरीत, आधुनिक 'आभासी संसार' (Social Media) लेखक को मरने नहीं देता। वहां लोग महाकवि की रक्षा और आलोचना के बहाने लेखक की नैतिकता पर सवाल उठाते हैं, जिससे उनकी 'राष्ट्रीय ख्याति' संकट में पड़ जाती है।
4. 'ऑथर-फंक्शन' (Author-function) और मिशेल फूको
फूको के अनुसार 'लेखक' एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक 'कार्य' (Function) है जो सत्ता और विमर्श से जुड़ा होता है।
- सत्ता और ख्याति: कहानी में 'स्थापित समीक्षक' श्रीमान ‘क’ को एक 'ब्रांड' या 'महाकवि' के रूप में निर्मित करता है। यहाँ कविता की गुणवत्ता से अधिक 'महाकवि' का नाम और उनका खेमे (वामपंथ/दक्षिणपंथ) से जुड़ा होना महत्वपूर्ण है। यह फूको के उस विचार को पुष्ट करता है जहाँ लेखक की पहचान सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं द्वारा तय की जाती है।
5. 'ऑरा' (Aura) का ह्रास और वाल्टर बेंजामिन
वाल्टर बेंजामिन का सिद्धांत कहता है कि यांत्रिक पुनरुत्पादन (जैसे चोरी या नकल) से कला की 'ऑरा' (आभा/मौलिकता) खत्म हो जाती है।
- धमनियों का स्पंदन: कहानी के अंत में जो सपना महाकवि देखते हैं, वह बेंजामिन के इसी विचार का दार्शनिक रूप है। सपने में कहा जाता है कि मौलिक कविता लिखते समय "खून के भीतरी आवेग से धमनियों में स्पन्दन" होता है, तभी वह कमीज पर उभरती है। चूंकि महाकवि की रचना उधार की है, इसलिए उसमें वह 'स्पंदन' या 'ऑरा' गायब है।
डॉ. शिवशंकर मिश्र की यह कहानी पाश्चात्य सिद्धांतों के आलोक में 'उत्तर-आधुनिकता' (Post-modernism) के उस दौर की आलोचना करती है, जहाँ नैतिकता के स्थान पर केवल 'समीक्षा' और 'प्रचार' को ही रचना मान लिया गया है।
क्रमशः
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