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जश्न : सबाल्टर्न अस्मिता, प्रतीकात्मक सत्ता और ग्रामीण सांस्कृतिक चेतना का समाजशास्त्रीय पाठ
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'जश्न' : अंधविश्वास, सामाजिक पाखंड और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण का मार्मिक आख्यान
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बाबा की उघन्नी': एक ढहते सामंती ढांचे का विश्लेषण
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'अंतिम उच्चारण' : संवेदना, प्रतीक और मनोवैज्ञानिक विस्थापन का आलोचनात्मक विश्लेषण -
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श्रम, जाति और सांस्कृतिक पाखंड का मार्मिक आख्यान : ‘पखावज वृत्तान्त’
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वर्षारंभ पवित्र होना चाहिए : भारतीय संस्कृति, आत्मचिंतन और नए संकल्पों का महत्व
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